अभियान के दौरान 30 से अधिक बर्फ-आधारित उपकरण लगाए गए। इनमें समुद्री बर्फ के द्रव्यमान-संतुलन को मापने वाले बॉय, बर्फ पर आधारित उथले और गहरे पानी की प्रोफाइलिंग बॉय तथा समुद्री बर्फ के बहाव को रिकॉर्ड करने वाले ड्रिफ्ट बॉय शामिल हैं।
स्टेशनों पर आर्कटिक प्रणाली के कई जुड़े हुए हिस्सों का एक साथ अवलोकन किया गया:
इन मापों का उद्देश्य लंबे समय तक मौके पर ही किए गए अवलोकन और सत्यापन संबंधी आंकड़े जुटाना है। इससे तेजी से बदलती आर्कटिक समुद्री बर्फ के बीच वातावरण–बर्फ–महासागर तंत्र के संयुक्त बदलावों का अध्ययन किया जा सकेगा।
एकल पोत वाले सामान्य आर्कटिक अभियानों में आम तौर पर करीब छह कामकाजी आइस स्टेशन बनाए जाते हैं। इसके मुकाबले 12 स्टेशनों का नेटवर्क वैज्ञानिकों को अलग-अलग स्थानों से अधिक व्यापक आंकड़े देता है।
इस नेटवर्क का सबसे बड़ा लाभ बेहतर तुलना है। शोधकर्ता देख सकेंगे कि क्या वातावरण में दर्ज बदलाव अलग-अलग स्थलों पर बर्फ की मोटाई, महासागर की स्थिति या जैविक गतिविधि में होने वाले बदलावों से जुड़े हैं। इससे आर्कटिक में तेज बदलाव के कारणों को समझने और जलवायु पूर्वानुमान के लिए इस्तेमाल होने वाले आंकड़ों व मॉडलों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
दूसरे शोध आइसब्रेकर 雪龙 2 को करीब 84° उत्तरी अक्षांश पर सर्वेक्षण जारी रखने के लिए निर्धारित किया गया था। इसकी योजना में छह अल्पकालिक और एक दीर्घकालिक आइस स्टेशन शामिल थे। अभियान में 20 से अधिक कार्य प्रस्तावित थे, जिनमें बर्फ-आधारित बॉय लगाना, बर्फ की सतह पर जमी बर्फ और बर्फ-कोर के नमूने लेना, बर्फ के नीचे के पानी का नमूना एकत्र करना, समुद्री बर्फ की रिमोट सेंसिंग, वायुमंडलीय प्रोफाइलिंग और बर्फ के नीचे महासागरीय स्थितियों का मापन शामिल था।
दोनों पोतों के स्टेशन इस तरह योजनाबद्ध किए गए कि वे मिलकर एक व्यापक अवलोकन सरणी बना सकें। इससे केंद्रीय आर्कटिक में वातावरण, समुद्री बर्फ, महासागर और पारिस्थितिकी तंत्र के बीच संबंधों का अधिक विस्तृत अध्ययन संभव होगा।
अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने समुद्री बर्फ का एक बड़ा नमूना भी निकाला, ताकि उसकी यांत्रिक विशेषताओं का परीक्षण किया जा सके। करीब छह घंटे की मेहनत में टीम ने आइस-कोर ड्रिल और चेनसॉ की मदद से 1.3 मीटर मोटा तथा 1.2 मीटर × 1.2 मीटर आकार का बर्फ का ब्लॉक काटकर निकाला।
वैज्ञानिक आर्कटिक परिस्थितियों में इस नमूने के यांत्रिक गुणों को मापेंगे। इससे समुद्री बर्फ के नमूनों का संग्रह समृद्ध होगा और अगली पीढ़ी के ध्रुवीय पोतों की संरचनात्मक डिजाइन के लिए उपयोगी प्रयोगात्मक आंकड़े मिल सकेंगे।
