उन्होंने कहा है कि यदि बातचीत होती है तो वे ट्रंप को बताएंगे कि बीजिंग की सैन्य गतिविधियां और दबाव की रणनीति ताइवान स्ट्रेट में शांति को कमजोर कर रही हैं और क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा कर रही हैं ।
ताइवान के नेता अक्सर यह तर्क देते हैं कि ऐसी गतिविधियां सिर्फ ताइवान ही नहीं बल्कि पूरे इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित करती हैं।
लाइ यह भी बताना चाहते हैं कि ताइवान अपना रक्षा बजट बढ़ा रहा है और अमेरिका से हथियार खरीद जारी रखना चाहता है।
उनके अनुसार ताइवान की रक्षा क्षमता को मजबूत करना युद्ध भड़काने के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष को रोकने के लिए है। उन्होंने अमेरिकी हथियारों की खरीद को “शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक” बताया है और इसे विश्वसनीय प्रतिरोध की रणनीति का हिस्सा कहा है ।
ताइवान का तर्क है कि मजबूत रक्षा क्षमता संभावित विरोधियों की गलत गणना को रोकती है और स्थिरता बनाए रखने में मदद करती है।
लाइ के बयान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ताइवान की राजनीतिक स्थिति और आत्मनिर्णय के अधिकार से जुड़ा है।
उन्होंने कहा है कि किसी भी देश को ताइवान को अपने में मिलाने का अधिकार नहीं है और द्वीप का भविष्य “बाहरी ताकतों” द्वारा तय नहीं किया जा सकता ।
ताइपे की आधिकारिक स्थिति यह है कि ताइवान पहले से ही एक लोकतांत्रिक और स्वशासित व्यवस्था है, इसलिए उसके भविष्य का निर्णय उसके अपने नागरिकों को करना चाहिए।
यदि ट्रंप और लाइ के बीच सीधी बातचीत होती है तो उसे कूटनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाएगा।
अमेरिका ने 1979 में ताइपे से राजनयिक मान्यता हटाकर बीजिंग को मान्यता दी थी, और उसके बाद से वॉशिंगटन आम तौर पर ताइवान के राष्ट्रपति के साथ सीधे नेता‑स्तर पर संपर्क से बचता रहा है, ताकि चीन के साथ संबंधों का संतुलन बना रहे ।
हालांकि 2016 में डोनाल्ड ट्रंप ने ताइवान की तत्कालीन राष्ट्रपति त्साई इंग‑वेन से फोन पर बात की थी, लेकिन वह बातचीत उनके राष्ट्रपति पद संभालने से पहले हुई थी । इसलिए पद पर रहते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति और ताइवान के राष्ट्रपति के बीच सीधी बातचीत अब भी एक असामान्य कदम माना जाएगा।
ताइवान का यह रुख उसकी व्यापक रणनीति को दिखाता है—अमेरिका के साथ करीबी संवाद बनाए रखना, क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर देना और चीन के संप्रभुता दावों का विरोध करना।
यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप और लाइ के बीच वास्तव में कॉल होगी या नहीं। लेकिन लाइ द्वारा बताए गए संदेश—ताइवान स्ट्रेट की स्थिरता, चीन की गतिविधियों को लेकर चेतावनी, अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग और ताइवान के आत्मनिर्णय का अधिकार—संभावित बातचीत के मुख्य विषय बन सकते हैं।
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