यह अध्ययन 2018 में Psychological Science में प्रकाशित हुआ। इसमें सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में विविधता रखने वाले 4 से 6 वर्ष के 36 बच्चों को शामिल किया गया । शोधकर्ताओं ने बच्चों के रोज़मर्रा के भाषा-परिवेश को समझने के लिए घर की ऑडियो रिकॉर्डिंग का उपयोग किया और कहानी सुनते समय fMRI के ज़रिए भाषा-संबंधित मस्तिष्क सक्रियता देखी
।
fMRI यानी functional magnetic resonance imaging—ऐसी तकनीक जिससे किसी कार्य के दौरान मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों की सक्रियता का अनुमान लगाया जाता है। यहाँ कार्य था: कहानी सुनना।
अध्ययन की अहम बात यह थी कि शोधकर्ताओं ने केवल वयस्कों की बोलने की मात्रा या बच्चों की बोलने की मात्रा नहीं देखी। उन्होंने वयस्क और बच्चे के बीच होने वाली “बातचीत की बारी” भी मापी। विश्लेषण में परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, IQ, और वयस्क तथा बच्चे की अलग-अलग बोलने की मात्रा को नियंत्रित किया गया ।
यानी सवाल यह था: शब्दों की कुल मात्रा से अलग, क्या वयस्क–बच्चे की जवाबी बातचीत अपने-आप में कोई संकेत देती है?
अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों ने वयस्कों के साथ अधिक बारी-बारी संवाद का अनुभव किया था, उनमें कहानी सुनते समय बाएँ निचले ललाट क्षेत्र—Broca’s area—की सक्रियता अधिक थी। यह संबंध सामाजिक-आर्थिक स्थिति, IQ और वयस्क/बच्चे की अलग-अलग बोलने की मात्रा को नियंत्रित करने के बाद भी बना रहा ।
शोध-सार के अनुसार, Broca’s area की सक्रियता ने बच्चों के भाषा-संपर्क और मौखिक कौशल के बीच संबंध को महत्वपूर्ण रूप से समझाया; लेखकों ने इसे बच्चों के भाषा-परिवेश और न्यूरोलिंग्विस्टिक प्रोसेसिंग के बीच सीधे संबंध का प्रमाण बताया ।
सरल शब्दों में: यह अध्ययन सिर्फ़ यह नहीं देख रहा था कि बच्चा अच्छा बोलता है या नहीं। उसने घर की रोज़मर्रा बातचीत, बच्चों की मौखिक क्षमता और भाषा से जुड़ी मस्तिष्क सक्रियता को एक साथ रखकर देखा।
यह अध्ययन शब्दों की मात्रा को खारिज नहीं करता। शुरुआती भाषा-संपर्क का संबंध आगे की भाषा-क्षमता, संज्ञानात्मक कौशल और पढ़ाई से बताया गया है । लेकिन यह ध्यान दिलाता है कि भाषा-परिवेश में केवल वयस्कों की ओर से शब्दों की बरसात ही मायने नहीं रखती; बच्चे को जवाब देने, सवाल करने और अपनी बात आगे बढ़ाने का अवसर भी मायने रख सकता है
।
“बच्चे से बात कीजिए” एक अच्छी सलाह है, लेकिन यह बहुत सामान्य है। इस अध्ययन की उपयोगी बात यह है कि उसने बातचीत के “आना-जाना” को मापने योग्य पहलू के रूप में देखा—घर की ऑडियो रिकॉर्डिंग, मौखिक कौशल और fMRI संकेतों के साथ ।
इससे सलाह कुछ अधिक स्पष्ट होती है: केवल बच्चे के सामने बोलना काफी नहीं; बच्चे की बात सुनना, उसकी प्रतिक्रिया पर अगला सवाल बनाना और उसकी बात को विस्तार देना भी ज़रूरी है।
“तीन करोड़ शब्दों का अंतर” वाली चर्चा अक्सर परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और भाषा-संपर्क के अंतर को साथ रखकर देखती है । इस अध्ययन में, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और IQ को नियंत्रित करने के बाद भी वयस्क–बच्चे की बातचीत-बारी भाषा-संबंधित मस्तिष्क सक्रियता से जुड़ी रही
।
इसका मतलब यह नहीं कि केवल बातचीत की एक रणनीति सभी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को खत्म कर देगी। अध्ययन संबंध दिखाता है, संपूर्ण कारणात्मक समाधान नहीं । लेकिन यह ज़रूर याद दिलाता है कि रोज़मर्रा के छोटे संवाद भी भाषा-परिवेश की गुणवत्ता का हिस्सा हैं।
नीचे दिए गए सुझाव इस अध्ययन में उभरे “बातचीत की बारी” के विचार से निकले व्यावहारिक संकेत हैं। इन्हें इस विशेष अध्ययन में हस्तक्षेप के रूप में परखा नहीं गया था ।
इन तरीकों का साझा भाव यह है कि बच्चा केवल श्रोता न रहे। वह बातचीत का दूसरा पक्ष बने—सुनने वाला भी, बोलने वाला भी, सोचने वाला भी।
पहली सीमा यह है कि यह संबंधात्मक अध्ययन है। शोध में adult–child conversational turns और भाषा-संबंधित मस्तिष्क सक्रियता के बीच संबंध पाया गया; इससे यह सीधे साबित नहीं होता कि बातचीत-बारी बढ़ाने से Broca’s area की सक्रियता अनिवार्य रूप से बढ़ जाएगी ।
दूसरी सीमा नमूने की है। अध्ययन में 4 से 6 वर्ष के 36 बच्चे शामिल थे, इसलिए इसके निष्कर्षों को हर उम्र, हर परिवार या हर सांस्कृतिक संदर्भ पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता ।
तीसरी बात: शब्दों की संख्या अब भी महत्व रखती है। शुरुआती भाषा-संपर्क का संबंध आगे की भाषा-क्षमता, संज्ञानात्मक क्षमताओं और शैक्षणिक प्रदर्शन से बताया गया है । इस अध्ययन का संदेश यह नहीं कि शब्द गिनना बेकार है; संदेश यह है कि शब्दों के साथ-साथ संवाद की बारी भी देखनी चाहिए।
“Beyond the 30-Million-Word Gap” का बड़ा योगदान यही है कि उसने भाषा-विकास की चर्चा को केवल शब्दों की मात्रा से आगे बढ़ाया। अध्ययन बताता है कि वयस्क और बच्चे के बीच बारी-बारी बातचीत, बच्चों की मौखिक क्षमता और भाषा-संबंधित मस्तिष्क सक्रियता से जुड़ी है ।
माता-पिता और शुरुआती शिक्षा से जुड़े वयस्कों के लिए व्यावहारिक सीख साफ़ है: बच्चे से ज़्यादा बोलना अच्छा है, लेकिन बच्चे को बोलने, जवाब देने, पूछने और अपनी सोच आगे बढ़ाने की जगह देना भी उतना ही ज़रूरी है। भाषा-विकास में सिर्फ़ शब्द नहीं, संवाद भी गिनिए।
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