3. अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करना
तेहरान ने यह भी कहा है कि अमेरिकी नौसैनिक या समुद्री नाकेबंदी खत्म की जाए, जिसने ईरान के व्यापार और तेल शिपिंग को प्रभावित किया है। यह तनाव खास तौर पर फारस की खाड़ी और होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास देखने को मिला है।
4. ईरान के पास तैनात अमेरिकी सैनिकों की वापसी
प्रस्ताव में यह भी मांग है कि अमेरिका अपने सैनिकों को ईरान की सीमाओं के पास या उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों से हटा ले। ईरान का कहना है कि इससे भविष्य में टकराव का खतरा कम होगा।
5. युद्ध से हुए नुकसान का मुआवज़ा
तेहरान ने अमेरिका और इज़राइल से जुड़े युद्ध के कारण हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवज़े की भी मांग की है। ईरानी सरकारी मीडिया ने इसे युद्ध से हुई तबाही के लिए क्षतिपूर्ति बताया है।
विश्लेषकों के अनुसार यह प्रस्ताव काफी “मैक्सिमलिस्ट” माना जा रहा है—यानी इसमें एक साथ कई बड़ी राजनीतिक और आर्थिक रियायतें मांगी गई हैं।
अमेरिका की प्रतिक्रिया तेज़ और सख्त थी। जब ईरान ने अपना जवाब राजनयिक चैनलों के माध्यम से भेजा, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे सार्वजनिक रूप से “TOTALLY UNACCEPTABLE” बताते हुए खारिज कर दिया।
इस प्रतिक्रिया से स्पष्ट हो गया कि दोनों पक्षों के बीच दूरी अभी भी काफी बड़ी है। अमेरिकी पक्ष की चिंताओं में ईरान का परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शामिल हैं, जिन्हें तेहरान के प्रस्ताव में पूरी तरह संबोधित नहीं किया गया था।
इन वार्ताओं में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में सामने आया है। चूँकि अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत सीमित रही है, इसलिए इस्लामाबाद दोनों देशों के बीच प्रस्ताव और जवाब पहुँचाने का काम कर रहा है।
यह कूटनीतिक संपर्क बातचीत को पूरी तरह टूटने से बचाए हुए है। हालांकि रिपोर्टों के मुताबिक ईरान का नया प्रस्ताव पहले दिए गए प्रस्तावों से काफी मिलता‑जुलता है जिन्हें अमेरिका पहले ही खारिज कर चुका है।
इस कूटनीतिक गतिरोध का असर वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर भी पड़ा है। खास तौर पर होरमुज़ जलडमरूमध्य—जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है—इस तनाव का केंद्र बना हुआ है।
दुनिया के लगभग 20% तेल की आपूर्ति इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरती है, इसलिए यहाँ किसी भी रुकावट का असर तुरंत वैश्विक कीमतों पर पड़ता है।
जब ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव खारिज किया, तो बाज़ार में यह आशंका बढ़ गई कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है। इसके चलते तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया।
हालाँकि बाद में ईरानी मीडिया में आई खबरों के बाद कीमतों में थोड़ी गिरावट आई, जिनमें कहा गया कि अमेरिका संभवतः ईरानी कच्चे तेल के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध‑छूट देने पर विचार कर सकता है। इस खबर के बाद ब्रेंट क्रूड लगभग 1.48 डॉलर गिरकर 107.78 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि इससे पहले यह 112 डॉलर तक पहुँच गया था।
फिर भी बाज़ार में अस्थिरता बनी हुई है, क्योंकि युद्ध और शिपिंग मार्गों में रुकावट की आशंका अभी भी बनी हुई है।
भले ही वार्ताएँ फिलहाल अटकी हुई हैं, लेकिन कूटनीतिक संपर्क पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। पाकिस्तान अभी भी दोनों देशों के बीच संदेशों का आदान‑प्रदान करा रहा है और दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने की इच्छा जताते रहे हैं।
लेकिन वास्तविक प्रगति तभी संभव होगी जब ईरान की प्रमुख मांगों—जैसे प्रतिबंध हटाना, सुरक्षा गारंटी और मुआवज़ा—और अमेरिका की शर्तों के बीच की दूरी कम हो सके। तब तक न केवल बातचीत अनिश्चित बनी रहेगी, बल्कि वैश्विक तेल बाज़ार भी इस तनाव से प्रभावित होता रहेगा।
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