कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की रणनीति अमेरिका से व्यापारिक रिश्ता तोड़ने की नहीं, बल्कि उसके साथ बातचीत में कनाडा के पास अधिक विकल्प रखने की है। अतिरिक्त अमेरिकी शुल्कों से बचने के लिए चल रही वार्ता से कनाडा 21 अगस्त 2026 को हट गया था। ओटावा ने कहा कि अमेरिका ने आखिरी वक्त पर ऐसी मांगें रखीं जिन्हें वह स्वीकार नहीं कर सकता। कार्नी के मुताबिक, बातचीत तभी फिर शुरू हो सकती है जब वॉशिंगटन गंभीरता से वार्ता करे।
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अमेरिका से दूरी नहीं, निर्भरता घटाने की कोशिश
कार्नी अगले दस वर्षों में अमेरिका के बाहर कनाडा का व्यापार दोगुना करना चाहते हैं। यह भविष्य का लक्ष्य है, न कि व्यापार के रुख में आ चुका बदलाव। दूसरे बाजारों से मजबूत रिश्ते कनाडा को अमेरिकी वार्ता रुकने की स्थिति में अधिक विकल्प दे सकते हैं, हालांकि ऐसे रिश्ते बनाने में समय लगेगा।
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यूरोप इस कोशिश का प्रमुख हिस्सा है। कार्नी ने यूरोपीय संघ (ईयू) का पहला एसोसिएट सदस्य बनने की संभावना का स्वागत किया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि कनाडा पूर्ण ईयू सदस्यता नहीं, बल्कि एक अलग तरह की करीबी साझेदारी चाहता है। इस प्रस्ताव से अभी कनाडा को कोई नया दर्जा नहीं मिला है और उसकी शर्तें भी तय नहीं हुई हैं। कार्नी का कहना है कि यूरोप से नजदीकी कनाडा को अमेरिका का अधिक प्रभावी साझेदार बना सकती है। दूसरी ओर, इस प्रस्ताव पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप के खिलाफ व्यापारिक प्रतिबंधों की धमकी दी है।
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पोटाश और भारत से क्या संकेत मिलते हैं?
पोटाश, जो उर्वरक बनाने में इस्तेमाल होता है, दिखाता है कि कनाडा और अमेरिका का मौजूदा व्यापार एक झटके में अलग नहीं किया जा सकता। ट्रंप ने बेलारूस से सस्ता पोटाश खरीदने की संभावना उठाई, फिर कहा कि अमेरिका कनाडा से भी इसे खरीदता रहेगा। विवाद पर आई रिपोर्ट में उद्धृत अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आंकड़े के अनुसार, अमेरिकी पोटाश आयात में कनाडा की हिस्सेदारी 79% थी। ट्रंप की टिप्पणियों से व्यापारिक दबाव का संकेत मिलता है; इनसे यह साबित नहीं होता कि बेलारूस ने कनाडाई आपूर्ति की जगह ले ली है या कार्नी ने इसके जवाब में अपनी रणनीति बदली है।
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भारत एक संभावित नया बाजार है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान कार्नी ने कहा कि भारत के साथ व्यापार वार्ता में ‘अच्छी प्रगति’ हो रही है और दोनों देश दिसंबर के मध्य में होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन तक बातचीत पूरी करने का लक्ष्य रख रहे हैं। उनके मुताबिक, उनकी समझ यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी समय के आसपास कनाडा आएंगे, लेकिन यात्रा की तारीख तय नहीं हुई थी। इसलिए न समझौता पक्का है, न यात्रा।
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संयुक्त राष्ट्र में कार्नी की सक्रियता व्यापार की इस कोशिश को व्यापक कूटनीति से जोड़ती है: कनाडा नए साझेदार तलाशने के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग की वकालत भी कर रहा है। फिलहाल कसौटी यही है कि ये संपर्क वास्तविक व्यापारिक लाभ में बदलते हैं या नहीं। अमेरिका से वार्ता स्थगित है, ईयू से नया दर्जा प्रस्ताव भर है और भारत से समझौते पर बातचीत जारी है।
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