रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ हमले अप्रैल की शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के आसपास हुए, जिससे पता चलता है कि कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद क्षेत्र में कई मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां जारी थीं।
रिपोर्ट के अनुसार कुवैत ने भी मिलिशिया हमलों के बाद दक्षिणी इराक की ओर रॉकेट दागकर जवाबी कार्रवाई की। यह कार्रवाई उन हमलों के बाद हुई जिन्हें कुवैत और अन्य खाड़ी देशों ने ईरान‑समर्थित समूहों से जोड़ा।
इन घटनाओं को क्षेत्र में बढ़ते तनाव के हिस्से के रूप में देखा गया, जहां ड्रोन, मिसाइल और अन्य हथियारों से खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे और सैन्य ठिकानों पर हमले किए जा रहे थे।
इराक में सक्रिय कई सशस्त्र समूहों के ईरान से करीबी संबंध माने जाते हैं। इनमें सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक काताइब हिज़्बुल्लाह (Kataib Hezbollah) है। यह समूह पहले भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर हमलों से जुड़ा रहा है।
ऐसे संगठन मध्य पूर्व में फैले उस व्यापक नेटवर्क का हिस्सा माने जाते हैं जिसे अक्सर ईरान के “प्रॉक्सी बलों” के रूप में वर्णित किया जाता है। खाड़ी देशों का आरोप है कि युद्ध के दौरान इन समूहों ने इराकी क्षेत्र से ड्रोन और मिसाइल हमले शुरू किए।
रिपोर्ट में कहा गया कि सऊदी और कुवैत की कार्रवाइयों का उद्देश्य इन हमलों की क्षमता को कमजोर करना और भविष्य के हमलों को रोकना था।
इन सीमापार हमलों से स्पष्ट होता है कि ईरान से जुड़ा संघर्ष धीरे‑धीरे एक बहु‑स्तरीय क्षेत्रीय टकराव में बदल गया। जबकि सबसे ज्यादा ध्यान ईरान‑इज़राइल‑अमेरिका के बीच सीधे संघर्ष पर था, उसी समय खाड़ी क्षेत्र में कम दिखाई देने वाली लेकिन महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियां चल रही थीं।
इस परिदृश्य में इराक का क्षेत्र कई ईरान‑समर्थित मिलिशिया के लिए संचालन आधार बन गया, वहीं खाड़ी देशों ने संकेत दिया कि वे ऐसे समूहों को सीधे निशाना बनाने के लिए सीमापार कार्रवाई करने को तैयार हैं।
इस तरह यह संघर्ष केवल एक युद्ध नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र में फैले प्रॉक्सी नेटवर्क और प्रत्यक्ष जवाबी हमलों के साथ एक व्यापक भू‑राजनीतिक टकराव में बदलता दिखाई दिया।
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