यह निश्चित वैश्विक खाद्य-संकट का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि एक सशर्त चेतावनी है। असली चिंता यह है कि बुआई या फसल में उर्वरक डालने के अहम समय पर आपूर्ति बाधित हुई, तो उसका असर उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंचने से कई महीने पहले ही कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।
JPMorgan ने जोखिम को पांच परस्पर जुड़े कारकों के रूप में रखा है: War यानी युद्ध, Weather यानी मौसम, Warehousing यानी भंडारण, Water यानी पानी और Waste यानी बर्बादी। फिलहाल सबसे बड़ा ध्यान होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास शिपिंग बाधा और संभावित शक्तिशाली अल नीनो पर है। दोनों झटके साथ आए, तो कृषि उत्पादन क्षमता घट सकती है और 2027 तक खाद्य कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
रिपोर्ट का व्यापक तर्क यह है कि कोविड-19 के बाद लगातार आए झटकों ने वैश्विक खाद्य-आपूर्ति तंत्र की मजबूती कम कर दी है। इसलिए अगला व्यवधान किसी सामान्य आपूर्ति-श्रृंखला को नहीं, बल्कि पहले से तनाव झेल रहे उत्पादकों, भंडार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को प्रभावित करेगा।
नाइट्रोजन उर्वरक के उत्पादन में प्राकृतिक गैस की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए उर्वरक बाजार ऊर्जा कीमतों और भौतिक आपूर्ति में रुकावट—दोनों के प्रति संवेदनशील है। JPMorgan के संबंधित विश्लेषण के अनुसार, मध्य पूर्व वैश्विक यूरिया निर्यात का लगभग 42% और अमोनिया निर्यात का 27% हिस्सा उपलब्ध कराता है।
यदि शिपिंग मार्ग या उत्पादन संयंत्र बाधित होते हैं, तो असर की कड़ी इस तरह बन सकती है:
विश्व बैंक के हवाले से दी गई बाजार जानकारी के अनुसार, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े आपूर्ति व्यवधानों के बाद अप्रैल में नाइट्रोजन यूरिया की कीमत 850 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से ऊपर चली गई—फरवरी की तुलना में 80% अधिक। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने भी संबंधित अवधि में क्षेत्रीय निर्यात में तेज गिरावट बताई, जिसमें तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यात में 95%, यूरिया में 83% और अमोनिया में 75% की कमी शामिल थी।
ये आंकड़े रिपोर्ट किए गए व्यवधानों और कीमतों की चाल को दर्शाते हैं; इनसे अपने-आप यह साबित नहीं होता कि वैश्विक फसल पैदावार किसी निश्चित मात्रा में घटेगी। मुख्य जोखिम यह है कि अस्थायी लॉजिस्टिक समस्या, बुआई के समय और सीमित वैकल्पिक आपूर्ति के साथ मिलकर उत्पादन संकट बन जाए।
संघर्ष या नाकेबंदी कम होते ही उर्वरक आपूर्ति सामान्य हो जाए, यह जरूरी नहीं है। JPMorgan का अनुमान है कि क्षतिग्रस्त उर्वरक उत्पादन को पूरी क्षमता पर लौटने में एक से चार वर्ष लग सकते हैं। कुछ प्राकृतिक गैस संयंत्रों में कुओं को हुए नुकसान को भी शामिल किया जाए, तो उन्हें बहाल करने में तीन से पांच वर्ष लग सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि कमी पूरे समय तक बनी ही रहेगी। लेकिन क्षतिग्रस्त संयंत्र, अनुपलब्ध कच्चा माल और बाधित व्यापार मार्ग आपूर्ति को जल्दी बहाल न होने दें, तो कुछ समय का व्यवधान भी लंबे असर में बदल सकता है। कृषि कैलेंडर इसे और गंभीर बनाता है: बुआई या उर्वरक डालने की खिड़की में हुई देरी, मौसम के अपेक्षाकृत शांत दौर की समान देरी से कहीं अधिक नुकसानदेह हो सकती है।
