वैज्ञानिकों ने एमआरआई-आधारित मल्टी-ऑर्गन क्लॉक भी विकसित की हैं, जो दिमाग, दिल, लिवर, फैट टिश्यू, स्प्लीन, किडनी और पैनक्रियाज को कवर करती हैं। इनसे पता चला कि तेजी से बूढ़ा होता दिमाग डिमेंशिया से संबंधित मृत्यु दर का कारण बन सकता है । कई अध्ययनों में दिमाग की उम्र बढ़ना मृत्यु दर का सबसे मजबूत भविष्यवक्ता उभर कर सामने आया है
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सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अलग-अलग अंगों की उम्र बढ़ने की दर आपस में बहुत कम जुड़ी होती है। 2025 के एक अध्ययन में इनके बीच संबंध की तीव्रता 0.25 से कम पाई गई, जो दर्शाता है कि अंगों का बुढ़ापा काफी हद तक स्वतंत्र होता है और हर व्यक्ति में अलग-अलग होता है ।
इसका मतलब है कि एक ही व्यक्ति का दिल 'जवान' और किडनी 'बूढ़ी' हो सकती है। यही वजह है कि उम्र से जुड़ी बीमारियां अलग-अलग लोगों में अलग-अलग समय पर क्यों दिखाई देती हैं—जो अंग सबसे तेजी से बूढ़ा होता है, वही सबसे पहले फेल होता है ।
AI-संचालित इन खोजों ने 'एजियोटाइप' (Ageotype) की अवधारणा को जन्म दिया है, जो किसी व्यक्ति के अंगों में बुढ़ापे की अनूठी यात्रा को दर्शाता है । यह वैयक्तिकृत प्रोफ़ाइल एंटी-एजिंग दवा को 'एक आकार सबके लिए' वाले दृष्टिकोण से बदलकर अधिक लक्षित बना सकती है। भविष्य में, जिस व्यक्ति का दिमाग तेजी से बूढ़ा हो रहा हो, उसे शुरुआती संज्ञानात्मक हस्तक्षेप (cognitive interventions) दिए जा सकते हैं, जबकि जिसकी किडनी समय से पहले बूढ़ी हो रही हो, उसकी किडनी की कार्यक्षमता पर अधिक बारीकी से नज़र रखी जा सकती है ।
ये निष्कर्ष एक ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयास की परिणति हैं। Nature Aging में 2025 में प्रकाशित सबसे बड़े अध्ययन में 43,498 UK बायोबैंक प्रतिभागियों से 2,448 प्लाज़्मा प्रोटीन का उपयोग करके मल्टी-ऑर्गन प्रोटिओमिक एजिंग क्लॉक विकसित की गईं । जैसे-जैसे डेटा सेट बड़े और विविध होंगे, और AI मॉडल अधिक परिष्कृत होंगे, ये घड़ियाँ और अधिक सटीक होती जाएंगी। बुढ़ापे को एक समान प्रक्रिया मानने का दौर खत्म हो रहा है और हमारे शरीर की वास्तविक उम्र बढ़ने की एक नई, अधिक सटीक समझ शुरू हो चुकी है।