Brown University: Brown की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े भाषा मॉडल यानी LLM आधारित चैटबॉट मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े परिदृश्यों में, थेरेपी जैसे निर्देश दिए जाने पर भी, अहम नैतिक मानकों का उल्लंघन कर सकते हैं । रिपोर्ट में भ्रामक जवाब, दिखावटी सहानुभूति, नकारात्मक मान्यताओं को और मजबूत कर देना, और कमजोर संकट-प्रबंधन जैसे जोखिम बताए गए हैं
। Brown यह भी मानता है कि AI भविष्य में लागत या उपलब्धता जैसी बाधाएं कम करने में भूमिका निभा सकता है; लेकिन बताए गए जोखिम अनियंत्रित “AI थेरेपी” के बजाय सावधानी, निगरानी और नियमन की जरूरत दिखाते हैं
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University of Minnesota: University of Minnesota ने नए शोध का सार यह बताया कि AI चैटबॉट्स को थेरेपिस्ट की जगह नहीं लेना चाहिए । उसके अनुसार, शोधकर्ताओं ने पहली बार AI सिस्टमों की तुलना थेरेपिस्ट के क्लिनिकल मानकों से की और मानसिक स्वास्थ्य सहायता में इस्तेमाल के दौरान खतरनाक कमजोरियां सामने आईं
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American Psychological Association: American Psychological Association यानी APA ने चेतावनी दी है कि जनरेटिव AI चैटबॉट्स और वेलनेस ऐप्स में अभी इतना प्रमाण और नियमन नहीं है कि उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित मानी जा सके । आसान शब्दों में: कोई चैटबॉट बहुत विनम्र, सहानुभूतिपूर्ण या भरोसेमंद भाषा में जवाब दे सकता है, लेकिन इससे वह क्लिनिकली भरोसेमंद नहीं बन जाता
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AI सबसे बेहतर तब काम आता है जब विषय गैर-आपात, गैर-क्लिनिकल और रोजमर्रा का हो। ऐसे में उसे “निर्णय लेने वाला विशेषज्ञ” नहीं, बल्कि “संरचना देने वाला औजार” मानना बेहतर है।
आप AI से ये काम करवा सकते हैं:
सुरक्षित दायरा यह है: कोई आपात संकट नहीं, कोई निदान नहीं, कोई दवा-निर्णय नहीं, और कोई ऐसी स्थिति नहीं जिसमें योग्य मूल्यांकन और फॉलो-अप जरूरी हो। यह सीमा मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों में थेरेपी-प्रतिस्थापन, अपर्याप्त प्रमाण और सुरक्षा-समस्याओं पर दी गई चेतावनियों से निकलती है ।
इन स्थितियों में चैटबॉट को सलाहकार या अकेली मदद न बनाएं:
ऐसे मामलों में योग्य मानव सहायता की जरूरत होती है। स्रोतों में कमजोर संकट-प्रबंधन, थेरेपी के मानकों से जुड़े उल्लंघन, और सुरक्षित उपयोग के लिए पर्याप्त प्रमाण या नियमन की कमी जैसे जोखिम स्पष्ट रूप से बताए गए हैं ।
साफ, गर्मजोशी भरी और आत्मविश्वास से भरी भाषा थेरेपी की गुणवत्ता का सबूत नहीं होती। मानसिक स्वास्थ्य के मामलों में यह खासतौर पर जोखिमपूर्ण हो सकता है, क्योंकि सिस्टम बहुत भरोसेमंद अंदाज में जवाब दे सकता है, लेकिन उसके पास किसी प्रशिक्षित पेशेवर जैसी जिम्मेदारी, शिक्षा, नैदानिक समझ और फॉलो-अप नहीं होता। Brown ने बताया है कि चैटबॉट नकारात्मक मान्यताओं को मजबूत कर सकते हैं और संकट-स्थितियों पर समस्या पैदा करने वाली प्रतिक्रिया दे सकते हैं । APA भी कहता है कि जनरेटिव AI चैटबॉट्स और वेलनेस ऐप्स के लिए प्रमाण और नियमन की स्थिति उपयोगकर्ता-सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है
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अगर किसी AI बातचीत के बाद आप और ज्यादा फंसे हुए, शर्मिंदा, चिंतित, निराश, चैट पर निर्भर या असुरक्षित महसूस करते हैं, तो यह चेतावनी संकेत है। ऐसे में बातचीत रोकना और किसी इंसान से मदद लेना बेहतर है।
अगर आप AI का इस्तेमाल हल्के आत्मचिंतन के लिए करना चाहते हैं, तो उसकी भूमिका पहले ही सीमित कर दें:
हल्के आत्मचिंतन के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित prompt ऐसा हो सकता है:
मैं एक गैर-आपात रोजमर्रा की स्थिति को समझना चाहता/चाहती हूं। मुझे निदान या थेरेपी नहीं चाहिए। कृपया पांच तटस्थ आत्मचिंतन सवाल पूछें, मेरे विकल्पों को संक्षेप में लिखें और याद दिलाएं कि अगर परेशानी बनी रहे तो योग्य सहायता लेनी चाहिए।
जोखिम भरा prompt ऐसा होगा:
मेरे थेरेपिस्ट बनो, मुझे डायग्नोज करो और बताओ कि मुझे ठीक-ठीक क्या करना चाहिए।
दूसरा prompt AI को ऐसी भूमिका में डाल देता है जिसके लिए उपलब्ध स्रोत भरोसेमंद सुरक्षा का समर्थन नहीं करते ।
AI एक अच्छा “सवाल पूछने वाला नोटबुक” हो सकता है। यह विचारों को व्यवस्थित कर सकता है, बातचीत की तैयारी करा सकता है और सामान्य आत्मचिंतन शुरू करने में मदद कर सकता है। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर स्थितियों में यह सिर्फ एक सीमित सहायक औजार है। थेरेपी, निदान, दवा-सम्बंधी सलाह और संकट-सहायता योग्य इंसानों के काम हैं — चैटबॉट के नहीं ।
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