यह खोज चार्ल्स डार्विन की 1875 में कही गई बात को करीब 151 साल बाद सही साबित करती है। डार्विन ने Saxifraga वंश की कुछ चिपचिपे पत्तों वाली प्रजातियों के बारे में अनुमान लगाया था कि वे शायद कीड़ों को पकड़कर उनका उपयोग कर सकती हैं । उनके समय में इस विचार को निर्णायक रूप से साबित करने के लिए जरूरी वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी।
नए अध्ययन का केंद्र S. candelabrum है, जो डार्विन द्वारा देखी गई प्रजातियों का करीबी संबंधी है। यह पौधा दक्षिण-पश्चिमी चीन में छिंगहाई-तिब्बत पठार और हेंगदुआन पर्वतों की ऊंचाई वाले इलाकों में, समुद्र तल से लगभग 2,500 से 3,300 मीटर ऊपर, चट्टानी दरारों के बीच उगता है ।
क्षेत्रीय सर्वेक्षण में जांचे गए 45 नमूनों में से 43 पर कीड़े चिपके मिले। परिपक्व पौधों पर औसतन 71 कीड़े फंसे हुए पाए गए । यह केवल संयोग से कीड़ों के चिपक जाने का मामला नहीं था—आगे के प्रयोगों ने दिखाया कि पौधा अपने शिकार को पचाकर उससे पोषक तत्व भी हासिल करता है।
पौधे के तने और शाखाएं सूक्ष्म, बाल जैसे ढांचों से ढकी होती हैं, जिन्हें ग्रंथियुक्त रोम या glandular trichomes कहा जाता है। ये रोम चिपचिपा श्लेष्मा छोड़ते हैं और छोटे कीड़ों के लिए मक्खी पकड़ने वाले कागज जैसा जाल बना देते हैं ।
शोध के अनुसार, पौधा गंध के जरिए छोटे कीड़ों को आकर्षित भी करता है। इसके बाद कीड़े चिपचिपी सतह पर बैठते ही उसमें फंस जाते हैं। पकड़े जाने वाले शिकारों में मुख्य रूप से गैर-डंक वाले छोटे मिज शामिल हैं, जो छोटे मक्खी-जैसे कीट होते हैं ।
सिर्फ कीड़ों का चिपक जाना किसी पौधे को कीटभक्षी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि पौधा शिकार को पचा सकता है और उससे पोषक तत्व अपने शरीर में पहुंचा सकता है।
वैज्ञानिकों ने ग्रंथियुक्त रोमों पर एंजाइम गतिविधि जांचने के लिए फ्लोरोसेंस-आधारित परीक्षण किया। इसमें फॉस्फेटेज गतिविधि मिली, जो शिकार को तोड़ने वाली पाचन प्रक्रिया का संकेत है ।
इसके बाद टीम ने Drosophila यानी फल-मक्खियों को नाइट्रोजन-15 (¹⁵N) नामक स्थिर समस्थानिक से चिह्नित करके पौधे को खिलाया। कुछ समय बाद पौधे के ऊतकों में ¹⁵N की मात्रा बढ़ी। इसका अर्थ था कि पौधे ने शिकार से नाइट्रोजन अवशोषित की थी। गैर-कीटभक्षी नियंत्रण पौधों में ऐसी वृद्धि नहीं देखी गई ।
शोधकर्ताओं ने S. candelabrum का गुणसूत्र-स्तरीय जीनोम भी तैयार किया और उसकी तुलना Drosera यानी सनड्यू तथा Nepenthes यानी पिचर प्लांट जैसे ज्ञात कीटभक्षी पौधों से की। ग्रंथियुक्त रोमों में पाचन से जुड़े प्रोटिएज एंजाइमों के जीन सक्रिय पाए गए। इससे पता चला कि इस पौधे में कीटभक्षण के लिए जरूरी आनुवंशिक तंत्र मौजूद है ।
कीटभक्षी पौधों के सामने एक अहम समस्या होती है: उन्हें पोषण के लिए कीड़े पकड़ने होते हैं, लेकिन प्रजनन के लिए परागणकों की जरूरत भी होती है। अगर परागण करने वाले कीड़े ही जाल में फंस जाएं, तो पौधे के लिए नुकसान हो सकता है।
S. candelabrum इस टकराव को फूलों और जाल के बीच दूरी बनाकर कम करता है। इसके सफेद फूल चिपचिपे तनों से काफी ऊपर लंबे डंठलों पर लगे होते हैं। चिपचिपे ग्रंथियुक्त रोम मुख्य रूप से वनस्पतिक तनों पर पाए जाते हैं, फूलों या उनके डंठलों पर नहीं ।
इस ऊर्ध्वाधर और दृश्य अलगाव—ऊपर सफेद फूल, नीचे चिपचिपे तने—से परागणकों के फूलों तक सुरक्षित पहुंचने की संभावना बढ़ती है और उनके फंसने का जोखिम घटता है। अन्य कीटभक्षी पौधों पर हुए शोध में भी सफेद फूलों और जाल के बीच दूरी को परागणकों की सुरक्षा से जोड़ा गया है ।
Saxifraga candelabrum को कीटभक्षी पौधे के रूप में पहचानना केवल एक नई प्रजाति की खोज नहीं है। यह वनस्पति जगत में स्वतंत्र रूप से विकसित हुई एक नई कीटभक्षी वंशावली का प्रतिनिधित्व करता है। यह Saxifragales वनस्पति-क्रम और Saxifragaceae कुल में पुष्टि किया गया पहला कीटभक्षी पौधा है ।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह संभवतः एक बड़ी तस्वीर का सिर्फ छोटा हिस्सा है। कई पौधों पर पाए जाने वाले चिपचिपे ग्रंथियुक्त रोमों को अब तक केवल शाकाहारी जीवों से बचाव या सतह पर चीजों को चिपकाने की व्यवस्था माना गया है। लेकिन कुछ मामलों में ये रोम पोषण हासिल करने में भी भूमिका निभा सकते हैं ।
इसका मतलब है कि प्रकृति में अभी ऐसे कई पौधे मौजूद हो सकते हैं जिनकी कीटभक्षी क्षमता पहचानी नहीं गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, दुनिया में कीटभक्षी पौधों की वास्तविक संख्या मौजूदा अनुमान से काफी अधिक हो सकती है ।