यूएन महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय कानून, जलवायु विज्ञान और जलवायु न्याय के लिए “मजबूत समर्थन” बताया।
हालाँकि महासभा के प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन इतने बड़े बहुमत से पारित होने के कारण इसका राजनीतिक और नैतिक महत्व काफी बढ़ जाता है।
इस पूरे प्रयास की शुरुआत प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देश वानुअतु से हुई। यह देश समुद्र‑स्तर बढ़ने और चरम मौसम जैसी जलवायु आपदाओं के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है।
जलवायु परिवर्तन से अस्तित्व पर खतरा महसूस करते हुए वानुअतु ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की कि विश्व न्यायालय यह स्पष्ट करे कि जलवायु संकट से निपटने के लिए देशों की कानूनी जिम्मेदारी क्या है।
आईसीजे ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत देशों पर यह जिम्मेदारी है कि वे जलवायु प्रणाली की रक्षा करें और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पैदा करने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करें।
मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह राय सरकारों पर दबाव बढ़ाती है कि वे पेरिस समझौते के 1.5°C लक्ष्य के अनुरूप नीतियाँ अपनाएँ—जैसे तेज़ी से उत्सर्जन कम करना और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाना।
महासभा का प्रस्ताव देशों से अदालत की राय के अनुरूप कार्रवाई करने की अपील करता है। इसमें सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे:
हालाँकि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है, लेकिन समर्थकों का मानना है कि इससे भविष्य में जलवायु जवाबदेही और कानूनी दावों के लिए मजबूत आधार बन सकता है।
भारी समर्थन के बावजूद आठ देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ईरान और सऊदी अरब शामिल थे।
रिपोर्टों के अनुसार, मतदान से पहले कुछ बड़े उत्सर्जक देशों ने प्रस्ताव को कमजोर करने या टालने की कोशिश भी की थी।
इन देशों की मुख्य चिंताएँ थीं:
भले ही यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन 141 देशों का समर्थन एक बड़ा संकेत है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि जलवायु की रक्षा करना अब केवल पर्यावरण नीति का सवाल नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून की जिम्मेदारी भी है।
जलवायु संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों—खासकर छोटे द्वीपीय राष्ट्रों—के लिए यह निर्णय वैश्विक स्तर पर जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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