यह अंतर महत्वपूर्ण है। खुफिया आकलन में यह बताया जाता है कि रूस क्या कर सकता है—यह नहीं कि वह ऐसा जरूर करेगा। न ही यह इस बात का प्रमाण है कि किसी हमले का आदेश जारी किया जा चुका है। एस्टोनिया के ERR के अनुसार, बदलाव मुख्य रूप से जोखिम के समय-आकलन में आया है: अमेरिकी खुफिया समुदाय अब यूक्रेन युद्ध जारी रहने के दौरान भी सीमित उकसावे की संभावना को संभव मानता है, हालांकि जमीनी घुसपैठ की संभावना कम बताई गई है।
NATO को परखने की कोशिश कई स्तरों पर सामने आ सकती है:
ये विकल्प एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। साइबर हमले या तोड़फोड़ के साथ सीमा पर घटना हो सकती है और दुष्प्रचार का इस्तेमाल NATO की साझा राजनीतिक प्रतिक्रिया में देरी के लिए किया जा सकता है।
पोलैंड, एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया NATO की उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित हैं और रूस तथा बेलारूस के करीब हैं। उनका भूगोल NATO की सैन्य सहायता और सैनिकों की आवाजाही की योजनाओं में अहम है। इसलिए वहां होने वाली कोई भी घटना तुरंत पूरे गठबंधन के लिए रणनीतिक महत्व हासिल कर सकती है। रिपोर्टों में पोलैंड और बाल्टिक देशों को संभावित उकसावे की जगहों के रूप में चिन्हित किया गया है। क्षेत्रीय अधिकारियों ने ऊर्जा और परिवहन ढांचे पर हमलों की आशंका को लेकर भी चेतावनी दी है।
यहां भूगोल के साथ राजनीति भी महत्वपूर्ण है। बिजलीघर, गैस प्रतिष्ठान, परिवहन मार्ग या सीमा क्षेत्र पर ऐसा हमला, जिसकी जिम्मेदारी स्पष्ट न हो, NATO सरकारों को तत्काल कठिन सवालों का सामना करने पर मजबूर कर सकता है: हमलावर कौन था? क्या यह सशस्त्र हमला माना जाए? जवाब देने से पहले कितना सबूत जरूरी है? और क्या सभी सदस्य देश एक ही कदम का समर्थन करेंगे?
यही वजह है कि NATO की पूर्वी सीमा सैन्य तैयारी के साथ-साथ राजनीतिक एकजुटता की भी परीक्षा बन सकती है। पोलैंड और बाल्टिक सरकारें बांधों, बिजलीघरों और गैस ढांचे की सुरक्षा बढ़ा रही हैं तथा तोड़फोड़ और फर्जी-झंडा अभियानों से निपटने की तैयारी कर रही हैं।
पहले यह धारणा थी कि यूक्रेन में बड़े पैमाने पर सैन्य रूप से व्यस्त रूस सीधे NATO को उकसाने से बचेगा। नई रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी अधिकारी अब उसी अवधि में सीमित उकसावे की संभावना पर भी विचार कर रहे हैं। यह बदलाव किसी एक नई चेतावनी के बजाय कई चिंताओं का परिणाम दिखता है।
पहली चिंता यह है कि रूस यूक्रेन में भारी सैन्य और आर्थिक लागत उठाने की इच्छा दिखा चुका है। दूसरी, उसकी सेना और रक्षा उद्योग युद्धक्षेत्र के अनुभव के आधार पर ड्रोन तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी क्षमताओं में बदलाव कर रहे हैं। तीसरी, NATO और अमेरिकी यूरोपीय कमान के अधिकारी यूरोप में रूसी हाइब्रिड गतिविधियों को लगातार और मजबूत बताते हैं। इनमें बाल्टिक क्षेत्र और पोलैंड में सूचना अभियान तथा तोड़फोड़ की घटनाएं शामिल हैं।
एक और संभावना यह है कि मॉस्को सीमित या ऐसी कार्रवाई को, जिसकी जिम्मेदारी से वह इनकार कर सके, NATO के भीतर राजनीतिक अनिश्चितता पैदा करने का अवसर माने। इस दृष्टिकोण से लक्ष्य NATO को सैन्य रूप से हराना नहीं, बल्कि यह देखना हो सकता है कि अस्पष्टता और मतभेद उसकी प्रतिक्रिया को कितना सीमित कर सकते हैं। फिर भी यह जोखिम और संभावित मंशा का आकलन है—क्रेमलिन द्वारा हमले का निर्णय लिए जाने का प्रमाण नहीं।
NATO की संधि का Article 5 कहता है कि यूरोप या उत्तर अमेरिका में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। प्रत्येक सदस्य हमले का सामना कर रहे देश की सहायता करेगा, लेकिन संधि हर देश को यह तय करने की अनुमति देती है कि वह कौन-सा कदम जरूरी मानता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर सदस्य के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल अनिवार्य है।
हाइब्रिड अभियानों के मामले में सीमा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। NATO के Strategic Concept में कहा गया है कि किसी सदस्य के खिलाफ हाइब्रिड अभियान सशस्त्र हमले के स्तर तक पहुंच सकते हैं और ऐसी स्थिति में North Atlantic Council Article 5 लागू करने पर विचार कर सकता है। NATO ने हाइब्रिड खतरों पर अपने सार्वजनिक बयानों में भी यही रुख दोहराया है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर साइबर हमला, ड्रोन का सीमा पार करना या तोड़फोड़ अपने-आप Article 5 को सक्रिय कर देगा। गठबंधन घटना के तथ्य, उसकी गंभीरता, जिम्मेदारी और परिणामों का आकलन करेगा। लेकिन जानबूझकर किया गया घातक हमला, क्षेत्र पर कब्जा या पर्याप्त रूप से गंभीर हाइब्रिड अभियान सामूहिक रक्षा की कार्रवाई का दबाव पैदा कर सकता है—भले ही रूस इसे “सीमित” रखना चाहता हो।
