बीटा पिक्टोरिस तारे के आसपास धूल की एक लंबी, मुड़ी हुई लकीर है, जिसे खगोलविदों ने ‘कैट्स टेल’ यानी बिल्ली की पूँछ नाम दिया है। अब हबल अंतरिक्ष दूरबीन ने इसे पहली बार दृश्य रोशनी में दर्ज किया है। इससे पहले जेम्स वेब दूरबीन ने इसी संरचना को इन्फ्रारेड में देखा था। बीटा पिक्टोरिस हमसे लगभग 63 प्रकाश-वर्ष दूर है।
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एरिन अवसार के नेतृत्व वाली टीम ने हबल की छह बार की टिप्पणियों को जोड़ा, जो 2012 से 2025 के बीच की गई थीं। अध्ययन में हबल के स्पेस टेलीस्कोप इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ (STIS) से मिली बिखरी हुई रोशनी का विश्लेषण किया गया।
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एक ही धूल, दो अलग तरह के नज़ारे
वेब का मिड-इन्फ्रारेड उपकरण धूल से निकलने वाली ऊष्मा को दर्ज करता है। हबल का STIS इसके उलट, तारे की रोशनी को धूल से बिखरते हुए देखता है। दोनों दूरबीनों के अवलोकन एक ही संरचना को अलग-अलग तरंगदैर्घ्य पर समझने में मदद करते हैं।
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हबल की तस्वीरों में पूँछ, वेब के इन्फ्रारेड दृश्य की तुलना में छोटी दिखती है। इसका एक कारण यह है कि तारे से दूर जाती धूल कम रोशनी परावर्तित करती है, इसलिए दृश्य रोशनी में उसका पता लगाना कठिन होता है।
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टकराव की संभावना—पक्की देखी गई घटना नहीं
शोधकर्ताओं की एक व्याख्या यह है कि यह धूलभरी संरचना बड़े पिंडों के टकराने के बाद बनी हो सकती है। एरिज़ोना विश्वविद्यालय के विवरण में दो या उससे अधिक प्लूटो-जैसे पिंडों के टूटकर बहुत महीन धूल बनने की संभावना बताई गई है। लेकिन वैज्ञानिकों ने टकराव को होते हुए नहीं देखा; यह उपलब्ध संरचना के आधार पर प्रस्तावित कारण है।
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एक रिपोर्ट के मुताबिक, धूल में कार्बन की लंबी शृंखलाएँ दृश्य रोशनी सोख सकती हैं। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि ‘कैट्स टेल’ को दृश्य रोशनी में देखना पहले मुश्किल क्यों रहा।
18 हालांकि, उपलब्ध जानकारी धूल के हर कण की बनावट या उसके बनने की पूरी प्रक्रिया को निश्चित नहीं करती।
युवा ग्रह-तंत्र को समझने की एक और खिड़की
बीटा पिक्टोरिस का मलबे का चक्र और इसके ग्रह खगोलविदों को यह जाँचने का अवसर देते हैं कि ग्रह आसपास की धूल और मलबे को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, और ग्रह-निर्माण के बाद बड़े पिंडों के टकराव किस तरह होते हैं। यह तंत्र ग्रहों और उनके आसपास की डिस्क के बीच होने वाली परस्पर क्रियाओं तथा संभावित टक्करों के अध्ययन के लिए उपयोगी है।
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‘कैट्स टेल’ को इन्फ्रारेड और दृश्य रोशनी—दोनों में देख पाना इस अध्ययन में नया प्रमाण जोड़ता है। इससे यह अपने-आप साबित नहीं होता कि कौन-से पिंड टकराए थे या धूल का पूरा इतिहास क्या है। लेकिन अलग-अलग तरंगदैर्घ्य पर इसकी तुलना करके शोधकर्ता इस असामान्य संरचना और ग्रह-तंत्रों के बदलावों को बेहतर समझ सकते हैं।