यही समय-संयोग अहम है। इसका मतलब है कि कूटनीति अभी बंद नहीं हुई है, लेकिन हिंसा भी थमी नहीं है। इसी अवधि की रिपोर्टिंग में इज़राइल और हमास, दोनों की ओर से एक-दूसरे पर संघर्षविराम उल्लंघन के आरोपों का सिलसिला जारी बताया गया ।
इस समझौते का एक बड़ा असर रहा है: संघर्षविराम लागू होने के छह महीने बाद गाज़ा में इज़राइली बलों और हमास-नेतृत्व वाले लड़ाकों के बीच सबसे तीव्र लड़ाई रुक गई थी । लेकिन भारी लड़ाई रुकना, स्थायी समाधान बन जाने जैसा नहीं है।
छह महीने के पड़ाव पर कई बुनियादी काम अब भी बाकी बताए गए: हमास को निरस्त्र करना, उसके दो दशक पुराने शासन को समाप्त करना, अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल तैनात करना और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण शुरू करना । ये तकनीकी बिंदु नहीं हैं; इन्हीं पर यह निर्भर करेगा कि संघर्षविराम अगले झटके को झेल पाता है या नहीं।
बार-बार लौटता आरोप-प्रत्यारोप इस संघर्षविराम की सबसे साफ कमजोरी है। रिपोर्टों के मुताबिक, इज़राइल और हमास एक-दूसरे को संघर्षविराम उल्लंघन के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे हैं । मार्च के एक विश्लेषण में भी कहा गया कि संघर्षविराम काफी हद तक कायम रहा, लेकिन छोटे स्तर की झड़पें, कथित उल्लंघन और हमास के खिलाफ इज़राइली कार्रवाइयां जारी रहीं
।
यानी समस्या सिर्फ गोलीबारी की नहीं, भरोसेमंद निगरानी और लागू कराने की भी है। जब हर घटना दूसरे पक्ष की बदनीयती का नया सबूत बन जाती है, तो सीमित हमला भी राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो सकता है। टिकाऊ संघर्षविराम के लिए शांत अंतराल काफी नहीं; ऐसा तंत्र चाहिए जो उल्लंघन के आरोपों को सत्यापित, सीमित और हल कर सके।
गाज़ा में जमीन पर नियंत्रण भी एक बड़ा दबाव बिंदु है। द बॉस्टन ग्लोब में प्रकाशित ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के अनुसार, इज़राइल ने गाज़ा में अपना नियंत्रण बढ़ाया और अधिक तीव्र सैन्य कार्रवाई पर विचार कर रहा था। रिपोर्ट में कहा गया कि सेना सहमत अस्थायी सीमा से आगे बढ़ी; इज़राइल के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोत्रिच ने कहा कि सेना अब गाज़ा के 60% हिस्से पर नियंत्रण रखती है, जबकि मूल सीमा के तहत यह 53% था। रिपोर्ट के अनुसार, इस आंकड़े की पुष्टि एक अन्य इज़राइली अधिकारी और संघर्षविराम की निगरानी से जुड़े एक विदेशी राजनयिक ने भी की ।
संघर्षविराम की रेखा का मकसद अनिश्चितता कम करना होता है। अगर वही रेखा विवाद का विषय बन जाए, तो समझौते को स्थिर रखना कठिन हो जाता है। संघर्षविराम के दौरान सैन्य मौजूदगी बढ़ना यह भी संकेत देता है कि राजनीतिक प्रक्रिया पर अब भी मैदान की ताकत असर डाल रही है।
मानवीय स्थिति भी संघर्षविराम पर लगातार दबाव बना रही है। छह महीने बाद लॉस एंजिलिस टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद सहायता आपूर्ति 80% गिर गई थी और बड़े तंबू शिविरों में अब भी अधिकांश निवासी रह रहे थे । AP की रिपोर्ट, जिसे WTOP ने प्रकाशित किया, ने भी बताया कि पुनर्निर्माण और संघर्षविराम से जुड़े अन्य अहम काम अधूरे रहने के बीच गाज़ा के लोग अनिश्चितता में फंसे हुए हैं
।
राहत पहुंचना केवल मानवीय सवाल नहीं है। अगर रोजमर्रा की स्थितियां नहीं सुधरतीं, तो जमीन पर संघर्षविराम की स्वीकार्यता घटती है और नई हिंसा की स्थिति में उसका टिके रहना और मुश्किल हो जाता है।
काहिरा की बैठकों से पता चलता है कि मध्यस्थता के रास्ते खुले हैं, लेकिन हमलों का समय यह भी दिखाता है कि लागू करने की प्रक्रिया धीमी पड़े तो कूटनीति की सीमा क्या है । रिपोर्टिंग में अमेरिका-समर्थित योजना पर बातचीत को भी ठहरा हुआ बताया गया
।
यही संघर्षविराम का व्यावहारिक खतरा है: बातचीत चलती रह सकती है, लेकिन जमीन पर घटनाएं गति तय करने लगती हैं। अगर वार्ताएं लागू होने वाले कदमों तक नहीं पहुंचतीं, तो हर नया भड़काव गोलाबारी के बीच सौदेबाजी का अगला दौर बन सकता है।
मुख्य सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगला हमला होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या संघर्षविराम के पास ऐसे औजार बनेंगे जो अगले incident को बड़े टकराव में बदलने से पहले रोक सकें। आगे चार संकेत अहम होंगे:
मौजूदा तस्वीर नाजुकता की है, तयशुदा टूटन की नहीं। गाज़ा का संघर्षविराम युद्ध की तीव्रता कम करने में सफल रहा है । लेकिन ताजा हमले और आपसी आरोप बताते हैं कि यह अब भी मैदान की घटनाओं से हिल सकता है
। विवादित क्षेत्रीय नियंत्रण
, गंभीर मानवीय दबाव
और सुरक्षा व पुनर्निर्माण की अधूरी युद्धोत्तर योजना
इसे और कमजोर बनाते हैं।
इसी मायने में संघर्षविराम अभी एक काम दूसरे से बेहतर कर रहा है: उसने सबसे भीषण लड़ाई की वापसी रोकने में मदद की है, लेकिन वह अभी ऐसा निगरानी-युक्त और लागू होने योग्य समझौता नहीं बन पाया है जो अगला संकट आसानी से झेल सके।
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