ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से कहा कि अमेरिका की ‘अत्यधिक मांगें’ और भरोसे की कमी वार्ता में प्रगति रोक रही हैं। [2][11] पाकिस्तान अमेरिका‑ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में उभरा है—इस्लामाबाद में बैठकें हुईं और पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने तेहरान जाकर बातचीत को आगे बढ़ा...

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ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कूटनीतिक प्रक्रिया अभी भी अटकी हुई दिख रही है। तेहरान का कहना है कि बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही क्योंकि वॉशिंगटन ऐसी शर्तें रख रहा है जिन्हें ईरान “अत्यधिक” और अव्यावहारिक मानता है। इस बीच क्षेत्रीय ताकतें—खासतौर पर पाकिस्तान—दोनों देशों के बीच पुल बनाने की कोशिश कर रही हैं।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से फोन पर बातचीत में कहा कि मौजूदा वार्ताओं में सबसे बड़ी रुकावट अमेरिका की बातचीत की शर्तें हैं। ईरानी मीडिया के अनुसार, उन्होंने कहा कि अमेरिका की “अत्यधिक मांगें”, बार‑बार वादाखिलाफी और बदलते रुख ने भरोसे को कमजोर किया है और बातचीत की प्रगति रोक दी है।
इसके बावजूद ईरान ने संकेत दिया कि वह कूटनीतिक प्रक्रिया से बाहर नहीं हुआ है। अराघची ने गुतारेस को अमेरिका के साथ चल रही बातचीत और क्षेत्रीय मध्यस्थता की स्थिति के बारे में जानकारी दी।
ये घटनाक्रम अप्रैल में हुए अस्थायी युद्धविराम के बाद शुरू हुई कई हफ्तों की वार्ताओं के बीच सामने आए हैं, हालांकि अभी तक कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है।
इस पूरे कूटनीतिक प्रयास में पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ बनकर सामने आया है। अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की बातचीत पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई और कुछ अहम बैठकें इस्लामाबाद में आयोजित की गईं।
तनाव कम करने के लिए पाकिस्तान ने सीधे कूटनीतिक कदम भी उठाए। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख तेहरान पहुंचे, जिसे वार्ता को आगे बढ़ाने और संभावित टकराव टालने की कोशिश के रूप में देखा गया।
पर्दे के पीछे मध्यस्थों द्वारा कुछ ऐसे प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई है जो पहले तत्काल तनाव कम करने पर केंद्रित हों। एक प्रस्ताव के अनुसार पहले हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति स्थिर करने पर ध्यान दिया जाए, जबकि परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जटिल बातचीत बाद में की जाए।
फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम रास्ता है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 20% तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है।
यही वजह है कि यहां थोड़ी‑सी भी बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकती है। अप्रैल के युद्धविराम के बाद भी इस मार्ग से सामान्य यातायात पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है, जिससे कूटनीतिक समाधान की जरूरत और बढ़ गई है।
यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है, समुद्री परिवहन जोखिम भरा हो सकता है और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
कूटनीतिक बातचीत के समानांतर यह भी खबरें आई हैं कि अमेरिका संभावित नए सैन्य हमलों पर विचार कर सकता है। ऐसी अटकलों ने चिंता बढ़ा दी है कि कहीं बातचीत फिर से टकराव में न बदल जाए।
फिलहाल पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय मध्यस्थों का प्रयास यही है कि तनाव को बढ़ने से रोका जाए और चरणबद्ध तरीके से समाधान निकाला जाए। लेकिन परमाणु मुद्दों, प्रतिबंधों और सुरक्षा गारंटी जैसे बड़े सवाल अभी भी अनसुलझे हैं, इसलिए व्यापक समझौता कब होगा यह स्पष्ट नहीं है।
अमेरिका और ईरान के बीच यह विवाद केवल दो देशों का मामला नहीं है। इसका असर मध्य‑पूर्व की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाजार और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक—हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य—की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
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ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से कहा कि अमेरिका की ‘अत्यधिक मांगें’ और भरोसे की कमी वार्ता में प्रगति रोक रही हैं। [2][11]
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से कहा कि अमेरिका की ‘अत्यधिक मांगें’ और भरोसे की कमी वार्ता में प्रगति रोक रही हैं। [2][11] पाकिस्तान अमेरिका‑ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में उभरा है—इस्लामाबाद में बैठकें हुईं और पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने तेहरान जाकर बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश की। [1][4][6]
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य, जिससे दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से का तेल और एलएनजी गुजरता है, अभी भी तनाव का केंद्र है; किसी भी बाधा से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकता है। [10]