17 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार, पाक्स स्वतः बंद होने की सीमा से केवल 9 सेंटीमीटर ऊपर था। एक विशेषज्ञ प्रकाशन ने बताया कि संयंत्र की आठ में से सिर्फ एक टर्बाइन चल रही थी और उत्पादन सामान्य 2 GW क्षमता के करीब 10% तक घट गया था। हालांकि 480 MW और आठ टर्बाइनों से संबंधित ये विशिष्ट आंकड़े उपलब्ध अधिक विश्वसनीय स्रोतों से स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं हैं। इसलिए इन्हें उस समय की रिपोर्टिंग के आंकड़े के रूप में देखना चाहिए, सर्वसम्मत रूप से सत्यापित संख्या के रूप में नहीं।
हंगरी ने घरों और कारोबारों से बिजली की खपत घटाने की अपील की, ताकि ग्रिड पर दबाव कम किया जा सके। सरकार ने पाक्स के जल-ग्रहण क्षेत्र में जरूरी परिस्थितियां बनाए रखने और नदी के प्रवाह को प्रबंधित करने की कोशिश भी की। बारिश के पूर्वानुमान के बीच सबसे अहम सवाल यह था कि क्या ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से आने वाला पानी और किए जा रहे नियामकीय उपाय डेन्यूब का स्तर इतना जल्दी बढ़ा पाएंगे कि संयंत्र बंद होने से बच सके। जलस्तर और गिरता तो और इकाइयों को बंद करना पड़ सकता था।
बाद में बारिश से स्थिति में कुछ सुधार की उम्मीद बनी। जलस्तर बढ़ने पर हंगरी ने पाक्स की एक टर्बाइन फिर शुरू करने की योजना बनाई, लेकिन चेतावनी दी गई कि अगर बारिश जारी नहीं रही तो यह सुधार अस्थायी हो सकता है। यानी संयंत्र मौसम और नदी की स्थिति सुधरने पर धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ा सकता है, पर डेन्यूब पर उसकी मूलभूत निर्भरता बनी रहती है।
रोमानिया के सेर्नावोदा संयंत्र के दोनों रिएक्टरों की क्षमता लगभग 706-706 MW है। पहला रिएक्टर पहले ही बंद किया जा चुका था। डेन्यूब का जलस्तर और गिरने के बाद दूसरे रिएक्टर को भी बिजली ग्रिड से अलग कर दिया गया, जिससे करीब 1,400 MW क्षमता वाला पूरा संयंत्र बंद हो गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सूखे के कारण 2003 के बाद यह पहली बार था जब संयंत्र पूरी तरह ठप हुआ।
सेर्नावोदा आम तौर पर रोमानिया की करीब 20% बिजली पैदा करता है। इसलिए दोनों रिएक्टरों का एक साथ बंद होना उस समय विशेष रूप से गंभीर था, जब देश पहले ही बिजली आपूर्ति के दबाव में था। रोमानिया ने अगस्त में ऊर्जा आपातस्थिति घोषित की और लोगों तथा कारोबारों से स्वेच्छा से बिजली की खपत कम करने को कहा।
संयंत्र तक पानी का प्रवाह बनाए रखने के लिए अधिकारियों ने असाधारण कदम उठाए। रिपोर्टों के मुताबिक, नदी तल में मौजूद अवरोध हटाने के लिए नियंत्रित विस्फोट किए गए, नदी की खुदाई की गई और पत्थरों से भरी चार बजरों को डुबोकर प्रवाह को जल-ग्रहण क्षेत्र की ओर मोड़ने की कोशिश हुई। इन उपायों से कुछ समय जरूर खरीदा जा सकता है, लेकिन स्थायी शीतलन जल-स्रोत का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। रिएक्टरों को फिर शुरू करने के लिए नदी का जलस्तर और प्रवाह सुरक्षित एवं टिकाऊ स्तर तक लौटना जरूरी है।
