ताइवान के विदेश मंत्रालय ने इसके जवाब में कहा कि ताइवान को दुनिया के देशों से संबंध बनाने और अपने स्तर पर संवाद तय करने का अधिकार है, और वह किसी भी देश द्वारा किसी भी कारण से हस्तक्षेप या दबाव स्वीकार नहीं करेगा। मंत्रालय ने यह भी कहा कि ताइवान के राष्ट्रपति का विदेश दौरा अंतरराष्ट्रीय परंपरा के अनुरूप है और सामान्य बात है।
यहीं दोनों पक्षों का मूल मतभेद दिखता है। ताइवान इसे सामान्य कूटनीतिक संपर्क मानता है, जबकि बीजिंग इसे अपने ‘एक चीन’ ढांचे के भीतर देखता है और ऐसी यात्राओं को ताइवान की अलग अंतरराष्ट्रीय पहचान के संकेत के रूप में लेता है।
यह विवाद सामान्य बयानबाजी से आगे इसलिए गया क्योंकि रुकावट यात्रा के प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित नहीं रही; वह राष्ट्रपति विमान की उड़ान अनुमति तक पहुंच गई। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने 24 अप्रैल को कहा कि अमेरिकी प्रशासन और कांग्रेस ने लाई चिंग-ते की प्रस्तावित इस्वातिनी यात्रा में आए अवरोध पर चिंता जताई और चीन से ताइवान पर दबाव रोकने को कहा।
यहां फ़्लाइट इन्फ़ॉर्मेशन रीजन यानी FIR महत्वपूर्ण है। ताइवान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि संबंधित देश चीन के निर्देश पर काम कर रहे थे और ताइवान के अधिकारियों की नियमित यात्रा की सुरक्षा और गरिमा में हस्तक्षेप कर रहे थे। अमेरिकी पक्ष ने यह भी कहा कि कोई देश अपने जिम्मे के FIR में अंतरराष्ट्रीय वायुक्षेत्र का प्रबंधन करता है, जिसका दायरा उसके अपने भूभाग के ऊपर के संप्रभु वायुक्षेत्र से कहीं बड़ा हो सकता है; इस जिम्मेदारी का उद्देश्य विमानन सुरक्षा है, बीजिंग का राजनीतिक औजार बनना नहीं।
दूसरे शब्दों में, अमेरिका की चिंता सिर्फ यह नहीं थी कि ताइवान का राष्ट्रपति यात्रा कर पाएगा या नहीं। मुद्दा यह भी था कि क्या अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन व्यवस्था और उड़ान-सुरक्षा से जुड़े प्रबंधन को तीसरे पक्ष के राजनीतिक दबाव का साधन बनाया जा सकता है। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी पक्ष के हवाले से कहा कि यह बीजिंग द्वारा ताइवान और उसके वैश्विक समर्थकों को डराने-धमकाने का एक और उदाहरण है और इसमें अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन प्रणाली के दुरुपयोग का सवाल शामिल है।
अमेरिका का पहला तर्क यह था कि यह दौरा कोई असाधारण कदम नहीं, बल्कि नियमित यात्रा है। अमेरिकी विदेश विभाग ने केंद्रीय समाचार एजेंसी को दिए जवाब में कहा कि ताइवान का राष्ट्रपति इस्वातिनी जा रहा है, यह नियमित यात्रा है और इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि ताइवान अमेरिका और कई अन्य देशों का भरोसेमंद तथा सक्षम साझेदार है।
अमेरिका ने यह भी याद दिलाया कि लोकतांत्रिक रूप से चुने गए ताइवान के हर राष्ट्रपति ने ताइवान के राजनयिक साझेदार देशों का विदेश दौरा किया है। अमेरिकी पक्ष के अनुसार, लाई चिंग-ते की पूर्ववर्ती राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने भी 2018 और 2023 में इस्वातिनी का दौरा किया था, इसलिए ऐसी यात्राओं को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
दूसरा कारण दबाव और प्रतिरोध का व्यापक ढांचा है। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी पक्ष के हवाले से कहा कि अमेरिका ने बीजिंग से ताइवान पर सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक दबाव रोकने तथा मतभेदों को सार्थक संवाद से हल करने का आग्रह किया।
इस्वातिनी ताइवान का अफ्रीकी राजनयिक साझेदार है। इसी वजह से यह यात्रा ताइवान के लिए केवल द्विपक्षीय सहयोग का कार्यक्रम नहीं, बल्कि औपचारिक कूटनीतिक संबंधों को जारी रखने का मंच भी है। राष्ट्रपति कार्यालय ने इस दौरे को ताइवान-इस्वातिनी संबंधों को मजबूत करने वाली राजकीय यात्रा बताया और सुरक्षा, अर्थव्यवस्था तथा डिजिटल सहयोग को मुख्य आधार बनाया।
ताइवान के लिए यह बाहरी संबंधों का सामान्य विस्तार है। चीन के लिए ऐसी गतिविधि ‘एक चीन’ की बहस में आती है। अमेरिका के लिए यह जांचने का मामला बन गया कि क्या चीन तीसरे देशों और उड़ान-प्रबंधन तंत्र के जरिए ताइवान पर दबाव डाल रहा है।
कुल मिलाकर, लाई चिंग-ते की इस्वातिनी यात्रा चीन-अमेरिका खींचतान का केंद्र इसलिए बनी क्योंकि इसमें ताइवान की राष्ट्राध्यक्ष-स्तर की कूटनीति, चीन का ‘एक चीन’ आग्रह और अमेरिका की नागरिक उड्डयन नियमों के राजनीतिक इस्तेमाल पर चिंता—तीनों एक साथ आ गए। यात्रा द्विपक्षीय थी, लेकिन उड़ान अनुमति विवाद और अमेरिकी प्रतिक्रिया ने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों और ताइवान की कूटनीतिक जगह की बड़ी बहस में बदल दिया।
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