इन मतभेदों की वजह से EU अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि:
यूरोप के कई प्रमुख नेताओं ने इस मुद्दे पर अलग‑अलग दृष्टिकोण रखे हैं।
एंतोनियो कोस्टा, जो यूरोपीय परिषद (European Council) के अध्यक्ष हैं, ने EU देशों से स्पष्ट रणनीति तय करने की अपील की है। उनका कहना है कि यूरोप को यह निर्णय लेना होगा कि रूस के साथ संवाद करना है या नहीं और किस तरीके से करना है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब्ब भी उन नेताओं में शामिल रहे हैं जो मानते हैं कि किसी समय प्रत्यक्ष कूटनीतिक संपर्क आवश्यक हो सकता है, हालांकि इस पर पूरे EU में सहमति नहीं है।
खुद काया कैलस का रुख फिलहाल सावधानी भरा है। उनका कहना है कि रूस से बात करने से पहले EU देशों को आपस में यह तय करना होगा कि वे मॉस्को से क्या मांगें और उनका साझा लक्ष्य क्या होगा।
उनके शब्दों में: “सबसे पहले हमें रूस से बात करने से पहले आपस में यह तय करना चाहिए कि हम उनसे किस विषय पर बात करना चाहते हैं।”
मॉस्को ने संकेत दिया है कि वह ऐसे वार्ताकार को प्राथमिकता देगा जिसने रूस के खिलाफ तीखे सार्वजनिक बयान न दिए हों।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सुझाव दिया था कि जर्मनी के पूर्व चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर यूरोप और रूस के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।
यह प्रस्ताव इस बात को दर्शाता है कि रूस अपेक्षाकृत कम टकराव वाले या अधिक तटस्थ माने जाने वाले व्यक्तियों के साथ बातचीत को प्राथमिकता देता है।
EU के विदेश मंत्रियों की एक अनौपचारिक बैठक 27–28 मई 2026 को साइप्रस में होने वाली है, जिसमें रूस से संभावित प्रत्यक्ष वार्ता के सवाल पर चर्चा की जाएगी।
इस बैठक का उद्देश्य यह तय करना है कि यूरोपीय संघ को बातचीत शुरू करनी चाहिए या नहीं, और यदि करनी हो तो मॉस्को के सामने उसकी शर्तें और मांगें क्या होंगी।
जब तक EU अपने भीतर इन सवालों पर सहमति नहीं बना लेता, तब तक यूक्रेन युद्ध से जुड़े किसी भी संभावित वार्ता प्रक्रिया में उसकी भूमिका अनिश्चित बनी रह सकती है — और यही स्थिति क्रेमलिन की हालिया टिप्पणियों तथा यूरोप के अंदर चल रही बहस दोनों में दिखाई देती है।
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