नुकसान का कुल आंकड़ा औसत से कम जरूर रहा, लेकिन कई गंभीर घटनाएं सामने आईं:
म्यूनिख रे की मुख्य चिंता प्रशांत महासागर में बन रही मजबूत सुपर अल नीनो स्थिति को लेकर है। अमेरिकी जलवायु पूर्वानुमान केंद्र के अनुसार, यह 75 वर्षों से अधिक समय में बनने वाले सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है ।
अल नीनो प्रशांत महासागर के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव लाने वाला जलवायु चक्र है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों में तापमान, बारिश, तूफानों और सूखे के पैटर्न पर पड़ सकता है।
म्यूनिख रे के मुख्य जलवायु वैज्ञानिक टोबियास ग्रिम ने इसे “खतरनाक मेल” बताते हुए कहा कि ग्लोबल वार्मिंग जारी रहने के साथ दुनिया सुपर अल नीनो की ओर बढ़ रही है, जो तापमान को और ऊपर ले जाएगा। उनके अनुसार, इसका असर साल की दूसरी छमाही में स्पष्ट रूप से महसूस हो सकता है ।
पूर्वानुमानों में 2026 के अंत तक रिकॉर्ड स्तर की अल नीनो स्थितियों का संकेत है। इसका चरम नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच आने की उम्मीद है ।
म्यूनिख रे के मुताबिक, सुपर अल नीनो मौसम संबंधी जोखिमों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में स्थानांतरित करेगा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर इसका असर विशेष रूप से गंभीर हो सकता है।
म्यूनिख रे के एशिया-प्रशांत, मध्य पूर्व और अफ्रीका कारोबार के बोर्ड सदस्य आखिम कासो ने जापान और दक्षिण कोरिया में टाइफून का जोखिम बढ़ने की आशंका जताई। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया, भारत और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में लू, सूखे और जंगल की आग के खतरे की भी चेतावनी दी ।
म्यूनिख रे का निष्कर्ष है कि अल नीनो एशिया में मौसम संबंधी जोखिमों का वितरण बदलता है। 2026 की दूसरी छमाही में एशिया-प्रशांत के कई हिस्सों में प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है ।
इसका मतलब यह है कि पहली छमाही में अपेक्षाकृत कम नुकसान को पूरे साल के लिए राहत का संकेत नहीं माना जा सकता। सुपर अल नीनो की आशंका के बीच सरकारों, स्थानीय प्रशासन और बीमा बाजारों को बाढ़, सूखे, टाइफून, लू और जंगल की आग जैसे अलग-अलग जोखिमों के लिए तैयार रहना होगा।