भीषण गर्मी बिजली व्यवस्था पर दोहरा दबाव डालती है। तापमान बढ़ने पर घरों और दफ्तरों में कूलर तथा एयर कंडीशनर अधिक चलते हैं, जिससे मांग बढ़ती है। उसी समय सूखा नदियों में उपलब्ध पानी घटा देता है, जिससे बिजली संयंत्रों की शीतलन क्षमता कम हो सकती है। पानी कम होने के साथ उसका तापमान भी बढ़े तो संयंत्रों को उत्पादन घटाना पड़ सकता है या गर्म पानी को नदी में वापस छोड़ने पर पर्यावरणीय सीमाओं का सामना करना पड़ सकता है।
यूरोपीय संघ के पृथ्वी-अवलोकन कार्यक्रम कॉपरनिकस के अनुसार, जुलाई और अगस्त में सूखा और गंभीर हुआ तथा डेन्यूब, लोआर, पो और राइन नदियां अगस्त में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गईं। ये नदियां केवल परमाणु संयंत्रों को ठंडा करने के काम नहीं आतीं; इन पर जलविद्युत, माल ढुलाई और औद्योगिक गतिविधियां भी निर्भर हैं। इसीलिए एक ही जलवायु झटका बिजली की आपूर्ति घटा सकता है, मांग बढ़ा सकता है, ईंधन और माल परिवहन बाधित कर सकता है और आर्थिक लागत बढ़ा सकता है।
फ्रांस के परमाणु संयंत्र भी ऊंचे नदी तापमान और कम जलप्रवाह से प्रभावित हुए। उपलब्ध ICIS विश्लेषण के अनुसार, फ्रांस, हंगरी और रोमानिया में करीब 7 GW परमाणु क्षमता लंबे समय तक चली गर्मी और असामान्य रूप से कम नदी जलस्तर के कारण बंद थी। इस अनुमान में फ्रांस की हिस्सेदारी लगभग 5 GW थी। यह बाजार-विश्लेषण पर आधारित आंकड़ा है, पूरे यूरोप के लिए कोई एक आधिकारिक संयुक्त आंकड़ा नहीं।
कम प्रवाह का असर जलविद्युत पर भी पड़ता है। इसके साथ ही डेन्यूब और राइन का जलस्तर घटने से जहाजों में कम माल लादना पड़ता है, जिससे माल ढुलाई बाधित होती है और कंपनियों की आमदनी प्रभावित होती है। CNBC ने ट्रायोडोस के एक अनुमान का हवाला देते हुए कहा कि गर्मी से जुड़ी बाधाओं के कारण यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था को 180 अरब यूरो, यानी लगभग 1% GDP, का नुकसान हो सकता है। यह किसी संस्था का अनुमान है, पहले से सत्यापित वास्तविक नुकसान नहीं।
पाक्स और सेर्नावोदा का अनुभव दिखाता है कि बिजली व्यवस्था के लिए पानी भी ईंधन, ट्रांसमिशन लाइनों और उत्पादन क्षमता जितना ही महत्वपूर्ण इनपुट है। परमाणु ऊर्जा स्थिर बिजली दे सकती है, लेकिन नदी किनारे बने संयंत्रों का सुरक्षित संचालन जलस्तर, प्रवाह और तापमान पर निर्भर रहता है।
जब गर्मी और सूखा एक साथ आते हैं, तो जोखिम किसी एक संयंत्र तक सीमित नहीं रहता। परमाणु और जलविद्युत उत्पादन एक साथ घट सकते हैं, जबकि शीतलन की मांग तेज हो जाती है। कम जलस्तर नदी परिवहन को भी प्रभावित करता है, जिससे ईंधन और अन्य वस्तुओं को बाजार तक पहुंचाना कठिन हो सकता है।
डेन्यूब का यह संकट जलवायु परिवर्तन के दौर में यूरोप के ऊर्जा बुनियादी ढांचे की तैयारी के लिए चेतावनी है। बारिश पाक्स को कुछ समय के लिए आंशिक रूप से सामान्य कर सकती है, लेकिन एक मौसम की बारिश उन संयंत्रों के दीर्घकालिक जल-जोखिम को खत्म नहीं करती जो लगातार दबाव झेलती नदियों पर निर्भर हैं।
