उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब शीत युद्ध की समाप्ति के बाद यूरोप में सैन्य खर्च सबसे तेज़ गति से बढ़ रहा है।
यूरोप में बढ़ते रक्षा बजट की पृष्ठभूमि में NATO के भीतर चल रही बहस भी है। कई वर्षों से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प यूरोपीय देशों पर दबाव डालते रहे हैं कि वे गठबंधन की सुरक्षा लागत में अधिक योगदान दें।
हाल की NATO चर्चाओं में सदस्य देशों ने रक्षा खर्च के लिए और अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर सहमति जताई है। प्रस्ताव है कि 2035 तक GDP का लगभग 5% रक्षा और उससे जुड़े निवेशों पर खर्च किया जाए, जो पुराने 2% लक्ष्य से कहीं अधिक है।
इसी दबाव और नई रणनीति के कारण यूरोप के रक्षा बजट में तेज़ उछाल आया है। 2025 में यूरोप का कुल सैन्य खर्च लगभग 563 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.6% अधिक है।
पोप लियो के अनुसार, यह प्रवृत्ति दुनिया को हथियारों की प्रतिस्पर्धा की ओर ले जा सकती है, जबकि असली जरूरत संवाद और कूटनीति को मजबूत करने की है।
पोप ने केवल पारंपरिक हथियारों की दौड़ पर ही चिंता नहीं जताई। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित हथियार प्रणालियों के तेज़ विकास को भी बेहद खतरनाक बताया।
उनके शब्दों में, अगर AI का इस्तेमाल युद्ध को और तेज़ व अधिक घातक बनाने में हुआ, तो मानवता “विनाश के चक्र” (spiral of annihilation) की ओर बढ़ सकती है।
दुनिया भर में वैज्ञानिकों और नीति विशेषज्ञों के बीच भी इस मुद्दे पर बहस चल रही है। स्वायत्त हथियार (autonomous weapons) और AI‑आधारित लक्ष्य निर्धारण प्रणालियाँ युद्ध को इतना तेज़ बना सकती हैं कि मानव नियंत्रण कमजोर पड़ जाए और संघर्ष तेजी से बढ़ सकता है।
पोप लियो XIV का संदेश केवल बजट की आलोचना तक सीमित नहीं था। उनका तर्क है कि दीर्घकालिक वैश्विक सुरक्षा हथियारों से नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और मजबूत कूटनीतिक संस्थाओं से आती है।
पारंपरिक हथियारों की होड़ और AI‑आधारित युद्ध दोनों को लेकर चेतावनी देते हुए उन्होंने दुनिया के सामने एक स्पष्ट विकल्प रखा: या तो देश सैन्य प्रतिस्पर्धा को और तेज़ करें, या फिर शांति और कूटनीति में निवेश बढ़ाएँ।
कैथोलिक चर्च लंबे समय से शांति‑निर्माण और युद्ध से बचाव की वकालत करता रहा है, और पोप लियो XIV का यह बयान उसी परंपरा का नया उदाहरण माना जा रहा है।
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