इसी तरह, 19वीं सदी के अमेरिका में महिलाओं को दी जाने वाली patent medicines कहलाने वाली बाज़ारी तैयार दवाओं पर एक शोध पुरुष डॉक्टरों के दृष्टिकोण का अध्ययन करता है, जिन्होंने ऐसे उपचारों को अपनी महिला मरीजों के लिए उचित माना ।
इन सबके साथ जब यह तथ्य पढ़ते हैं कि उस दौर की चिकित्सा में महिला-स्वास्थ्य की व्याख्या अक्सर गर्भाशय के इर्द-गिर्द की जाती थी , तो पढ़ाई और गर्भाशय वाली कहानी ऐतिहासिक माहौल में संभव-सी लग सकती है। लेकिन संभव-सा लगना और पाठ्यपुस्तक का प्रमाण मिलना दो अलग बातें हैं।
यहीं सबसे जरूरी फर्क आता है। जिन स्रोतों में किताबों का उल्लेख है, वे अधिकतर घरेलू चिकित्सा मैनुअल, सलाह-पुस्तकें और गर्भावस्था-प्रसव से जुड़े लोकप्रिय मार्गदर्शक हैं । ये प्रभावशाली हो सकते थे, लेकिन इन्हें अपने-आप मेडिकल कॉलेजों या डॉक्टरों की औपचारिक ट्रेनिंग की पाठ्यपुस्तक नहीं कहा जा सकता।
जब कोई कहता है कि यह मेडिकल पाठ्यपुस्तकों में लिखा था, तो वह ज्यादा मजबूत दावा कर रहा है: किसी खास लेखक की, किसी खास संस्करण वाली, किसी खास पेज पर छपी किताब। उपलब्ध स्रोत उस स्तर का प्रमाण नहीं देते।
एक भरोसेमंद प्रमाण में कम से कम ये बातें होनी चाहिए:
इनके बिना दावा रोचक हो सकता है, लेकिन सिद्ध नहीं माना जा सकता।
इतिहास की आलोचना करनी हो, तो बिना अप्रमाणित वाक्य जोड़े इसे इस तरह कहना बेहतर है:
19वीं सदी में लोकप्रिय घरेलू चिकित्सा मैनुअल और मेडिकल सलाह-पुस्तकें खूब पढ़ी जाती थीं; साथ ही, चिकित्सा में महिलाओं के स्वास्थ्य की व्याख्या अक्सर गर्भाशय और प्रजनन के आसपास की जाती थी
। लेकिन यह साबित करने वाला सत्यापनीय प्राथमिक स्रोत यहाँ उपलब्ध नहीं है कि किसी मेडिकल पाठ्यपुस्तक ने पढ़ाया कि पढ़ाई से गर्भाशय सिकुड़ता है।
इसलिए सबसे साफ जवाब है: इसे प्रमाणित मेडिकल-पाठ्यपुस्तक उद्धरण मानना ठीक नहीं होगा। बड़ा ऐतिहासिक संदर्भ—प्रजनन-केंद्रित महिला-स्वास्थ्य की सोच और लोकप्रिय चिकित्सा सलाह—स्रोतों से दिखता है। पर पढ़ाई से गर्भाशय सिकुड़ता है वाला सटीक दावा लेखक, किताब, संस्करण और पेज के बिना अभी अप्रमाणित है।
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