अल नीनो इस ‘कंपाउंडिंग शॉक’ का मौसम संबंधी हिस्सा है। शक्तिशाली अल नीनो प्रमुख कृषि क्षेत्रों में मौसम के पैटर्न को बदल सकता है, जिससे पैदावार घटने या उतार-चढ़ाव बढ़ने का जोखिम होगा। यह जोखिम उन फसलों के लिए और बड़ा हो सकता है जिन पर पहले से महंगे उर्वरक, ईंधन और परिवहन लागत का दबाव है। JPMorgan और उसके विश्लेषण पर आधारित रिपोर्टों ने चेताया है कि दोनों झटके मिलकर 2027 की पहली छमाही तक खाद्य महंगाई को ऊंचा रख सकते हैं।
उपलब्ध सामग्री में NOAA की वास्तविक सलाह, ‘सुपर’ अल नीनो की संभावना या उसके 2027 तक बने रहने की संभावना स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन विशिष्ट संभावनाओं को इस साक्ष्य-समूह से सत्यापित नहीं किया जा सकता।
जो बात समर्थित है, वह दोनों जोखिमों का आपसी असर है: मौसम का झटका आपूर्ति घटा सकता है, जबकि ऊर्जा और उर्वरक का झटका भोजन उगाने और ढोने की लागत बढ़ा सकता है। साथ आने पर यह स्थिति किसी एक जोखिम की तुलना में अधिक महंगाईकारी हो सकती है। एक उपलब्ध रिपोर्ट में संयुक्त ऊर्जा और अल नीनो परिदृश्य से खाद्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर लगभग 1.5 प्रतिशत अंक का अतिरिक्त असर बताया गया है, लेकिन इसे JPMorgan के परिदृश्य के रूप में पढ़ना चाहिए, स्वतंत्र रूप से पुष्ट परिणाम के रूप में नहीं।
JPMorgan के अनुसार उभरते बाजारों पर जोखिम अधिक हो सकता है, क्योंकि वहां घरेलू खर्च में भोजन का हिस्सा आम तौर पर बड़ा होता है और कृषि उत्पादन मौसम तथा आयातित इनपुट के प्रति संवेदनशील हो सकता है। उपलब्ध रिपोर्टिंग में भारत, ब्राज़ील और इंडोनेशिया को जोखिम वाले बाजारों के रूप में शामिल किया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि इन तीनों देशों में खाद्य संकट निश्चित है। जोखिम के प्रमुख रास्ते हैं:
उपलब्ध अंश सामान्य जोखिम का समर्थन करते हैं, लेकिन भारत, ब्राज़ील और इंडोनेशिया के लिए पूरी तरह स्वतंत्र और देश-दर-देश पूर्वानुमान उपलब्ध नहीं कराते।
नहीं। JPMorgan की भाषा ऐसे जोखिम का वर्णन करती है जो अगले करीब एक वर्ष में तेज हो सकता है और 2027 में अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है। रिपोर्ट यह स्थापित नहीं करती कि वैश्विक कमी पहले से अपरिहार्य है।
मौजूदा अनाज भंडार और राष्ट्रीय या क्षेत्रीय खाद्य भंडार शुरुआती झटके को सीमित कर सकते हैं। लेकिन भंडार तभी तक कीमतों को संभाल सकते हैं, जब तक वे पर्याप्त हों और व्यापार जारी रहे। लंबे समय तक उर्वरक की कमी, महंगा ईंधन, निर्यात नियंत्रण, कमजोर फसल या लंबा संघर्ष इन सुरक्षा-कवचों को धीरे-धीरे कम कर सकता है।
यही वजह है कि रिपोर्ट किसी एक ट्रिगर के बजाय कई झटकों के एक-दूसरे को बढ़ाने पर जोर देती है। शिपिंग मार्ग दोबारा खुलने से एक अड़चन दूर हो सकती है, लेकिन इससे क्षतिग्रस्त उत्पादन तुरंत ठीक नहीं होगा, छूटे हुए उर्वरक प्रयोग की भरपाई नहीं होगी और खराब फसल वापस नहीं आ जाएगी।
उपलब्ध जानकारी से चार मुख्य निष्कर्ष निकलते हैं:
उपलब्ध साक्ष्य चीनी कृषि शेयरों—जैसे क्यूले सीड, शेननोंग सीड या जिंजियान राइस—में किसी खास तेजी की पुष्टि नहीं करते। इसी तरह क्षेत्रीय उर्वरक हिस्सेदारी, फसल में उर्वरक डालने के कैलेंडर या NOAA की संभावनाओं से जुड़े हर विस्तृत दावे की स्वतंत्र पुष्टि भी उपलब्ध नहीं है।
इसलिए व्यावहारिक निष्कर्ष ‘वैश्विक खाद्य संकट तय है’ से अधिक सीमित, लेकिन अधिक उपयोगी है। JPMorgan चेतावनी दे रहा है कि युद्ध, ऊर्जा, उर्वरक, शिपिंग और मौसम के जोखिम एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं—जिससे 2027 तक खाद्य महंगाई बढ़े और फसल उत्पादन कमजोर हो। अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि व्यवधान कितने लंबे चलते हैं, वैकल्पिक आपूर्ति समय पर पहुंचती है या नहीं और अगली बुआई व कटाई से पहले भंडार इस झटके को कितना संभाल पाते हैं।