17 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार, पाक्स स्वतः बंद होने की सीमा से केवल 9 सेंटीमीटर ऊपर था। एक विशेषज्ञ प्रकाशन ने बताया कि संयंत्र की आठ में से सिर्फ एक टर्बाइन चल रही थी और उत्पादन सामान्य 2 GW क्षमता के करीब 10% तक घट गया था। हालांकि 480 MW और आठ टर्बाइनों से संबंधित ये विशिष्ट आंकड़े उपलब्ध अधिक विश्वसनीय स्रोतों से स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं हैं। इसलिए इन्हें उस समय की रिपोर्टिंग के आंकड़े के रूप में देखना चाहिए, सर्वसम्मत रूप से सत्यापित संख्या के रूप में नहीं।
हंगरी ने घरों और कारोबारों से बिजली की खपत घटाने की अपील की, ताकि ग्रिड पर दबाव कम किया जा सके। सरकार ने पाक्स के जल-ग्रहण क्षेत्र में जरूरी परिस्थितियां बनाए रखने और नदी के प्रवाह को प्रबंधित करने की कोशिश भी की। बारिश के पूर्वानुमान के बीच सबसे अहम सवाल यह था कि क्या ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से आने वाला पानी और किए जा रहे नियामकीय उपाय डेन्यूब का स्तर इतना जल्दी बढ़ा पाएंगे कि संयंत्र बंद होने से बच सके। जलस्तर और गिरता तो और इकाइयों को बंद करना पड़ सकता था।
बाद में बारिश से स्थिति में कुछ सुधार की उम्मीद बनी। जलस्तर बढ़ने पर हंगरी ने पाक्स की एक टर्बाइन फिर शुरू करने की योजना बनाई, लेकिन चेतावनी दी गई कि अगर बारिश जारी नहीं रही तो यह सुधार अस्थायी हो सकता है। यानी संयंत्र मौसम और नदी की स्थिति सुधरने पर धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ा सकता है, पर डेन्यूब पर उसकी मूलभूत निर्भरता बनी रहती है।
रोमानिया के सेर्नावोदा संयंत्र के दोनों रिएक्टरों की क्षमता लगभग 706-706 MW है। पहला रिएक्टर पहले ही बंद किया जा चुका था। डेन्यूब का जलस्तर और गिरने के बाद दूसरे रिएक्टर को भी बिजली ग्रिड से अलग कर दिया गया, जिससे करीब 1,400 MW क्षमता वाला पूरा संयंत्र बंद हो गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सूखे के कारण 2003 के बाद यह पहली बार था जब संयंत्र पूरी तरह ठप हुआ।
सेर्नावोदा आम तौर पर रोमानिया की करीब 20% बिजली पैदा करता है। इसलिए दोनों रिएक्टरों का एक साथ बंद होना उस समय विशेष रूप से गंभीर था, जब देश पहले ही बिजली आपूर्ति के दबाव में था। रोमानिया ने अगस्त में ऊर्जा आपातस्थिति घोषित की और लोगों तथा कारोबारों से स्वेच्छा से बिजली की खपत कम करने को कहा।
संयंत्र तक पानी का प्रवाह बनाए रखने के लिए अधिकारियों ने असाधारण कदम उठाए। रिपोर्टों के मुताबिक, नदी तल में मौजूद अवरोध हटाने के लिए नियंत्रित विस्फोट किए गए, नदी की खुदाई की गई और पत्थरों से भरी चार बजरों को डुबोकर प्रवाह को जल-ग्रहण क्षेत्र की ओर मोड़ने की कोशिश हुई। इन उपायों से कुछ समय जरूर खरीदा जा सकता है, लेकिन स्थायी शीतलन जल-स्रोत का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। रिएक्टरों को फिर शुरू करने के लिए नदी का जलस्तर और प्रवाह सुरक्षित एवं टिकाऊ स्तर तक लौटना जरूरी है।