आइस स्टेशन अभियान ने एक ऐसा आर्कटिक अवलोकन नेटवर्क भी तैयार किया, जिसे शोध पोत के आगे बढ़ जाने के बाद बिना मानव उपस्थिति के काम करना था। साथ ही, चीन में विकसित समुद्री-अवलोकन प्रणालियों का परीक्षण और परिचालन उपयोग किया गया। अभियान में सबसे अधिक लगाए गए उथले पानी और गहरे पानी की प्रोफाइलिंग बॉय तथा समुद्री-बर्फ ड्रिफ्ट बॉय में घरेलू उपकरणों की औसत हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से अधिक थी।
घरेलू उपकरणों और परिपक्व तकनीक के सहारे बड़े पैमाने पर बॉय की सरणी स्थापित करना और उन्हें एक स्वचालित, नेटवर्क-आधारित निगरानी प्रणाली से जोड़ना संभव हुआ। इसका मतलब है कि वैज्ञानिक केवल उस समय के आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहेंगे, जब शोधकर्ता बर्फ पर मौजूद हों; उपकरणों से दोहराए जाने वाले और वितरित अवलोकन लगातार मिलते रह सकते हैं।
इस अभियान की प्रमुख तैनातियों में एक पारिस्थितिक स्वचालित आइस स्टेशन भी था। इसे इस प्रणाली का आर्कटिक में पहला अनुप्रयोग प्रदर्शन बताया गया है। यह ध्वनिक, प्रकाशीय और विद्युत सेंसरों को एक साथ जोड़कर लंबे समय तक वातावरण, बर्फ, महासागर और पारिस्थितिकी का अवलोकन करता है।
इस प्रणाली का उद्देश्य मौसम के साथ बदलती रोशनी के बीच बर्फ के नीचे होने वाली जैविक गतिविधियों को रिकॉर्ड करना है। लगातार मिलने वाले आंकड़ों से वैज्ञानिक यह जांच सकेंगे कि बर्फ के नीचे रहने वाले जीव ध्रुवीय रात में कैसे टिके रहते हैं और ध्रुवीय दिन लौटने पर पहली रोशनी के साथ उनकी गतिविधियों में क्या बदलाव आता है।
गर्मियों में किए गए छोटे सर्वेक्षण साल के बाकी हिस्सों में होने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को आसानी से दर्ज नहीं कर पाते। बिना मानव-उपस्थिति वाला स्टेशन बदलती रोशनी, बर्फ और महासागरीय परिस्थितियों के बीच लगातार आंकड़े जोड़ सकता है। इससे बर्फ के नीचे के पारिस्थितिकी तंत्र की अधिक संपूर्ण तस्वीर मिल सकती है।
雪龙 के 12 आइस स्टेशन स्टेशन-संख्या के रिकॉर्ड के साथ-साथ आर्कटिक अवलोकन की रणनीति में बदलाव का संकेत भी हैं। एक ही पोत द्वारा 12 स्थानों पर काम और उसके बाद 雪龙 2 द्वारा प्रस्तावित सात अतिरिक्त स्टेशन केंद्रीय आर्कटिक में स्थितियों की तुलना के लिए अधिक व्यापक मंच तैयार करते हैं।
इन आंकड़ों से आर्कटिक बदलाव से जुड़े हर सवाल का जवाब अकेले नहीं मिलेगा। इनकी असली उपयोगिता अलग-अलग प्रकार के साक्ष्यों को जोड़ने में है—बर्फ के नमूने, बहते हुए बॉय, वायुमंडलीय प्रोफाइल, महासागर संबंधी माप और पारिस्थितिक सेंसर। अलग-अलग स्थानों और समय-अवधियों से जुटे ये आंकड़े वैज्ञानिकों को वास्तविक परिस्थितियों के साथ मॉडलों की जांच करने, वातावरण–बर्फ–महासागर–जीव-जगत के परस्पर प्रभावों को समझने और तेजी से बदलते आर्कटिक की बेहतर तस्वीर बनाने में मदद कर सकते हैं।