ताइवान के लिए असल संदेश उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी आधिकारिक सफाई। दिसंबर पैकेज पर एक रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी विदेश विभाग ने बिक्री को ताइवान की सेनाओं के आधुनिकीकरण और विश्वसनीय रक्षात्मक क्षमता बनाए रखने में मददगार बताया था । अगर चीनी दबाव के बावजूद यह समर्थन आगे बढ़ता है, तो निरंतरता का संकेत जाएगा। अगर यह शिखर वार्ता के आसपास अटकता है, तो सवाल उठेंगे कि क्या बीजिंग उच्च-स्तरीय कूटनीति के जरिए अमेरिकी फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
ट्रंप का यह कहना कि वे ताइवान हथियार बिक्री पर शी से ‘बात’ कर रहे हैं, इसलिए चर्चा में आया क्योंकि ताइवान नीति की बहसों में ‘सिक्स एश्योरेंसेज़’ यानी छह अमेरिकी आश्वासनों का खास महत्व है। Taiwan Insight के अनुसार, इनमें से एक प्रावधान कहता है कि अमेरिका ने ताइवान को हथियार बिक्री पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, यानी पीआरसी, से परामर्श करने पर सहमति नहीं दी थी ।
यही महीन रेखा निर्णायक है। वॉशिंगटन बीजिंग से तनाव कम करने के लिए बातचीत कर सकता है; लेकिन चीन को निर्णयकर्ता की तरह पेश करना अलग बात है। अगर ट्रंप ताइवान हथियार बिक्री को शी के साथ मोलभाव का विषय बनाते दिखे, तो सहयोगी देश और आलोचक इसे ताइवान की रक्षा सहायता पर बीजिंग को वास्तविक वीटो देने जैसा मान सकते हैं।
ताइपे के लिए सबसे साफ आश्वासन यह होगा कि अमेरिकी फैसला चीनी आपत्तियों के बावजूद आगे बढ़े और भाषा ऐसी हो जिसमें बीजिंग की मंजूरी की जरूरत न झलके । इससे मौजूदा अमेरिकी नीति की निरंतरता दिखेगी और यह तर्क कमजोर होगा कि बेहतर शिखर वार्ता के लिए ताइवान की सुरक्षा सहायता को दांव पर लगाया गया।
ऐसा कदम बीजिंग के उस प्रयास को भी चुनौती देगा जिसमें ताइवान को द्विपक्षीय रिश्तों की मुख्य कसौटी बनाया जा रहा है। शिखर वार्ता से पहले चीनी संदेशों में ताइवान को अमेरिका-चीन संबंधों का ‘सबसे बड़ा जोखिम’ कहा गया और संकेत दिया गया कि वॉशिंगटन इस मुद्दे को कैसे संभालता है, इससे रिश्तों की स्थिरता प्रभावित होगी ।
किसी देरी का मतलब अपने-आप यह नहीं होगा कि अमेरिकी नीति बदल गई है। हथियार हस्तांतरण की प्रक्रियाएं लंबी और जटिल हो सकती हैं, और एक रिपोर्ट में कहा गया कि ताइपे के अधिकारी संभावित पैकेज को शिखर वार्ता से जुड़ी चिंताओं के बावजूद पटरी पर मान रहे थे ।
फिर भी राजनीतिक संकेत अलग हो सकते हैं। बीजिंग बैठक के आसपास देरी या कटौती को शी के लिए रियायत के रूप में पढ़ना आसान होगा—खासकर जब रिपोर्टिंग पहले ही ट्रंप के ताइवान को लेकर अधिक दुविधापूर्ण रुख और 11 अरब डॉलर के पैकेज की डिलीवरी आगे न बढ़ने की बात कह चुकी है । इससे अमेरिकी समर्थन आधिकारिक बयानों के बावजूद अधिक सशर्त दिख सकता है।
सबसे गंभीर चेतावनी यह होगी कि ताइवान हथियार बिक्री को किसी व्यापक अमेरिका-चीन सौदे का हिस्सा बताया जाए। बीजिंग पहले ही ताइवान को रिश्ते का केंद्रीय जोखिम बता रहा है । अगर वॉशिंगटन भी ताइवान की रक्षा जरूरतों को बीजिंग से मंजूरी लेने जैसा पेश करता है, तो अमेरिकी संकल्प पर संदेह और गहरा होगा।
कूटनीतिक विशेषणों से ज्यादा ये चार संकेत मायने रखेंगे:
ताइवान को हथियार बिक्री पर ट्रंप का फैसला अकेले अमेरिका की भविष्य की पूरी ताइवान नीति तय नहीं करेगा। व्हाइट हाउस और विदेश विभाग दोनों ने कहा है कि नीति और प्रतिबद्धता अपरिवर्तित हैं ।
लेकिन यह शिखर वार्ता दिखाएगी कि ये बयान ट्रंप की कूटनीति को कितना बांधते हैं। अगर हथियार बिक्री आगे बढ़ती है और भाषा में बीजिंग को वीटो जैसा स्थान नहीं दिया जाता, तो ताइवान को भरोसा और चीन को अमेरिकी दृढ़ता का संकेत मिलेगा। अगर बिक्री टलती है, घटती है या खुले तौर पर सौदेबाजी का हिस्सा बनती है, तो संदेश उल्टा होगा: ताइवान के लिए अमेरिकी समर्थन शायद तब तक मजबूत है, जब तक वह शी के साथ किसी बड़े सौदे के रास्ते में नहीं आता।
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