इस सौदे की किस्मत सीधे-सीधे ईरान की अर्थव्यवस्था का गला घोंट रही अमेरिकी नौसैनिक ताकत से जुड़ी है। इस्लामाबाद वार्ता टूटने के बाद 13 अप्रैल को लगाई गई अमेरिकी नाकेबंदी से ईरान को व्यापार में रोज़ाना लगभग 400 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है, और यही वाशिंगटन का मुख्य सौदेबाज़ी का हथियार बन गई है ।
प्रस्तावित एमओयू के तहत, अमेरिका नाकेबंदी हटाएगा और बदले में ईरान एक महीने के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाज़रानी को युद्ध-पूर्व स्तर पर बहाल करेगा । फिर भी, ईरान पहले ही संकेत दे चुका है कि युद्धविराम के दौरान भी वह युद्ध-पूर्व की तरह नौवहन की पूर्ण स्वतंत्रता बहाल नहीं करेगा। उसकी मंशा उस जलमार्ग पर स्थायी नियंत्रण पाने की है, जिससे दुनिया का करीब 20% तेल गुज़रता है
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यह बुनियादी असहमति सुनिश्चित करती है कि लड़ाई में एक अस्थायी ठहराव भी, इस जलडमरूमध्य पर लंबी अवधि के प्रभुत्व के लिए जारी रणनीतिक चालों से घिरा रहेगा।
अस्थायी समझौता नई परमाणु वार्ता की नींव भी रखता है। यह वही मुद्दा है जिसने पिछली बातचीत के पतन के बाद संघर्ष को जन्म दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, इस ढाँचे में साफ तौर पर कहा गया है कि ईरान को "यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं होगी" । यह ईरान की घोषित 'लाल रेखाओं' से सीधा टकराव पैदा करता है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रमुख, इब्राहिम अज़ीज़ी ने सार्वजनिक रूप से ज़ोर देकर कहा है कि देश संवर्धन के अपने अधिकार, समृद्ध यूरेनियम पर कब्ज़े, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, और पूर्ण प्रतिबंध हटाने की माँग से पीछे नहीं हटेगा
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नाकेबंदी और संवर्धन पर रोक के तात्कालिक मुद्दों से परे, कई अन्य बड़ी बाधाएँ इस प्रारंभिक एमओयू से अछूती रह गई हैं, जिन्हें भविष्य की बातचीत में सुलझाने के लिए छोड़ दिया गया है :
शायद इस सौदे के लिए सबसे तात्कालिक ख़तरा खुद ईरान के भीतर से ही उठ रहा है। कट्टरपंथियों के तीव्र विरोध ने स्वर्गीय सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई के शोक में शुरू हुई रात्रिकालीन सड़क सभाओं को एक स्थायी राजनीतिक दबाव अभियान में बदल दिया है, जो वाशिंगटन से बात करने को तैयार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ है ।
ये समूह ईरान को युद्ध का विजेता बताते हैं और मुख्य वार्ताकार, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ़ पर दिवंगत सर्वोच्च नेता द्वारा तय की गई लाल रेखाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हैं । यह गुट, भले ही एक "सीमांत लेकिन मुखर समूह" है, संसद और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में अपनी सीटों के ज़रिए प्रभाव रखता है। यह सरकारी मीडिया का इस्तेमाल कर अपने संदेश को बढ़ा-चढ़ाकर पहुँचाता है और सार्वजनिक रूप से ग़ालिबाफ़ को निशाना बनाता है
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आंतरिक राजनीतिक खींचतान इतनी गहरी है कि मई के मध्य में तेहरान द्वारा अमेरिकी शर्तों को ठुकराने से पहले ही यह आशंका बलवती हो गई थी कि युद्धविराम ध्वस्त हो जाएगा और कुछ ही दिनों में लड़ाई फिर शुरू हो जाएगी ।
60 दिन का युद्धविराम विस्तार एक कूटनीतिक जीवन रेखा है, कोई शांति समझौता नहीं। यह राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर पर टिका है, इसे लागू करने वाले ईरानी अधिकारियों से ही इसका घोर विरोध हो रहा है, और यह हर बुनियादी विवाद को ऐसे अनिश्चित भविष्य के लिए टाल देता है जो किसी भी स्थिति में पक्का नहीं है।
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