ये प्रतिबंध तथाकथित 'अप्रत्यक्ष निर्यात' को भी रोकने का प्रयास करते हैं, जिसमें कंपनियाँ तीसरे देशों के माध्यम से प्रतिबंधित तकनीक को चीन भेजती थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल चीन की डेटा सेंटर क्षमता और AI मॉडल प्रशिक्षण पर बल्कि वैश्विक चिप निर्माताओं की राजस्व धारा पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
चीन ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अपने 'सेमीकंडक्टर फंड' को मजबूत किया है, जिसकी मदद से वह अपनी घरेलू चिप निर्माण क्षमता को बढ़ाकर आत्मनिर्भर बनना चाहता है। इसके अलावा, चीन ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शिकायत दर्ज कराई है और यूरेनियम जैसे प्रमुख खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण कस दिया है।
इस वैश्विक तकनीकी युद्ध में भारत के लिए एक अनोखी चुनौती और अवसर दोनों हैं। भारत अमेरिका के साथ घनिष्ठ रक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी ('iCET' पहल) में है, लेकिन साथ ही चीन के साथ उसके आर्थिक संबंध भी गहरे हैं। एक विश्लेषक के अनुसार, "भारत को कूटनीतिक चालाकी से खेलना होगा ताकि वह अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन भी कर सके और चीनी बाजार तक पहुँच भी बनाए रखे।"
यह युद्ध केवल सेमीकंडक्टर तक सीमित नहीं है; यह AI, 5G, क्वांटम कंप्यूटिंग और जैव प्रौद्योगिकी तक फैल गया है। लंबे समय में, यह प्रतिस्पर्धा दो अलग-अलग तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्रों के निर्माण का कारण बन सकती है - एक अमेरिकी नेतृत्व में और दूसरा चीनी नेतृत्व में। ऐसे में, भारत को अपने स्वयं के मजबूत तकनीकी और विनिर्माण आधार को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।