यह निश्चित वैश्विक खाद्य-संकट का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि एक सशर्त चेतावनी है। असली चिंता यह है कि बुआई या फसल में उर्वरक डालने के अहम समय पर आपूर्ति बाधित हुई, तो उसका असर उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंचने से कई महीने पहले ही कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।
JPMorgan ने जोखिम को पांच परस्पर जुड़े कारकों के रूप में रखा है: War यानी युद्ध, Weather यानी मौसम, Warehousing यानी भंडारण, Water यानी पानी और Waste यानी बर्बादी। फिलहाल सबसे बड़ा ध्यान होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास शिपिंग बाधा और संभावित शक्तिशाली अल नीनो पर है। दोनों झटके साथ आए, तो कृषि उत्पादन क्षमता घट सकती है और 2027 तक खाद्य कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
रिपोर्ट का व्यापक तर्क यह है कि कोविड-19 के बाद लगातार आए झटकों ने वैश्विक खाद्य-आपूर्ति तंत्र की मजबूती कम कर दी है। इसलिए अगला व्यवधान किसी सामान्य आपूर्ति-श्रृंखला को नहीं, बल्कि पहले से तनाव झेल रहे उत्पादकों, भंडार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को प्रभावित करेगा।
नाइट्रोजन उर्वरक के उत्पादन में प्राकृतिक गैस की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए उर्वरक बाजार ऊर्जा कीमतों और भौतिक आपूर्ति में रुकावट—दोनों के प्रति संवेदनशील है। JPMorgan के संबंधित विश्लेषण के अनुसार, मध्य पूर्व वैश्विक यूरिया निर्यात का लगभग 42% और अमोनिया निर्यात का 27% हिस्सा उपलब्ध कराता है।
यदि शिपिंग मार्ग या उत्पादन संयंत्र बाधित होते हैं, तो असर की कड़ी इस तरह बन सकती है:
विश्व बैंक के हवाले से दी गई बाजार जानकारी के अनुसार, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े आपूर्ति व्यवधानों के बाद अप्रैल में नाइट्रोजन यूरिया की कीमत 850 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से ऊपर चली गई—फरवरी की तुलना में 80% अधिक। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने भी संबंधित अवधि में क्षेत्रीय निर्यात में तेज गिरावट बताई, जिसमें तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यात में 95%, यूरिया में 83% और अमोनिया में 75% की कमी शामिल थी।
ये आंकड़े रिपोर्ट किए गए व्यवधानों और कीमतों की चाल को दर्शाते हैं; इनसे अपने-आप यह साबित नहीं होता कि वैश्विक फसल पैदावार किसी निश्चित मात्रा में घटेगी। मुख्य जोखिम यह है कि अस्थायी लॉजिस्टिक समस्या, बुआई के समय और सीमित वैकल्पिक आपूर्ति के साथ मिलकर उत्पादन संकट बन जाए।
संघर्ष या नाकेबंदी कम होते ही उर्वरक आपूर्ति सामान्य हो जाए, यह जरूरी नहीं है। JPMorgan का अनुमान है कि क्षतिग्रस्त उर्वरक उत्पादन को पूरी क्षमता पर लौटने में एक से चार वर्ष लग सकते हैं। कुछ प्राकृतिक गैस संयंत्रों में कुओं को हुए नुकसान को भी शामिल किया जाए, तो उन्हें बहाल करने में तीन से पांच वर्ष लग सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि कमी पूरे समय तक बनी ही रहेगी। लेकिन क्षतिग्रस्त संयंत्र, अनुपलब्ध कच्चा माल और बाधित व्यापार मार्ग आपूर्ति को जल्दी बहाल न होने दें, तो कुछ समय का व्यवधान भी लंबे असर में बदल सकता है। कृषि कैलेंडर इसे और गंभीर बनाता है: बुआई या उर्वरक डालने की खिड़की में हुई देरी, मौसम के अपेक्षाकृत शांत दौर की समान देरी से कहीं अधिक नुकसानदेह हो सकती है।
