इस तरह का तरीका इसलिए अहम है क्योंकि घर में बच्चा जिस भाषा-परिवेश में जीता है, वह अक्सर क्लिनिक, स्कूल या प्रश्नावली से पूरी तरह पकड़ में नहीं आता। यह बात शोध की विधि से निकलने वाला सावधान निष्कर्ष है, क्योंकि अध्ययन ने वास्तविक घरेलू रिकॉर्डिंग पर भरोसा किया।
उपलब्ध सार के अनुसार, कॉक्लियर इम्प्लांट वाले बच्चे और सामान्य सुनने वाले बच्चे देखभालकर्ताओं के साथ बोले गए भाषा-संपर्क और सहभागिता की मात्रा में मिलते-जुलते दिखे। यानी केवल “भाषा की मात्रा” के स्तर पर दोनों समूहों में बड़ा अंतर स्पष्ट नहीं दिखा।
लेकिन इसी के साथ एक महत्वपूर्ण अंतर भी सामने आता है: कॉक्लियर इम्प्लांट वाले बच्चों के लिए घर का भाषा-परिवेश उनके developmental stages को उतनी नज़दीकी से प्रतिबिंबित नहीं करता था, और उनके speech outcomes की भविष्यवाणी भी उतनी मजबूत नहीं करता था।
इसका अर्थ यह हो सकता है कि सुनने में कठिनाई वाले बच्चों के लिए केवल भाषा सुनना पर्याप्त संकेतक नहीं है; बच्चे की सुनने की पृष्ठभूमि, उपकरणों का उपयोग, प्रतिक्रिया की गुणवत्ता और भाषा-विकास की व्यक्तिगत गति जैसी बातें भी मायने रख सकती हैं। हालांकि इस हिस्से को सावधानी से पढ़ना चाहिए, क्योंकि उपलब्ध स्रोतों से सभी सांख्यिकीय विवरण, प्रभाव-आकार या मॉडल पूरी तरह सामने नहीं आते।
संबंधित शोध भी इसी दिशा में इशारा करता है कि सुनने में कठिनाई वाले बच्चों के लिए घर का भाषा-परिवेश एक गंभीर अध्ययन-विषय है। एक व्यवस्थित समीक्षा ने 2006 से 2016 के बीच के शोधों को देखकर यह पूछा कि सुनने में कठिनाई वाले और बिना सुनने की कठिनाई वाले बच्चों को मिलने वाले भाषा-इनपुट की मात्रा में क्या अंतर है, और यह इनपुट receptive यानी समझने वाली भाषा और expressive यानी बोलकर व्यक्त करने वाली भाषा के परिणामों से कैसे जुड़ता है। उस समीक्षा में डुप्लिकेट हटाने के बाद 1,545 अध्ययन-परिणामों में से 27 को full-text review के लिए चुना गया और अंत में 8 अध्ययन शामिल किए गए।
एक अन्य संबंधित अध्ययन ने 48 महीने की उम्र के बच्चों में parental language input यानी अभिभावकीय भाषा-इनपुट की शैली को देखा। इसमें सामान्य सुनने वाले बच्चों, hearing aids यानी श्रवण-यंत्र इस्तेमाल करने वाले बच्चों, और cochlear implants यानी कॉक्लियर इम्प्लांट इस्तेमाल करने वाले बच्चों के समूह शामिल थे। जिन parental language behaviors को देखा गया, उनमें सवाल पूछना, निर्देश देना, मौखिक प्रतिक्रिया देना और बच्चे से सीधे की गई बातचीत की मात्रा शामिल थी।
हाल के वर्षों में early audiological intervention और hearing technologies ने सुनने में कठिनाई वाले बच्चों को बोली जाने वाली भाषा तक बेहतर पहुँच दी है। फिर भी, कई बच्चों को अपने सामान्य सुनने वाले साथियों के भाषा-विकास के स्तर तक पहुँचने के लिए अतिरिक्त समर्थन की ज़रूरत पड़ सकती है।
यही कारण है कि परिवार-केंद्रित और प्राकृतिक वातावरण में होने वाले intervention कार्यक्रमों पर ध्यान दिया जाता है। स्रोत में It Takes Two to Talk®, Hanen Program® और Talking Matters जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख है, जो माता-पिता को बच्चों की भाषा-विकास में मदद करने के लिए प्राकृतिक वातावरण में बातचीत को बेहतर बनाने पर केंद्रित हैं।
पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि:
सावधानी के साथ समझना चाहिए कि:
अगर इस शोध-पत्र को कक्षा, सेमिनार या साहित्य-समीक्षा में प्रस्तुत करना हो, तो इसे तीन बिंदुओं में व्यवस्थित किया जा सकता है:
इस शोध का महत्व इस बात में है कि यह बच्चे के भाषा-विकास को घर की रोज़मर्रा की बातचीत के भीतर रखकर देखता है। अध्ययन बताता है कि कॉक्लियर इम्प्लांट वाले और सामान्य सुनने वाले बच्चे देखभालकर्ताओं के साथ बोले गए भाषा-संपर्क की मात्रा में समान हो सकते हैं, लेकिन कॉक्लियर इम्प्लांट वाले बच्चों के लिए घर का भाषा-परिवेश विकास-स्तर और speech outcomes को उतनी मजबूती से नहीं समझा पाता।
इसलिए मुख्य संदेश यह है: भाषा-विकास को समझने के लिए सिर्फ़ उपकरण, परीक्षण-स्कोर या शब्दों की गिनती नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की बातचीत की गुणवत्ता, प्रतिक्रिया और बच्चे की सहभागिता को भी गंभीरता से देखना होगा।
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