अध्ययन में जिन छह बुनियादी भाषा संकेतकों का विश्लेषण किया गया, वे थे: औसत बारी में शब्द-संख्या, औसत कथन-लंबाई, कुल शब्द-संख्या, अलग-अलग शब्दों की संख्या, समायोजित अलग शब्दों की उपस्थिति-दर और शब्दावली विविधता।
इन्हें सरल रूप में तीन कोणों से समझा जा सकता है:
| देखने का पहलू | संबंधित संकेतक | आसान अर्थ |
|---|---|---|
| भाषा उत्पादन की मात्रा | औसत बारी में शब्द-संख्या, कुल शब्द-संख्या | बच्चा कहानी में कुल कितना बोल रहा है |
| कथन या वाक्यांश की लंबाई | औसत कथन-लंबाई | बच्चा औसतन कितने लंबे कथन बना रहा है |
| शब्दावली में बदलाव | अलग-अलग शब्दों की संख्या, समायोजित अलग शब्दों की उपस्थिति-दर, शब्दावली विविधता | बच्चा कितने तरह के शब्द इस्तेमाल कर रहा है और शब्दों में कितनी विविधता है |
इन संकेतकों की उपयोगिता यह है कि चित्र देखकर कहानी सुनाने जैसी दिखने में सहज गतिविधि को तुलनीय भाषा-डेटा में बदला जा सकता है। यानी शोधकर्ता अलग-अलग समय-बिंदुओं पर बच्चे की भाषा को अधिक व्यवस्थित ढंग से देख सकते हैं।
अध्ययन के अनुसार, बच्चों की कहानी-कथन भाषा के छह संकेतकों में अधिकतर ने उम्र के साथ बढ़ने की प्रवृत्ति दिखाई। इसका अर्थ है कि 3 से 5 साल के बीच, बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तक पर कहानी सुनाते समय बच्चों की भाषा उत्पादन मात्रा, कथन-लंबाई और शब्दावली उपयोग में कुल मिलाकर परिपक्वता आती है।
लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। औसत कथन-लंबाई, समायोजित अलग शब्दों की उपस्थिति-दर और शब्दावली विविधता में कुछ उम्र-चरणों पर नीचे की ओर समायोजन भी दिखा। इसलिए बेहतर निष्कर्ष यह है कि अधिकतर भाषा संकेतक उम्र के साथ बढ़ते हैं, पर अलग-अलग संकेतकों में बीच-बीच में उतार-चढ़ाव आ सकता है।
अध्ययन ने यह भी पाया कि उम्र के प्रभाव को नियंत्रित करने के बाद औसत कथन-लंबाई, कुल शब्द-संख्या, अलग-अलग शब्दों की संख्या और शब्दावली विविधता के बीच महत्वपूर्ण सकारात्मक संबंध था। यानी इस नमूने में लंबी कथन-रचना, अधिक कुल शब्द, अधिक अलग शब्द और अधिक शब्दावली विविधता आपस में जुड़ी हुई दिखीं।
इस अध्ययन में बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तकें बच्चों से कहानी कहलवाने की सामग्री थीं। उनका फायदा यह है कि बच्चा छपे हुए वाक्य पढ़ नहीं रहा होता; वह चित्रों के संकेतों को देखकर अपनी भाषा में कहानी बना रहा होता है।
अन्य शोध भी इस नजरिए को मजबूत करते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि बच्चे बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तकों में रंग, रेखा, आकार और शरीर की मुद्राओं जैसे दृश्य तत्वों को देखते हैं और कहानी की दिशा के आधार पर उनके अलग-अलग अर्थ बना सकते हैं।
तीन से छह साल के बच्चों की कहानी-कथन भाषा पर एक अन्य अध्ययन ने भी बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तकों से भाषा नमूने जुटाए। उसमें बच्चों के शब्द-भेद, अधिक इस्तेमाल होने वाले शब्द और नए शब्दों का विश्लेषण किया गया। निष्कर्षों में दिखा कि संख्या-सूचक शब्दों और सहायक शब्दों को छोड़कर अधिकतर शब्द-भेद उम्र के साथ बढ़े, और संज्ञा, क्रिया तथा क्रिया-विशेषण में सबसे अधिक बढ़ोतरी दिखी।
इन निष्कर्षों को साथ पढ़ने पर बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तकें बच्चों की कहानी-भाषा, शब्दावली और चित्र-समझ को देखने का उपयोगी शोध माध्यम लगती हैं।
बच्चों की भाषा-विकास यात्रा को सिर्फ शब्दों की संख्या या वाक्य की लंबाई से नहीं समझा जा सकता। बाल भाषा-विकास से जुड़े स्रोत बताते हैं कि भाषा को समझते समय “रूप”, “अर्थ-सामग्री” और “उपयोग” जैसे पहलुओं को व्यापक रूप से देखना चाहिए; इसमें संवाद/प्रयोग, ध्वनि/ध्वन्यात्मकता, अर्थ/रूप-रचना, व्याकरण और कथन-क्षमता जैसे क्षेत्र शामिल होते हैं।
इसलिए इस अध्ययन के छह संकेतकों को बच्चों की कथात्मक भाषा की एक मापनीय खिड़की की तरह समझना चाहिए। वे यह दिखाते हैं कि बच्चा कितना बोलता है, कथन कितने लंबे हैं और शब्दावली कितनी विविध है; लेकिन वे बच्चे की पूरी भाषा क्षमता का अकेला पैमाना नहीं हैं।
इस अध्ययन से एक व्यावहारिक सीख मिलती है: बच्चे की कहानी सुनते समय केवल “लंबी कहानी” पर ध्यान न दें। यह भी देखें कि क्या वह अलग-अलग शब्द इस्तेमाल कर रहा है, क्या कथन जुड़े हुए हैं, और क्या वह चित्रों के आधार पर कथा बना पा रहा है।
लेकिन इसे निदान या नियम-पुस्तिका की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। 28 बच्चों का नमूना सभी बच्चों के लिए तय विकास-रेखा नहीं बना सकता।
इसी तरह, नतीजों को यह कहकर सरल नहीं किया जा सकता कि “सभी छह संकेतक लगातार बढ़ते हैं।” अध्ययन ने साफ दिखाया कि कुछ संकेतकों में कुछ चरणों पर गिरावट या समायोजन भी हुआ।
सबसे जरूरी बात: यह अध्ययन शिक्षण-हस्तक्षेप प्रयोग नहीं था। इसलिए इससे यह दावा नहीं किया जा सकता कि बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तकें अपने-आप बच्चों की भाषा क्षमता बढ़ा देती हैं। अध्ययन ने उम्र के साथ विकास और संकेतकों के संबंध को देखा था, कारण-प्रभाव को साबित नहीं किया।
3 से 5 साल के बच्चे जब बिना शब्दों वाली चित्र-पुस्तक देखकर कहानी सुनाते हैं, तो उनकी भाषा में अधिकतर बुनियादी संकेतकों पर विकास दिखता है। फिर भी यह विकास हर संकेतक में समान, सीधा और लगातार नहीं होता। बच्चों की कथात्मक भाषा में मात्रा, कथन-लंबाई और शब्दावली विविधता जैसे कई पहलू साथ-साथ काम करते हैं—और ये हमेशा एक ही गति से आगे नहीं बढ़ते।