इस पूरे संकट में पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच प्रमुख कूटनीतिक चैनल बनकर उभरा है।
इस प्रकार पाकिस्तान की ‘शटल डिप्लोमेसी’ ने तेहरान और वॉशिंगटन के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत को संभव बनाया है।
अमेरिका की रणनीति दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है—कूटनीतिक बातचीत और सैन्य दबाव।
रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सार्वजनिक रूप से तेजी से समझौते की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यदि ईरान की प्रतिक्रिया अमेरिकी मांगों के अनुरूप नहीं हुई तो सैन्य कार्रवाई फिर शुरू हो सकती है।
व्हाइट हाउस ईरान के प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ अगले कदमों—जैसे बातचीत जारी रखना या दबाव बढ़ाना—पर विचार कर रहा है।
कूटनीतिक प्रगति के बावजूद कई अहम मुद्दे अभी तक सुलझे नहीं हैं।
अप्रैल 2026 की शुरुआत से एक नाजुक युद्धविराम लागू है, जब पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान ने अस्थायी संघर्षविराम पर सहमति जताई थी। इसके बावजूद दोनों पक्षों पर उल्लंघन के आरोप लगे और समझौते को कई बार बढ़ाना पड़ा।
ज्यादातर प्रस्ताव दो चरणों की संरचना पर आधारित हैं—पहले तत्काल युद्धविराम, फिर व्यापक राजनीतिक समझौते पर बातचीत।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस पूरी वार्ता का सबसे कठिन मुद्दा बना हुआ है।
तेहरान ने अपनी जमी हुई संपत्तियों को जारी करने और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत की मांग की है, जबकि वॉशिंगटन यूरेनियम संवर्धन और परमाणु निगरानी पर अधिक सख्त प्रतिबद्धताएँ चाहता है।
इन मतभेदों के कारण कई प्रस्तावों में अंतिम परमाणु समझौते को युद्ध समाप्त होने के बाद के चरण के लिए टाल दिया गया है।
फारस की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ने वाला होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। इसलिए इसकी सुरक्षा वार्ता का केंद्रीय मुद्दा बन गई है।
कुछ कूटनीतिक ढाँचे युद्धविराम को इस जलमार्ग के फिर से खुलने और समुद्री यातायात की स्थिरता से जोड़ते हैं।
ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह इस जलडमरूमध्य को केवल स्थायी युद्धविराम की स्थिति में पूरी तरह खोलने पर विचार करेगा, अस्थायी समझौते के तहत नहीं।
दुनिया के लगभग 20% तेल की आपूर्ति सामान्यतः इसी जलडमरूमध्य से गुजरती है। इसलिए वार्ता से जुड़ी हर खबर का असर तुरंत बाजारों पर पड़ता है।
निवेशक इसलिए किसी भी वास्तविक कूटनीतिक प्रगति को तेल कीमतों के लिए नकारात्मक लेकिन वैश्विक जोखिम भावना के लिए सकारात्मक संकेत मानते हैं।
यह वार्ता अमेरिकी घरेलू राजनीति से भी अलग नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार ऊर्जा कीमतों और आर्थिक असर को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप पर दबाव बढ़ रहा है।
हालाँकि उपलब्ध रिपोर्टिंग में मुख्य रूप से व्हाइट हाउस के भीतर की रणनीति और राष्ट्रपति के बयानों पर ही ध्यान दिया गया है; अमेरिकी कांग्रेस की विस्तृत प्रतिक्रिया अभी ज्यादा स्पष्ट नहीं है।
कुल मिलाकर कूटनीतिक स्थिति पहले से आगे बढ़ती दिख रही है और एक संभावित फ्रेमवर्क समझौता करीब लगता है। फिर भी अभी तक किसी अंतिम शांति समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मुख्य मध्यस्थ बना हुआ है, जबकि परमाणु नीति, युद्धविराम की गारंटी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे अभी भी वार्ता को जटिल बनाए हुए हैं।
अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है—समझौते की दिशा में प्रगति दिख रही है, लेकिन सबसे कठिन मुद्दे अभी भी मेज पर हैं।
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