चीन की सरकार लंबे समय से आर्थिक मॉडल को निवेश और निर्यात से हटाकर घरेलू खपत पर अधिक निर्भर बनाना चाहती है, इसलिए खपत में यह सुस्ती नीति‑निर्माताओं के लिए खास चिंता का विषय है।
औद्योगिक उत्पादन भी अपेक्षा से कमजोर रहा। अप्रैल में फैक्टरी आउटपुट सालाना 4.1% बढ़ा, जबकि मार्च में यह 5.7% था और बाज़ार अनुमान इससे ज्यादा थे।
विश्लेषकों का कहना है कि इस गिरावट के पीछे दो प्रमुख कारण हैं—कमजोर घरेलू मांग और बढ़ती उत्पादन लागत। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल, जो भू‑राजनीतिक तनावों से जुड़ा है, कंपनियों की लागत बढ़ा रहा है और मुनाफे के मार्जिन पर दबाव डाल रहा है।
हालांकि निर्यात प्रदर्शन अभी कुछ हद तक मजबूत है और उसने घरेलू कमजोरी को आंशिक रूप से संतुलित किया है, लेकिन लागत का दबाव लंबे समय तक रहा तो उत्पादन और कीमतों दोनों पर असर पड़ सकता है।
चीन में आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा स्तंभ फिक्स्ड‑एसेट निवेश (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, फैक्ट्रियां और बड़े प्रोजेक्ट) रहा है। लेकिन अप्रैल में यह भी उम्मीद से कमजोर रहा और कुछ रिपोर्टों में इसमें गिरावट के संकेत मिले।
इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि जब उपभोक्ता खर्च धीमा पड़ता है, तब निवेश अक्सर अर्थव्यवस्था को सहारा देता है। लेकिन इस बार दोनों ही मोर्चों—खपत और निवेश—पर कमजोरी दिखाई दे रही है।
चीन की अर्थव्यवस्था पर कई कारक एक साथ असर डालते दिख रहे हैं:
इन सभी कारणों का संयुक्त असर यह है कि घरेलू मांग अभी भी इतनी मजबूत नहीं है कि अपने दम पर स्थिर आर्थिक विस्तार बनाए रख सके।
बीजिंग ने इस साल के लिए लगभग 5% आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य रखा है। अप्रैल के आंकड़े इस लक्ष्य को असंभव नहीं बनाते, लेकिन इसे हासिल करना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अभी निर्यात अपेक्षाकृत मजबूत है और वह निकट अवधि में वृद्धि को सहारा दे सकता है। लेकिन डेटा दिखाता है कि रिकवरी असमान है और घरेलू खपत अभी भी कमजोर है।
अगर वैश्विक मांग धीमी होती है या ऊर्जा कीमतों का दबाव बना रहता है, तो लक्ष्य तक पहुंचना और मुश्किल हो सकता है।
कमजोर आंकड़ों के बाद बाजार में यह उम्मीद बढ़ रही है कि नीति‑निर्माता अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए नए कदम उठा सकते हैं।
चीन का केंद्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC), तरलता बढ़ाने, बैंकों के रिजर्व‑रिक्वायरमेंट रेशियो (RRR) में कटौती या लक्षित ऋण समर्थन जैसे कदमों पर विचार कर सकता है। हालांकि कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि केवल मौद्रिक ढील से पर्याप्त असर नहीं होगा यदि उपभोक्ता और कंपनियां खर्च या निवेश करने में हिचकिचाती रहें।
इसलिए कई विश्लेषक मानते हैं कि मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों का मिश्रण—जैसे घरेलू आय को मजबूत करने और निजी क्षेत्र के भरोसे को बढ़ाने वाले कदम—अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए जरूरी हो सकता है।
अप्रैल के आर्थिक आंकड़े दिखाते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था एक साथ कई दबावों से जूझ रही है—कमजोर उपभोक्ता खर्च, धीमा औद्योगिक उत्पादन और घटता निवेश। निर्यात अभी सहारा दे रहे हैं, लेकिन डेटा यह भी स्पष्ट करता है कि आर्थिक सुधार अभी नाजुक है और अतिरिक्त नीति‑समर्थन की संभावना बढ़ रही है।
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