अल नीनो इस ‘कंपाउंडिंग शॉक’ का मौसम संबंधी हिस्सा है। शक्तिशाली अल नीनो प्रमुख कृषि क्षेत्रों में मौसम के पैटर्न को बदल सकता है, जिससे पैदावार घटने या उतार-चढ़ाव बढ़ने का जोखिम होगा। यह जोखिम उन फसलों के लिए और बड़ा हो सकता है जिन पर पहले से महंगे उर्वरक, ईंधन और परिवहन लागत का दबाव है। JPMorgan और उसके विश्लेषण पर आधारित रिपोर्टों ने चेताया है कि दोनों झटके मिलकर 2027 की पहली छमाही तक खाद्य महंगाई को ऊंचा रख सकते हैं।
उपलब्ध सामग्री में NOAA की वास्तविक सलाह, ‘सुपर’ अल नीनो की संभावना या उसके 2027 तक बने रहने की संभावना स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन विशिष्ट संभावनाओं को इस साक्ष्य-समूह से सत्यापित नहीं किया जा सकता।
जो बात समर्थित है, वह दोनों जोखिमों का आपसी असर है: मौसम का झटका आपूर्ति घटा सकता है, जबकि ऊर्जा और उर्वरक का झटका भोजन उगाने और ढोने की लागत बढ़ा सकता है। साथ आने पर यह स्थिति किसी एक जोखिम की तुलना में अधिक महंगाईकारी हो सकती है। एक उपलब्ध रिपोर्ट में संयुक्त ऊर्जा और अल नीनो परिदृश्य से खाद्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर लगभग 1.5 प्रतिशत अंक का अतिरिक्त असर बताया गया है, लेकिन इसे JPMorgan के परिदृश्य के रूप में पढ़ना चाहिए, स्वतंत्र रूप से पुष्ट परिणाम के रूप में नहीं।
JPMorgan के अनुसार उभरते बाजारों पर जोखिम अधिक हो सकता है, क्योंकि वहां घरेलू खर्च में भोजन का हिस्सा आम तौर पर बड़ा होता है और कृषि उत्पादन मौसम तथा आयातित इनपुट के प्रति संवेदनशील हो सकता है। उपलब्ध रिपोर्टिंग में भारत, ब्राज़ील और इंडोनेशिया को जोखिम वाले बाजारों के रूप में शामिल किया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि इन तीनों देशों में खाद्य संकट निश्चित है। जोखिम के प्रमुख रास्ते हैं:
उपलब्ध अंश सामान्य जोखिम का समर्थन करते हैं, लेकिन भारत, ब्राज़ील और इंडोनेशिया के लिए पूरी तरह स्वतंत्र और देश-दर-देश पूर्वानुमान उपलब्ध नहीं कराते।
नहीं। JPMorgan की भाषा ऐसे जोखिम का वर्णन करती है जो अगले करीब एक वर्ष में तेज हो सकता है और 2027 में अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है। रिपोर्ट यह स्थापित नहीं करती कि वैश्विक कमी पहले से अपरिहार्य है।
मौजूदा अनाज भंडार और राष्ट्रीय या क्षेत्रीय खाद्य भंडार शुरुआती झटके को सीमित कर सकते हैं। लेकिन भंडार तभी तक कीमतों को संभाल सकते हैं, जब तक वे पर्याप्त हों और व्यापार जारी रहे। लंबे समय तक उर्वरक की कमी, महंगा ईंधन, निर्यात नियंत्रण, कमजोर फसल या लंबा संघर्ष इन सुरक्षा-कवचों को धीरे-धीरे कम कर सकता है।
यही वजह है कि रिपोर्ट किसी एक ट्रिगर के बजाय कई झटकों के एक-दूसरे को बढ़ाने पर जोर देती है। शिपिंग मार्ग दोबारा खुलने से एक अड़चन दूर हो सकती है, लेकिन इससे क्षतिग्रस्त उत्पादन तुरंत ठीक नहीं होगा, छूटे हुए उर्वरक प्रयोग की भरपाई नहीं होगी और खराब फसल वापस नहीं आ जाएगी।
उपलब्ध जानकारी से चार मुख्य निष्कर्ष निकलते हैं:
उपलब्ध साक्ष्य चीनी कृषि शेयरों—जैसे क्यूले सीड, शेननोंग सीड या जिंजियान राइस—में किसी खास तेजी की पुष्टि नहीं करते। इसी तरह क्षेत्रीय उर्वरक हिस्सेदारी, फसल में उर्वरक डालने के कैलेंडर या NOAA की संभावनाओं से जुड़े हर विस्तृत दावे की स्वतंत्र पुष्टि भी उपलब्ध नहीं है।
इसलिए व्यावहारिक निष्कर्ष ‘वैश्विक खाद्य संकट तय है’ से अधिक सीमित, लेकिन अधिक उपयोगी है। JPMorgan चेतावनी दे रहा है कि युद्ध, ऊर्जा, उर्वरक, शिपिंग और मौसम के जोखिम एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं—जिससे 2027 तक खाद्य महंगाई बढ़े और फसल उत्पादन कमजोर हो। अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि व्यवधान कितने लंबे चलते हैं, वैकल्पिक आपूर्ति समय पर पहुंचती है या नहीं और अगली बुआई व कटाई से पहले भंडार इस झटके को कितना संभाल पाते हैं।