पहले संस्करण में जिन खेलों को शामिल करने की योजना है, उनमें शामिल हैं:
ओलंपिक जैसी प्रतियोगिताओं में जहाँ World Anti‑Doping Agency (WADA) के सख्त नियम लागू होते हैं, वहीं Enhanced Games में खिलाड़ी कुछ प्रदर्शन बढ़ाने वाले पदार्थों का उपयोग कर सकते हैं — जैसे स्टेरॉयड, टेस्टोस्टेरोन, ग्रोथ हार्मोन, पेप्टाइड्स और स्टिमुलेंट — यदि वे कानूनी रूप से निर्धारित हों और चिकित्सा जांच पास करें।
यहाँ पारंपरिक ड्रग टेस्टिंग की जगह खिलाड़ियों की मेडिकल स्क्रीनिंग और लगातार स्वास्थ्य निगरानी की जाती है। आयोजकों का कहना है कि उद्देश्य मानव प्रदर्शन की सीमाओं को आगे बढ़ाना है, लेकिन बिना निगरानी के डोपिंग से होने वाले जोखिम को कम करना भी है।
Enhanced Games के पीछे मुख्य तर्क यह है कि डोपिंग पहले से ही एलीट खेलों में मौजूद है, चाहे नियम कितने ही सख्त क्यों न हों।
आयोजकों का कहना है कि अगर इस वास्तविकता को छिपाने के बजाय खुलकर स्वीकार किया जाए तो इसे बेहतर तरीके से समझा और नियंत्रित किया जा सकता है। वे इसे मानव प्रदर्शन की सीमाओं का अध्ययन करने वाला एक “science‑positive” प्रयोग मानते हैं।
इस मॉडल में आम तौर पर:
समर्थकों का दावा है कि यह प्रणाली उस स्थिति से अधिक सुरक्षित हो सकती है जहाँ खिलाड़ी गुप्त रूप से बिना चिकित्सकीय देखरेख के डोपिंग करते हैं।
काफी विवाद के बावजूद कई पेशेवर खिलाड़ी इस प्रतियोगिता से जुड़ चुके हैं। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।
ओलंपिक स्तर के कई खिलाड़ी बड़े प्रायोजन (sponsorship) के बिना बहुत कम कमाई करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार Enhanced Games खिलाड़ियों को काफी अधिक इनाम राशि और भुगतान की पेशकश कर रहे हैं।
अमेरिकी तैराक और ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता कोडी मिलर (Cody Miller) ने कहा है कि पेशेवर तैराकी में आजकल अच्छी कमाई करना पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है।
कुछ खिलाड़ियों के लिए यह उस स्थिति से बेहतर लगता है जहाँ प्रदर्शन बढ़ाने वाले पदार्थों का उपयोग — यदि होता भी है — तो बिना निगरानी के किया जाता है।
कुछ खिलाड़ी मानते हैं कि पारंपरिक खेल संस्थाएँ खिलाड़ियों को पर्याप्त आर्थिक और पेशेवर समर्थन नहीं देतीं।
अमेरिकी स्प्रिंटर शानिया कॉलिन्स (Shania Collins) ने भी अपने निर्णय की वजह बताते हुए कहा कि इस कार्यक्रम में उन्हें बेहतर चिकित्सा निगरानी, प्रशिक्षण संसाधन, रिकवरी सपोर्ट और आर्थिक मुआवजा मिल रहा है।
खेल संगठनों और एंटी‑डोपिंग एजेंसियों ने इस प्रतियोगिता की तीखी आलोचना की है।
World Anti‑Doping Agency (WADA) ने इसे “खतरनाक और गैर‑जिम्मेदाराना अवधारणा” बताया है और कहा है कि शक्तिशाली प्रदर्शन‑बढ़ाने वाले पदार्थों को बढ़ावा देना खिलाड़ियों की सेहत के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
आलोचकों की प्रमुख चिंताएँ इस प्रकार हैं।
कई PEDs लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े रहे हैं, खासकर जब उनकी खुराक अधिक हो या उपयोग लंबे समय तक हो। इसलिए एंटी‑डोपिंग समूहों का कहना है कि इनका उपयोग बढ़ावा देना खिलाड़ियों को अनावश्यक खतरे में डाल सकता है।
आर्थिक और नैतिक विशेषज्ञ इसे प्रतिस्पर्धात्मक दबाव (coercion) का मुद्दा भी बताते हैं।
अगर ड्रग्स लेने वाले खिलाड़ी लगातार बेहतर प्रदर्शन करें, तो दूसरे खिलाड़ियों को भी प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए वही रास्ता अपनाने का दबाव महसूस हो सकता है।
आलोचकों को यह भी चिंता है कि ऐसी प्रतियोगिता युवा खिलाड़ियों को गलत संदेश दे सकती है। यदि शीर्ष स्तर पर ड्रग्स को सामान्य दिखाया जाता है, तो युवा खिलाड़ी बिना उचित निगरानी के उन्हें अपनाने की कोशिश कर सकते हैं।
आधुनिक एंटी‑डोपिंग नियमों का एक बड़ा सिद्धांत यह है कि खेलों में जीत प्राकृतिक प्रतिभा, मेहनत और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा से तय होनी चाहिए, न कि दवाओं से।
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) और WADA का कहना है कि Enhanced Games इस मूल विचार को चुनौती देते हैं।
Enhanced Games आधुनिक एंटी‑डोपिंग व्यवस्था के लिए सबसे बड़े चुनौतियों में से एक माने जा रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि यह डोपिंग की वास्तविकता को स्वीकार कर वैज्ञानिक निगरानी के साथ पारदर्शी बनाता है। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि इससे फार्माकोलॉजी की “हथियारों की दौड़” शुरू हो सकती है और खेलों की निष्पक्षता कमजोर हो सकती है।
आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि यह प्रयोग सफल होता है या तीखी आलोचना के कारण सीमित रह जाता है। लेकिन एक बात तय है — इसने खेलों में निष्पक्षता, स्वास्थ्य और मानव प्रदर्शन की सीमाओं पर एक वैश्विक बहस जरूर शुरू कर दी है।