AI के कारण 'साइलेंट लेऑफ' (चुपचाप छंटनी) का दौर चीन और भारत दोनों में है, लेकिन एक विरोधाभासी ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है: जहाँ एक तरफ टेक रोजगार सिकुड़ रहा है, वहीं AI विशिष्ट हायरिंग में जबरदस्त बढ़ोतरी हो रही है। दोनों देशों में सबसे बड़ा अंतर यह है: चीन में सरकार नौकरियों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बना रही ह...

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AI-संचालित नौकरी में कटौती और 'साइलेंट लेऑफ' (चुप्पी से की जाने वाली छंटनी) चीन और भारत दोनों के टेक्नोलॉजी वर्कफोर्स को गहरे तरीके से बदल रहे हैं — लेकिन दोनों देशों के नियामक और आर्थिक संदर्भों के कारण यह बदलाव अलग-अलग रूप में सामने आ रहा है। दोनों देशों में एक विरोधाभासी (paradoxical) ट्रेंड उभर रहा है: जहाँ एक तरफ समग्र टेक रोजगार घट रहा है, वहीं AI में विशेष भर्ती में अभूतपूर्व उछाल आ रहा है।
चीनी टेक कंपनियाँ बड़े पैमाने पर छंटनी के बजाय कॉन्ट्रैक्टर्स के अनुबंध न बढ़ाने, ग्रेजुएट हायरिंग फ्रीज करने, एट्रिशन (अपने आप नौकरी छोड़ने) और प्रदर्शन-आधारित कटौती के जरिए अपने कर्मचारियों की संख्या कम कर रही हैं। रॉयटर्स ने इस रणनीति को 'क्वाइट लेऑफ़' (चुप्पी से की गई छंटनी) नाम दिया है, जिसका उद्देश्य सामाजिक अस्थिरता से बचना है । उदाहरण के लिए, अलीबाबा ने AI में भारी निवेश करते हुए धीरे-धीरे कटौती और एट्रिशन के जरिए चुपचाप कर्मचारियों की संख्या घटानी शुरू कर दी है
।
बीजिंग सरकार 2027 तक प्रमुख क्षेत्रों में 70% AI अपनाने का लक्ष्य चाहती है, जिससे कंपनियों पर ऑटोमेशन का दबाव बढ़ रहा है। सिटीबैंक का अनुमान है कि चीन में कुल नौकरियों का 9.6% यानी लगभग 7 करोड़ (70 मिलियन) पद AI के कारण खतरे में हैं । 2026 के मध्य तक चीन में लगभग 78,000 टेक वर्कर्स AI-संचालित छंटनियों से प्रभावित हुए थे
।
कानूनी चुनौती भी उभर रही है। अप्रैल 2026 में, हांग्जो इंटरमीडिएट पीपुल्स कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि कंपनियाँ सिर्फ इसलिए कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकाल सकतीं क्योंकि उनका काम AI कर सकता है, जो एक राष्ट्रीय मिसाल बन गया । बीजिंग की एक अदालत ने भी इसी तरह का फैसला देते हुए AI की जगह लेने को चीन के श्रम अनुबंध कानून के तहत बर्खास्तगी का अवैध कारण माना
। दोनों फैसलों ने स्पष्ट किया कि व्यवसाय सामान्य तकनीकी उन्नयन के जोखिमों को कर्मचारियों पर नहीं डाल सकते
।
2026 की पहली छमाही में AI से संबंधित टेक लेऑफ में भारत दूसरे स्थान पर रहा, जिसकी वैश्विक छंटनी में 7.16% हिस्सेदारी थी । अनुमान है कि 2026 में भारत के टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में 35,000 नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं, क्योंकि कंपनियाँ उत्पादकता सुधार और AI-संचालित ऑटोमेशन को प्राथमिकता दे रही हैं
। Oracle, Amazon, Meta और Flipkart जैसी कंपनियों ने भारत में ऐसी छंटनी की है जहाँ AI ऑटोमेशन को एक कारण बताया गया
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भारत के अंदर, शिक्षा क्षेत्र में AI के कारण सबसे अधिक 21.67% छंटनी हुई, उसके बाद वित्त क्षेत्र में 14.73% । टीसीएस, इन्फोसिस और Oracle जैसी कंपनियों में पारंपरिक IT भूमिकाएँ सिकुड़ रही हैं
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केंद्रीय विरोधाभास यह है कि जो ट्रेंड नौकरियाँ खत्म कर रहा है, वही AI प्रतिभा के लिए एक जबरदस्त जंग भी छेड़ रहा है।
संक्षेप में: चीन और भारत दोनों एक संरचनात्मक विभाजन का अनुभव कर रहे हैं — रूटीन टेक भूमिकाओं को AI द्वारा चुपचाप खत्म किया जा रहा है, जबकि विशेष AI इंजीनियरिंग और अनुसंधान पदों में उछाल है। चीन का दृष्टिकोण सरकार द्वारा संचालित नौकरी-सुरक्षा नीतियों और हाल के अदालती फैसलों से नियंत्रित होता है जो खुले तौर पर AI के लिए कर्मचारी को बदलने को अवैध बनाते हैं, जबकि भारत में कटौतियाँ अधिक बाजार-संचालित और कम विनियमित हैं, जो इसके बड़े IT सेवा आउटसोर्सिंग क्षेत्र को विशेष रूप से कठोर रूप से प्रभावित कर रही हैं। सामान्य विरोधाभासी परिणाम: एक तरफ रिकॉर्ड छंटनी, और दूसरी तरफ AI कौशल के लिए अभूतपूर्व भर्ती होड़।
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AI के कारण 'साइलेंट लेऑफ' (चुपचाप छंटनी) का दौर चीन और भारत दोनों में है, लेकिन एक विरोधाभासी ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है: जहाँ एक तरफ टेक रोजगार सिकुड़ रहा है, वहीं AI विशिष्ट हायरिंग में जबरदस्त बढ़ोतरी हो रही है।
AI के कारण 'साइलेंट लेऑफ' (चुपचाप छंटनी) का दौर चीन और भारत दोनों में है, लेकिन एक विरोधाभासी ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है: जहाँ एक तरफ टेक रोजगार सिकुड़ रहा है, वहीं AI विशिष्ट हायरिंग में जबरदस्त बढ़ोतरी हो रही है। दोनों देशों में सबसे बड़ा अंतर यह है: चीन में सरकार नौकरियों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बना रही है और अदालतों ने AI के कारण नौकरी से निकालने को गैरकानूनी ठहराया है, जबकि भारत में ये छंटनियाँ बाजार की ताकतों से प्रेर...