इस पूरे कूटनीतिक प्रयास में पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ बनकर सामने आया है। अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की बातचीत पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई और कुछ अहम बैठकें इस्लामाबाद में आयोजित की गईं।
तनाव कम करने के लिए पाकिस्तान ने सीधे कूटनीतिक कदम भी उठाए। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख तेहरान पहुंचे, जिसे वार्ता को आगे बढ़ाने और संभावित टकराव टालने की कोशिश के रूप में देखा गया।
पर्दे के पीछे मध्यस्थों द्वारा कुछ ऐसे प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई है जो पहले तत्काल तनाव कम करने पर केंद्रित हों। एक प्रस्ताव के अनुसार पहले हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति स्थिर करने पर ध्यान दिया जाए, जबकि परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जटिल बातचीत बाद में की जाए।
फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम रास्ता है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 20% तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है।
यही वजह है कि यहां थोड़ी‑सी भी बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकती है। अप्रैल के युद्धविराम के बाद भी इस मार्ग से सामान्य यातायात पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है, जिससे कूटनीतिक समाधान की जरूरत और बढ़ गई है।
यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है, समुद्री परिवहन जोखिम भरा हो सकता है और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
कूटनीतिक बातचीत के समानांतर यह भी खबरें आई हैं कि अमेरिका संभावित नए सैन्य हमलों पर विचार कर सकता है। ऐसी अटकलों ने चिंता बढ़ा दी है कि कहीं बातचीत फिर से टकराव में न बदल जाए।
फिलहाल पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय मध्यस्थों का प्रयास यही है कि तनाव को बढ़ने से रोका जाए और चरणबद्ध तरीके से समाधान निकाला जाए। लेकिन परमाणु मुद्दों, प्रतिबंधों और सुरक्षा गारंटी जैसे बड़े सवाल अभी भी अनसुलझे हैं, इसलिए व्यापक समझौता कब होगा यह स्पष्ट नहीं है।
अमेरिका और ईरान के बीच यह विवाद केवल दो देशों का मामला नहीं है। इसका असर मध्य‑पूर्व की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाजार और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक—हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य—की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
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