यही वह दुविधा है जिसका फायदा रूस उठाने की कोशिश कर सकता है: NATO हर अस्पष्ट घटना पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं देना चाहेगा, लेकिन स्पष्ट हमले के बाद हिचकिचाहट उसकी रोकथाम क्षमता को कमजोर कर सकती है।
NATO अधिकारियों और क्षेत्रीय सरकारों ने ऐसी गतिविधियों के एक पैटर्न की ओर इशारा किया है, जो पारंपरिक आक्रमण का प्रमाण तो नहीं है, लेकिन सुरक्षा माहौल को अधिक खतरनाक बनाता है। इसमें कथित तोड़फोड़, महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाने की धमकियां, इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप, सूचना अभियान और हवाई क्षेत्र या सीमाओं की बार-बार जांच शामिल हैं। अमेरिकी यूरोपीय कमान और NATO के सर्वोच्च कमांडर जनरल एलेक्सस जी. ग्रिंकेविच ने अमेरिकी कांग्रेस में दिए गए बयान में बाल्टिक देशों और पोलैंड में रूसी हाइब्रिड या असममित गतिविधियों के स्तर को “काफी मजबूत” बताया था।
ड्रोन से जुड़ी घटनाएं विशेष रूप से अस्थिर करने वाली रही हैं। Reuters ने बताया कि फिनलैंड, एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया के हवाई क्षेत्र में भटककर पहुंचने वाले ड्रोन से यह आशंका बढ़ी कि यूक्रेन युद्ध NATO की उत्तरी सीमाओं तक फैल सकता है। दूसरी रिपोर्टों में कहा गया कि कुछ ड्रोन रास्ते से भटक गए थे और कीव ने इसके लिए रूसी जैमिंग को जिम्मेदार ठहराया।
पिछली हवाई क्षेत्र उल्लंघन घटनाओं पर NATO की प्रतिक्रिया भी रूस के आकलन का हिस्सा हो सकती है। गठबंधन के वरिष्ठ कमांडर ने कहा कि सख्त प्रतिक्रिया से आगे की रूसी घुसपैठ को रोकने में मदद मिली, लेकिन चेतावनी दी कि मॉस्को हाइब्रिड तरीकों से NATO की सीमाएं परखना जारी रख सकता है।
इन घटनाओं को सावधानी से पढ़ना जरूरी है। वे अधिक खतरनाक सुरक्षा वातावरण के संकेत हैं, NATO पर तत्काल रूसी आक्रमण का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।
NATO का कहना है कि उसने सामूहिक रक्षा को काफी मजबूत किया है और किसी खतरे में पड़े सदस्य तक सैनिकों को तेजी से पहुंचाने की क्षमता बढ़ाई है। पूर्वी सीमा पर उसके कदमों में बहुराष्ट्रीय battlegroups की संख्या चार से बढ़ाकर नौ करना, अग्रिम रक्षा मजबूत करना तथा Eastern Sentry और Arctic Sentry जैसी गतिविधियां शुरू करना शामिल है।
गठबंधन साइबर सुरक्षा और हाइब्रिड खतरों से निपटने में सहयोग भी बढ़ा रहा है। वहीं पोलैंड और बाल्टिक सरकारें महत्वपूर्ण ढांचे को अधिक सुरक्षित बना रही हैं तथा तोड़फोड़ और फर्जी-झंडा अभियानों के लिए तैयारी कर रही हैं।
NATO का सार्वजनिक रुख रोकथाम और संयम—दोनों को साथ रखता है। महासचिव मार्क रुटे ने Article 5 के प्रति प्रतिबद्धता को “ironclad” और हर सदस्य की रक्षा करने की क्षमता को पूर्ण बताया है। साथ ही, अधिकारी लगातार होने वाले हाइब्रिड दबाव और तत्काल बड़े पैमाने के पारंपरिक आक्रमण के प्रमाण के बीच अंतर कर रहे हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों से सबसे मजबूत निष्कर्ष यह नहीं निकलता कि रूस 2030 से पहले NATO पर हमला जरूर करेगा। निष्कर्ष यह है कि साइबर हमले, तोड़फोड़, दुष्प्रचार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन, जिम्मेदारी से इनकार योग्य कार्रवाई या सीमित सैन्य उकसावे के जरिए NATO को परखने का जोखिम इतना गंभीर माना गया है कि रक्षा-योजनाओं की पुरानी धारणाएं बदलनी पड़ी हैं।
पूर्वी सीमा पर सीमित घुसपैठ कम संभावित हो सकती है, लेकिन उसके परिणाम बहुत बड़े होंगे। मॉस्को अगर कार्रवाई को व्यापक युद्ध की सीमा से नीचे रखना चाहे, तब भी ऐसी घटना Article 5 का संकट पैदा कर सकती है। NATO की रणनीति यही है कि अस्पष्टता को कम उपयोगी बनाया जाए—संवेदनशील सदस्यों को मजबूत किया जाए, महत्वपूर्ण ढांचे की सुरक्षा बढ़ाई जाए, जिम्मेदारी तय करने की क्षमता सुधारी जाए और यह दिखाया जाए कि एक सदस्य पर हमला केवल स्थानीय समस्या नहीं माना जाएगा।