भीषण गर्मी बिजली व्यवस्था पर दोहरा दबाव डालती है। तापमान बढ़ने पर घरों और दफ्तरों में कूलर तथा एयर कंडीशनर अधिक चलते हैं, जिससे मांग बढ़ती है। उसी समय सूखा नदियों में उपलब्ध पानी घटा देता है, जिससे बिजली संयंत्रों की शीतलन क्षमता कम हो सकती है। पानी कम होने के साथ उसका तापमान भी बढ़े तो संयंत्रों को उत्पादन घटाना पड़ सकता है या गर्म पानी को नदी में वापस छोड़ने पर पर्यावरणीय सीमाओं का सामना करना पड़ सकता है।
यूरोपीय संघ के पृथ्वी-अवलोकन कार्यक्रम कॉपरनिकस के अनुसार, जुलाई और अगस्त में सूखा और गंभीर हुआ तथा डेन्यूब, लोआर, पो और राइन नदियां अगस्त में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गईं। ये नदियां केवल परमाणु संयंत्रों को ठंडा करने के काम नहीं आतीं; इन पर जलविद्युत, माल ढुलाई और औद्योगिक गतिविधियां भी निर्भर हैं। इसीलिए एक ही जलवायु झटका बिजली की आपूर्ति घटा सकता है, मांग बढ़ा सकता है, ईंधन और माल परिवहन बाधित कर सकता है और आर्थिक लागत बढ़ा सकता है।
फ्रांस के परमाणु संयंत्र भी ऊंचे नदी तापमान और कम जलप्रवाह से प्रभावित हुए। उपलब्ध ICIS विश्लेषण के अनुसार, फ्रांस, हंगरी और रोमानिया में करीब 7 GW परमाणु क्षमता लंबे समय तक चली गर्मी और असामान्य रूप से कम नदी जलस्तर के कारण बंद थी। इस अनुमान में फ्रांस की हिस्सेदारी लगभग 5 GW थी। यह बाजार-विश्लेषण पर आधारित आंकड़ा है, पूरे यूरोप के लिए कोई एक आधिकारिक संयुक्त आंकड़ा नहीं।
कम प्रवाह का असर जलविद्युत पर भी पड़ता है। इसके साथ ही डेन्यूब और राइन का जलस्तर घटने से जहाजों में कम माल लादना पड़ता है, जिससे माल ढुलाई बाधित होती है और कंपनियों की आमदनी प्रभावित होती है। CNBC ने ट्रायोडोस के एक अनुमान का हवाला देते हुए कहा कि गर्मी से जुड़ी बाधाओं के कारण यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था को 180 अरब यूरो, यानी लगभग 1% GDP, का नुकसान हो सकता है। यह किसी संस्था का अनुमान है, पहले से सत्यापित वास्तविक नुकसान नहीं।
पाक्स और सेर्नावोदा का अनुभव दिखाता है कि बिजली व्यवस्था के लिए पानी भी ईंधन, ट्रांसमिशन लाइनों और उत्पादन क्षमता जितना ही महत्वपूर्ण इनपुट है। परमाणु ऊर्जा स्थिर बिजली दे सकती है, लेकिन नदी किनारे बने संयंत्रों का सुरक्षित संचालन जलस्तर, प्रवाह और तापमान पर निर्भर रहता है।
जब गर्मी और सूखा एक साथ आते हैं, तो जोखिम किसी एक संयंत्र तक सीमित नहीं रहता। परमाणु और जलविद्युत उत्पादन एक साथ घट सकते हैं, जबकि शीतलन की मांग तेज हो जाती है। कम जलस्तर नदी परिवहन को भी प्रभावित करता है, जिससे ईंधन और अन्य वस्तुओं को बाजार तक पहुंचाना कठिन हो सकता है।
डेन्यूब का यह संकट जलवायु परिवर्तन के दौर में यूरोप के ऊर्जा बुनियादी ढांचे की तैयारी के लिए चेतावनी है। बारिश पाक्स को कुछ समय के लिए आंशिक रूप से सामान्य कर सकती है, लेकिन एक मौसम की बारिश उन संयंत्रों के दीर्घकालिक जल-जोखिम को खत्म नहीं करती जो लगातार दबाव झेलती नदियों पर निर्भर हैं।