गुरुवार के एक मूल्य-स्नैपशॉट में अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट करीब 102 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी मानक वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 91 डॉलर प्रति बैरल था। गिरावट का अर्थ यह नहीं था कि अमेरिका–ईरान युद्ध खत्म होने वाला है। बाजार का आकलन अधिक सीमित था: निकट भविष्य में कुछ और तेल खरीदारों तक पहुँच सकता है, जबकि बातचीत से आपूर्ति में बाधा कम होने की संभावना बन सकती है। सऊदी अरब से खेप बढ़ने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से मालवाहक जहाज़ों की आवाजाही जारी रहने की खबरों ने इस धारणा को बल दिया।
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बातचीत की उम्मीद है, समझौता नहीं
संयुक्त राष्ट्र की बैठक के आसपास संभावित कूटनीतिक प्रगति पर निवेशकों की नज़र थी। इसी दौरान सऊदी अरब की तेल खेप में आंशिक सुधार की खबरें भी आईं; दोनों बातों ने तत्काल कमी की आशंका घटाई।
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8 लेकिन बातचीत की उम्मीद को समझौता मान लेना जल्दबाज़ी होगी। होर्मुज़ में एक टैंकर के कथित तौर पर हमले की चपेट में आने की रिपोर्ट भी आई थी। यदि वार्ता विफल होती है या जहाज़ों की आवाजाही फिर बाधित होती है, तो कीमतों का रुख पलट सकता है।
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दूसरे रास्ते मदद कर रहे हैं, पर होर्मुज़ का विकल्प नहीं बने
वैकल्पिक निर्यात मार्गों और होर्मुज़ से फिर शुरू हुई आवाजाही के कारण क्षेत्र से अधिक कच्चा तेल बाहर निकल पा रहा है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, इससे मध्य पूर्व में उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ सकता है। फिर भी उसका अनुमान है कि निर्यात पर पाबंदियाँ 2026 के अंत तक कुछ हद तक बनी रहेंगी और उत्पादन 2027 की दूसरी तिमाही तक युद्ध-पूर्व औसत से नीचे रहेगा।
1 इसलिए सऊदी खेप बढ़ना राहत है, सामान्य व्यापार की बहाली नहीं।
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एशिया तक अधिक तेल पहुँचा—लेकिन कमी बनी रही
कमोडिटी डेटा कंपनी केप्लर के आँकड़ों के हवाले से रॉयटर्स ने बताया कि सितंबर में एशिया का कच्चे तेल का आयात रोज़ाना 2.396 करोड़ बैरल तक पहुँचने की राह पर था, जबकि अगस्त में यह 2.338 करोड़ बैरल था। युद्ध शुरू होने के बाद यह सबसे ऊँचा स्तर था, फिर भी युद्ध-पूर्व स्तर से लगभग 13% कम। यानी आपूर्ति सुधरी है, पूरी तरह सामान्य नहीं हुई।
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आगे कीमतों के लिए निर्णायक सवाल यही है कि खाड़ी से निर्यात कितना नियमित रहता है और सुरक्षित समुद्री रास्ता कितना भरोसेमंद बनता है। सितंबर में जहाज़ों पर हमलों के दौरान तेल की कीमतें तेज़ी से उछली थीं।
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17 जोखिम भरी या लंबी यात्रा से तेल पहुँचाने की लागत पर दबाव बना रह सकता है, भले ही कच्चे तेल की मानक कीमतें गिरें। यदि ऐसी लागत व्यापक महँगाई में बदलती है, तो ब्याज दरों पर फैसले कठिन हो सकते हैं—लेकिन यह एक संभावना है, किसी केंद्रीय बैंक के अगले कदम की भविष्यवाणी नहीं।
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