तेहरान का यह संदेश केवल सैन्य धमकी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दबाव अभियान भी है। ईरान चाहता है कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर नए हमले रोकने और बातचीत जारी रखने का दबाव डालें ।
ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि अमेरिकी हमलों का जवाब “अनुपातिक कार्रवाई” से दिया जाएगा। ईरान से जुड़े सरकारी मीडिया ने भी चेताया है कि उसके ऊर्जा ठिकानों पर हमला हुआ तो दूसरे देशों के ऊर्जा क्षेत्रों को निशाना बनाया जा सकता है । 1 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने अपने महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे पर अमेरिकी हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई का वादा करते हुए “युद्ध की लपटों” की चेतावनी दी थी ।
ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ ने 22 जुलाई को कहा था कि जब तक ईरान की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक “कोई भी बुनियादी ढांचा सुरक्षित नहीं रहेगा” ।
28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हवाई हमले शुरू किए। इन अभियानों को अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और इज़राइल ने लायन्स रोअर नाम दिया। हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की मौत हुई और इसके बाद ईरान ने पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए ।
इसके बाद संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में बदल गया। ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों और अन्य लक्ष्यों पर हमले किए, जबकि अमेरिका और इज़राइल ने ईरान में हवाई अभियान जारी रखे। इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर समुद्री व्यापार पर पड़ा है। ईरान ने मार्च में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा व्यापार के इस अहम मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई ।
17–18 जून को अमेरिका और ईरान ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में इस्लामाबाद मेमोरेंडम नामक 14 सूत्री समझौता-ढांचा स्वीकार किया था। इसमें अस्थायी युद्धविराम और अंतिम समझौते के लिए 60 दिनों की बातचीत का प्रावधान था ।
लेकिन यह ढांचा जल्दी ही अटक गया। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने 18 जून को समझौते के क्रियान्वयन पर चर्चा के लिए स्विट्ज़रलैंड की प्रस्तावित यात्रा रद्द कर दी। इसके पीछे जारी तनाव को वजह बताया गया । 60 दिन की समयसीमा के बावजूद अब तक स्थायी शांति समझौता नहीं हो सका है।
ईरान ने 28 फरवरी से सामान्य जहाजरानी को प्रभावी रूप से रोक रखा है। इस बीच अमेरिका ने 13 अप्रैल से 29 मई तक ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी भी की थी । जून के समझौता-ढांचे में जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की प्रक्रिया शुरू करने की बात थी, लेकिन वार्ता अभी भी गतिरोध में है।
ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि 60 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूला जा सकता है। इस मुद्दे पर टकराव जारी है । होर्मुज़ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, इसलिए यहां लंबे समय तक रुकावट से तेल आपूर्ति, कीमतों और वैश्विक व्यापार पर असर पड़ सकता है।
जेडी वेंस का आकलन है कि ख़ामेनेई की हत्या, उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई के विवादित उत्तराधिकार और ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, नई राजनीतिक नेतृत्व व्यवस्था तथा धार्मिक प्रतिष्ठान के बीच मतभेदों ने देश की सत्ता-व्यवस्था को “बिखरा हुआ” बना दिया है ।
अमेरिकी संदेह का एक कारण यह भी है कि ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष किसी भी समझौते को लागू करना और उसे लंबे समय तक टिकाए रखना कठिन बना सकते हैं। वेंस की यात्रा रद्द होना और ईरान की प्रतिबद्धताओं को लेकर उनकी सार्वजनिक शंकाएं इसी चिंता को दर्शाती हैं ।
28 जुलाई 2026 के आसपास राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के ऊर्जा नेटवर्क पर हमला करने की धमकी दी थी। उन्होंने ईरानी ऊर्जा ढांचे को “बड़े पैमाने पर उड़ा देने” की बात कही । यह धमकी ऐसे समय आई, जब जुलाई के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच फिर से हमलों का दौर शुरू हो गया था। 21 जुलाई को अमेरिकी बलों ने दक्षिणी ईरान में लक्ष्यों पर बमबारी की थी ।
इसके बाद 1 अगस्त 2026 को ट्रंप ने कहा कि अमेरिका नए हमले फिलहाल रोक रहा है, ताकि जल्द समझौते की संभावना तलाश की जा सके । हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कूटनीति के लिए समय सीमित है। इसी दौरान ईरान ने खाड़ी देशों के खिलाफ अपने बुनियादी ढांचे से जुड़े चेतावनी संदेश को और तेज कर दिया।
रॉयटर्स से बात करने वाले खाड़ी अधिकारियों और विश्लेषकों के अनुसार, ईरान यह दांव लगा रहा है कि वह सैन्य ताकत के बजाय आर्थिक दबाव के जरिए अमेरिका को रियायतों के लिए मजबूर कर सकता है । इसके लिए वह व्यापार मार्गों, समुद्री यातायात और ऊर्जा ढांचे को ऐसे दबाव-बिंदुओं में बदलना चाहता है, जिनसे टकराव की कीमत लगातार बढ़ती जाए।
रणनीति का उद्देश्य अमेरिका और उसके सहयोगियों को यह महसूस कराना है कि संकट को नियंत्रित करने की लागत, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की मांगों को स्वीकार करने से अधिक हो सकती है । 5–6 अगस्त की खाड़ी देशों को दी गई चेतावनी इसी अभियान की नई कड़ी है।
एक ओर ईरान खाड़ी देशों के प्रभाव का इस्तेमाल कर वॉशिंगटन को बातचीत की मेज पर लौटाना चाहता है; दूसरी ओर वह यह संकेत भी दे रहा है कि ट्रंप ने हमले फिर शुरू किए तो संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदलने की तैयारी है ।