मलय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित सिंगापुर, हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के बीच समुद्री आवाजाही के लिए अहम जगह पर था। [10] ब्रिटेन इस चौकी से पूर्व की ओर अपने व्यापारिक रास्ते मजबूत करना और क्षेत्र में बढ़ते डच प्रभाव को चुनौती देना चाहता था। [8][5] 6 फ़रवरी 1819 के समझौते ने ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक...
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शोध उत्तर

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1819 में सिंगापुर चुनने के पीछे भूगोल और साम्राज्यवादी व्यापार—दोनों की अहम भूमिका थी। मलय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर बसा यह द्वीप हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के बीच आने-जाने वाले जहाज़ों के रास्ते के पास था। ब्रिटेन यहां अपनी व्यापारिक मौजूदगी मजबूत करना चाहता था और क्षेत्र में बढ़ते डच प्रभाव को रोकने की कोशिश कर रहा था। 10
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सिंगापुर के आसपास के जलमार्ग लंबे समय से समुद्री आवाजाही और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण माने जाते थे। यहां चौकी बनाने से ब्रिटेन को भारत और चीन के व्यापारिक मार्ग पर अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल सकता था। 10
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रैफल्स का उद्देश्य मलक्का के दक्षिण में एक नया ब्रिटिश ठिकाना स्थापित करना था, ताकि पूर्व की ओर जाने वाले ब्रिटिश व्यापारिक रास्तों की रक्षा हो सके। इस चौकी से क्षेत्र में डच प्रभाव को चुनौती देने की भी उम्मीद थी। 8
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सिंगापुर में चौकी स्थापित करने की योजना को सभी का समर्थन नहीं मिला। डच हितों के अलावा, ब्रिटिश अधिकारियों में भी कुछ लोग इसके विरोध में थे। उस समय ब्रिटेन में डचों के साथ संबंध सुधारने की सोच को भी तवज्जो दी जा रही थी। रैफल्स ने अपने वरिष्ठों के सामने तर्क दिया कि इस ठिकाने से भारत और चीन के साथ व्यापार में ब्रिटेन की स्थिति कायम रखने में मदद मिलेगी। 9
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द्वीप केवल चुनी हुई जगह नहीं था—वह जोहोर साम्राज्य का हिस्सा था और वहां पहले से लोग रहते थे। 6 फ़रवरी 1819 को रैफल्स, सुल्तान हुसैन शाह और तेमेङ्गगोंग अब्दुर रहमान ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी—ब्रिटेन की व्यापारिक कंपनी—को सिंगापुर में व्यापारिक चौकी स्थापित करने का अधिकार मिला। 7
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यह समझौता स्थानीय शासकों के साथ बातचीत के ज़रिए ब्रिटिश मौजूदगी स्थापित करने की राह बना। जनवरी 1819 में रैफल्स के दल के पहुंचने के समय द्वीप पर करीब 1,000 चीनी, मलय और ओरंग लाउट (समुद्री समुदाय) लोग रहते थे। 2
सिंगापुर की स्थापना का श्रेय अक्सर मुख्य रूप से रैफल्स को दिया जाता है, लेकिन विलियम फ़ार्कुहार की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। उन्होंने मलक्का जलडमरूमध्य के दक्षिण में नया ठिकाना बनाने की वकालत की और रैफल्स के आने से पहले क्षेत्रीय शासकों से बातचीत में योगदान दिया। समझौते के बाद फ़ार्कुहार सिंगापुर में रेज़िडेंट के तौर पर रहे, जबकि रैफल्स वहां से चले गए। 4
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ब्रिटेन ने सिंगापुर को इसलिए चुना क्योंकि उसका स्थान प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों के पास था और वहां चौकी बनाने से भारत तथा चीन के साथ व्यापार में ब्रिटेन की पकड़ मजबूत हो सकती थी। यह फैसला डच प्रभाव को चुनौती देने की कोशिश का भी हिस्सा था। लेकिन ब्रिटिश चौकी की स्थापना स्थानीय शासकों के साथ समझौते से संभव हुई—और इस कहानी में फ़ार्कुहार का योगदान तथा द्वीप का पहले से मौजूद समुदाय भी उतना ही जरूरी संदर्भ है। 10
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मलय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित सिंगापुर, हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के बीच समुद्री आवाजाही के लिए अहम जगह पर था। [10]
मलय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित सिंगापुर, हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के बीच समुद्री आवाजाही के लिए अहम जगह पर था। [10] ब्रिटेन इस चौकी से पूर्व की ओर अपने व्यापारिक रास्ते मजबूत करना और क्षेत्र में बढ़ते डच प्रभाव को चुनौती देना चाहता था। [8][5]
6 फ़रवरी 1819 के समझौते ने ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक चौकी स्थापित करने का अधिकार दिया; विलियम फ़ार्कुहार और द्वीप के पहले से बसे समुदाय को भी इस इतिहास में जगह मिलनी चाहिए। [7][1][2]