भारत, चीन, ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका और BRICS के अन्य सदस्यों की चिंता यह है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है और उनके पास हरित संक्रमण के लिए अधिक वित्तीय संसाधन हैं। ऐसे में विकासशील देशों के उत्पादों पर यूरोपीय कार्बन कीमत के बराबर शुल्क लगाना, BRICS के अनुसार, पेरिस समझौते की समानता-आधारित भावना के खिलाफ है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका पहले भी CBAM को CBDR-RC के संदर्भ में चुनौती दे चुके हैं।
हालांकि यह जलवायु कार्रवाई का पूर्ण विरोध नहीं है। असली सवाल है—नियम कौन बनाएगा, संक्रमण की कीमत कौन चुकाएगा और कार्बन-गहन आयात से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल कहां होगा। BRICS सरकारों का कहना है कि प्रभावित विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को उत्सर्जन घटाने के लिए वित्त और तकनीक मिलनी चाहिए, न कि ऐसा बॉर्डर शुल्क लगाया जाए जो उनकी निर्यात प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर दे।
CBAM का निर्णायक चरण 1 जनवरी 2026 से शुरू हुआ। इससे पहले 1 अक्टूबर 2023 से 31 दिसंबर 2025 तक चलने वाले संक्रमणकालीन चरण में आयातकों को अपने सामान में निहित उत्सर्जन की रिपोर्ट देनी थी, लेकिन प्रमाणपत्र खरीदकर जमा नहीं करने थे।
शुरुआती तौर पर CBAM का दायरा इन उत्पादों पर है:
EU में 50 टन से अधिक कवर किए गए CBAM सामान आयात करने वाले आयातकों को अधिकृत घोषणाकर्ता (authorised declarant) का दर्जा लेना होगा। इसके बाद उन्हें आयातित वस्तुओं के उत्पादन में निहित उत्सर्जन के आधार पर CBAM प्रमाणपत्र खरीदने होंगे। यह व्यवस्था EU में बने समान उत्पादों पर लागू कार्बन लागत के साथ आयातित वस्तुओं का उपचार लगभग बराबर करने के लिए बनाई गई है। यदि उत्पाद के मूल देश में पहले ही पात्र कार्बन कीमत चुकाई जा चुकी है, तो उसका समायोजन किया जा सकता है।
यूरोपीय आयोग ने 2026 की पहली तिमाही के लिए CBAM प्रमाणपत्र की कीमत €75.36 प्रति टन CO₂ और दूसरी तिमाही के लिए €75.28 प्रति टन घोषित की। हालांकि अंतिम देनदारी केवल प्रमाणपत्र की कीमत से तय नहीं होगी। इसमें सत्यापित उत्सर्जन, उत्पाद बेंचमार्क, उस वर्ष लागू चरणबद्ध कारक और मूल देश में पहले चुकाई गई कार्बन कीमत भी शामिल होगी।
स्टील और एल्युमीनियम सीधे CBAM के दायरे में आने वाले और अपेक्षाकृत अधिक उत्सर्जन वाले उत्पाद हैं। इसलिए निर्यातकों के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर प्रमाणपत्रों की संभावित लागत और दूसरी ओर उत्सर्जन को मापने, सत्यापित कराने तथा उसका दस्तावेजी रिकॉर्ड रखने का प्रशासनिक बोझ। यदि विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हों, तो आयातकों को EU के डिफॉल्ट मानकों का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे उत्पादकों और व्यापारियों के लिए लागत और अनिश्चितता बढ़ सकती है।
यही वजह है कि भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे बड़े निर्यातकों के लिए CBAM महत्वपूर्ण है। उपलब्ध नीति आकलन में विश्व बैंक के एक अनुमान का हवाला देते हुए कहा गया है कि CBAM विकासशील देशों के लगभग 16 अरब डॉलर के वार्षिक निर्यात को प्रभावित कर सकता है। यह आंकड़ा भारत, चीन या दक्षिण अफ्रीका के लिए अलग-अलग अनुमान नहीं है।
समय के साथ वित्तीय दबाव बढ़ने की संभावना है, क्योंकि EU अपने Emissions Trading System (ETS) के तहत घरेलू उत्पादकों को मिलने वाले मुफ्त भत्तों को धीरे-धीरे समाप्त कर रहा है। विश्व बैंक के अनुसार CBAM क्षेत्रों के लिए शेष मुफ्त-आवंटन कारक 2026 में 97.5%, 2027 में 95%, 2028 में 90%, 2029 में 77.5% और 2030 में 51.5% रहेगा।
व्यावहारिक अर्थ में इसका मतलब है कि EU उत्पादकों को मिलने वाली मुफ्त सुरक्षा घटने के साथ आयातित वस्तुओं पर CBAM के जरिए प्रतिबिंबित कार्बन लागत का हिस्सा बढ़ेगा।
2030 के लिए CBAM राजस्व का कोई एक निश्चित और सर्वमान्य आंकड़ा नहीं है। अनुमान कार्बन कीमत, आयात मात्रा, उत्पादों की उत्सर्जन तीव्रता, मुफ्त भत्तों की समाप्ति और भविष्य में CBAM का दायरा बढ़ता है या नहीं—इन सभी धारणाओं पर निर्भर करते हैं।
