कानूनी चुनौती भी उभर रही है। अप्रैल 2026 में, हांग्जो इंटरमीडिएट पीपुल्स कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि कंपनियाँ सिर्फ इसलिए कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकाल सकतीं क्योंकि उनका काम AI कर सकता है, जो एक राष्ट्रीय मिसाल बन गया । बीजिंग की एक अदालत ने भी इसी तरह का फैसला देते हुए AI की जगह लेने को चीन के श्रम अनुबंध कानून के तहत बर्खास्तगी का अवैध कारण माना
। दोनों फैसलों ने स्पष्ट किया कि व्यवसाय सामान्य तकनीकी उन्नयन के जोखिमों को कर्मचारियों पर नहीं डाल सकते
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2026 की पहली छमाही में AI से संबंधित टेक लेऑफ में भारत दूसरे स्थान पर रहा, जिसकी वैश्विक छंटनी में 7.16% हिस्सेदारी थी । अनुमान है कि 2026 में भारत के टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में 35,000 नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं, क्योंकि कंपनियाँ उत्पादकता सुधार और AI-संचालित ऑटोमेशन को प्राथमिकता दे रही हैं
। Oracle, Amazon, Meta और Flipkart जैसी कंपनियों ने भारत में ऐसी छंटनी की है जहाँ AI ऑटोमेशन को एक कारण बताया गया
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भारत के अंदर, शिक्षा क्षेत्र में AI के कारण सबसे अधिक 21.67% छंटनी हुई, उसके बाद वित्त क्षेत्र में 14.73% । टीसीएस, इन्फोसिस और Oracle जैसी कंपनियों में पारंपरिक IT भूमिकाएँ सिकुड़ रही हैं
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केंद्रीय विरोधाभास यह है कि जो ट्रेंड नौकरियाँ खत्म कर रहा है, वही AI प्रतिभा के लिए एक जबरदस्त जंग भी छेड़ रहा है।
संक्षेप में: चीन और भारत दोनों एक संरचनात्मक विभाजन का अनुभव कर रहे हैं — रूटीन टेक भूमिकाओं को AI द्वारा चुपचाप खत्म किया जा रहा है, जबकि विशेष AI इंजीनियरिंग और अनुसंधान पदों में उछाल है। चीन का दृष्टिकोण सरकार द्वारा संचालित नौकरी-सुरक्षा नीतियों और हाल के अदालती फैसलों से नियंत्रित होता है जो खुले तौर पर AI के लिए कर्मचारी को बदलने को अवैध बनाते हैं, जबकि भारत में कटौतियाँ अधिक बाजार-संचालित और कम विनियमित हैं, जो इसके बड़े IT सेवा आउटसोर्सिंग क्षेत्र को विशेष रूप से कठोर रूप से प्रभावित कर रही हैं। सामान्य विरोधाभासी परिणाम: एक तरफ रिकॉर्ड छंटनी, और दूसरी तरफ AI कौशल के लिए अभूतपूर्व भर्ती होड़।