हालाँकि, समझौते की रूपरेखा सामने आने के बावजूद कई बुनियादी विवाद अभी भी बने हुए हैं—इसी वजह से इसे एक नाज़ुक और अस्थायी व्यवस्था माना जा रहा है।
अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष तेज़ होने के बाद एक अस्थायी युद्धविराम लागू किया गया था। इस व्यवस्था को कराने में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी और इसी ने दोनों देशों के बीच बातचीत की शुरुआत करवाई।
उस शुरुआती समझौते का मकसद स्थायी शांति नहीं था, बल्कि तत्काल लड़ाई रोककर आगे की वार्ताओं का रास्ता खोलना था—खासकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और फारस की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर।
अब रिपोर्टें बताती हैं कि मध्यस्थ देश एक 60‑दिन के युद्धविराम विस्तार और एक प्रारंभिक समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार कराने की कोशिश कर रहे हैं, जो आगे की वार्ताओं के लिए ढाँचा तय करेगा।
हालाँकि आधिकारिक तौर पर सभी विवरण सार्वजनिक नहीं हुए हैं, लेकिन वार्ता से जुड़े अधिकारियों के हवाले से कुछ प्रमुख बिंदु सामने आए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है होरमुज़ जलडमरूमध्य को चरणबद्ध तरीके से फिर से खोलना। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है।
संघर्ष के दौरान दोनों पक्षों की कार्रवाइयों और नाकेबंदी के कारण इस मार्ग पर आवाजाही गंभीर रूप से प्रभावित हुई। इसलिए अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता बहाल करना प्राथमिक लक्ष्य बना हुआ है।
रिपोर्टों के अनुसार समझौते में इसे तुरंत पूरी तरह खोलने के बजाय युद्धविराम विस्तार के साथ धीरे‑धीरे बहाल करने की योजना पर चर्चा हो रही है।
दूसरा बड़ा मुद्दा है ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम (Highly Enriched Uranium – HEU) का भविष्य।
बताया जा रहा है कि वार्ताओं में कई विकल्पों पर चर्चा हो सकती है, जैसे:
यह चर्चा ईरान के पूरे परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक वार्ता का हिस्सा बन सकती है।
लेकिन यही मुद्दा सबसे कठिन भी है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान को ऐसा परमाणु सामग्री भंडार नहीं रखना चाहिए जिसका इस्तेमाल हथियार बनाने में हो सके, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के अधिकार पर जोर देता रहा है।
संभावित समझौते में अमेरिका द्वारा सीमित आर्थिक राहत देने की संभावना भी बताई गई है।
रिपोर्टों के अनुसार इनमें शामिल हो सकते हैं:
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक यदि युद्धविराम कायम रहता है तो जमे हुए ईरानी फंड का हिस्सा धीरे‑धीरे जारी किया जा सकता है।
हालाँकि ईरानी मीडिया से जुड़े स्रोतों का कहना है कि तेहरान को लगता है कि मौजूदा अमेरिकी प्रस्तावों में अभी तक “ठोस रियायतें” पर्याप्त नहीं हैं।
इस पूरे कूटनीतिक प्रयास में पाकिस्तान सबसे प्रमुख मध्यस्थ के रूप में उभरा है। इसने वार्ता की मेजबानी की और दोनों पक्षों के बीच प्रस्तावों का आदान‑प्रदान कराया।
इसके अलावा क्षेत्र के अन्य देश—जैसे कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात—भी तनाव कम करने और व्यापक युद्ध को रोकने के लिए पर्दे के पीछे सक्रिय बताए जाते हैं।
इन देशों की शटल कूटनीति और संपर्कों ने बातचीत को जारी रखने और मतभेद कम करने में भूमिका निभाई है।
हालाँकि कुछ प्रगति की खबरें हैं, लेकिन कई विवाद अब भी हल नहीं हुए हैं।
अमेरिका इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानते हुए पूरी तरह खोलने की मांग कर रहा है, जबकि ईरान इस जलमार्ग को वार्ता में दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम को खत्म करे या बाहर भेजे, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के अधिकार पर अड़ा हुआ है।
ईरान चाहता है कि बड़े पैमाने पर प्रतिबंध हटाए जाएँ और अरबों डॉलर की जमी संपत्ति तक पहुँच मिले। लेकिन अमेरिकी पक्ष फिलहाल चरणबद्ध और सीमित आर्थिक राहत की ही बात कर रहा है।
एक और विवाद यह है कि क्या परमाणु मुद्दों पर तुरंत फैसला होना चाहिए या उन्हें बाद के चरणों के लिए टाल दिया जाए।
कूटनीतिक प्रक्रिया पर एक और दबाव यह है कि यदि वार्ता विफल होती है तो सैन्य टकराव फिर से शुरू हो सकता है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि बातचीत टूटने की स्थिति में अमेरिका नए हमलों पर विचार कर चुका है।
इसी खतरे ने मध्यस्थ देशों को भी तेजी से समझौता कराने के लिए सक्रिय किया है। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि गंभीर वार्ता चलने के कारण ही सैन्य कार्रवाई फिलहाल टली हुई है।
यदि 60‑दिन का विस्तार तय हो भी जाता है, तब भी यह स्थायी समाधान नहीं होगा। इसे एक अस्थायी पुल के रूप में देखा जा रहा है—जिसका उद्देश्य संघर्ष को फिर से भड़कने से रोकना और कठिन मुद्दों पर लंबी वार्ता के लिए समय देना है।
यानी अभी लक्ष्य है स्थिति को स्थिर करना, समुद्री व्यापार बहाल करना और परमाणु तथा क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे बड़े सवालों पर संरचित बातचीत शुरू करना। लेकिन इन मुद्दों पर अंतिम समझौता होगा या नहीं—यह अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।