उपलब्ध आकलनों में कुछ अनुमान इस प्रकार हैं:
यूरोपीय आयोग से जुड़े एक पुराने अनुमान में व्यापक दायरे की स्थिति में 2030 तक संभावित वार्षिक राजस्व €9.1 अरब बताया गया था।
इन अनुमानों में बड़ा अंतर महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि CBAM के पूरी तरह लागू होने, प्रमाणपत्र देनदारियों के बढ़ने और संभावित दायरा-विस्तार से पहले 2030 की किसी एक संख्या को अंतिम मानना भ्रामक हो सकता है।
BRICS की शिकायत केवल यह नहीं है कि विकासशील देशों के निर्यातकों पर अतिरिक्त कार्बन-आधारित लागत लग सकती है। विवाद इस बात पर भी है कि इस रकम का इस्तेमाल कहां होगा। यूरोपीय संसद की सामग्री के अनुसार CBAM से मिलने वाला राजस्व EU के बजट में जा सकता है। अन्य विश्लेषण इसे EU-स्तरीय जलवायु और बजटीय प्राथमिकताओं से जोड़ते हैं।
BRICS देशों का कहना है कि विकासशील देशों के निर्यातकों से वसूली गई रकम का इस्तेमाल उन्हीं देशों में उत्सर्जन घटाने, उद्योगों को आधुनिक बनाने और जलवायु अनुकूलन के लिए होना चाहिए। यह मांग विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त बढ़ाने की BRICS की व्यापक अपील से भी जुड़ी है।
यहीं मुख्य राजनीतिक टकराव पैदा होता है। EU का कहना है कि CBAM का उद्देश्य carbon leakage यानी ऐसे उत्पादन को रोकना है जो कम कड़े जलवायु नियमों वाले देशों में चला जाए। उसका दावा है कि आयातित वस्तुओं को EU में बने उत्पादों के समान कार्बन लागत का सामना कराना जरूरी है। इसके विपरीत BRICS इसे एकतरफा व्यापार उपाय मानता है, जिसका वित्तीय बोझ यूरोप के बाहर के उत्पादकों पर असमान रूप से पड़ता है।
राजनयिक विरोध अपने-आप में WTO विवाद नहीं बनता। औपचारिक मामला शुरू करने के लिए किसी सदस्य देश को पहले परामर्श (consultations) का अनुरोध करना होगा। यदि बातचीत से समाधान नहीं निकलता, तो वह पैनल गठित करने की मांग कर सकता है।
कानूनी बहस में कई सवाल उठ सकते हैं—क्या CBAM आयातित वस्तुओं या विदेशी उत्पादन प्रक्रियाओं के साथ भेदभाव करता है? क्या EU और विदेशी उत्पादकों पर समान व्यवहार लागू होता है? और क्या EU सामान्य शुल्क एवं व्यापार समझौते (GATT) के पर्यावरणीय अपवादों के तहत इस व्यवस्था को उचित ठहरा सकता है?
EU का संभावित बचाव यह होगा कि CBAM कोई मनमाना आयात शुल्क नहीं, बल्कि घरेलू EU कार्बन कीमत का समकक्ष उपाय है। वह यह भी तर्क दे सकता है कि मूल देश में पहले चुकाई गई पात्र कार्बन कीमत का श्रेय दिया जाता है और इसका उद्देश्य carbon leakage रोकना है। मुख्य कानूनी विवाद यह रहेगा कि क्या ये प्रावधान भेदभाव, रिपोर्टिंग बोझ और विदेशी उत्पादकों के साथ व्यवहार संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त हैं।
उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि दक्षिण अफ्रीका ने शिकायत की संभावना में रुचि दिखाई है और भारत, चीन तथा ब्राजील ने CBAM की वैधता या समानता से जुड़ी चिंताएं उठाई हैं। लेकिन इन साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि चीन ने CBAM पर कोई विशिष्ट WTO विवाद दायर किया है। न ही किसी समन्वित BRICS मामले की पुष्टि होती है।
जैसे-जैसे CBAM के तहत देय उत्सर्जन का हिस्सा बढ़ेगा और निर्यातकों को अनुपालन प्रक्रिया का अधिक अनुभव होगा, विवाद तेज हो सकता है। EU के व्यापार समझौते, बातचीत और द्विपक्षीय संपर्क तकनीकी समायोजन या परामर्श के रास्ते खोल सकते हैं, लेकिन वे WTO चुनौती को अपने-आप नहीं रोकेंगे।
इसलिए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सबसे सावधान निष्कर्ष यह है कि BRICS ने EU की नीति के खिलाफ मजबूत राजनीतिक मोर्चा बनाया है और CBAM का आर्थिक दबाव चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगा। औपचारिक WTO मुकदमा संभव है, लेकिन तत्काल “CBAM ट्रेड वॉर”, एकीकृत BRICS WTO मामला या चीन की पूरी हो चुकी चुनौती—इनमें से किसी को अभी पुष्ट तथ्य नहीं माना जा सकता।