31 दिसंबर 1600 को मिले शाही चार्टर के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने एशिया के व्यापार में अंग्रेजी एकाधिकार से शुरुआत की। [3] प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के बाद कंपनी व्यापारिक संस्था से राजस्व वसूलने वाली सैन्य राजनीतिक शक्ति बन गई। [8] 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिलने पर भारतीय राजस्व ने कंपनी की फौज और...
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शोध उत्तर

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लंदन के किसी शेयरधारक के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी लाभांश थी। बंगाल के किसान के लिए वह लगान की मांग थी। सिपाही के लिए वह नियोक्ता और वेतनदाता थी। यह एक ऐसी व्यापारिक कंपनी थी जिसने धीरे-धीरे सेनाएं, अदालतें और कर-वसूली का अधिकार हासिल कर लिया—और करोड़ों लोगों के जीवन पर असाधारण असर डाला। इसकी कहानी आज भी एक असहज सवाल छोड़ती है: जब मुनाफा कमाने वाली संस्था को शासन की ताकत मिल जाए, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है? 12
31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने लंदन के व्यापारियों को एक शाही चार्टर दिया। इसके तहत उन्हें केप ऑफ गुड होप के पूर्व के विशाल क्षेत्र में अंग्रेजी व्यापार का एकाधिकार मिला। 3 शुरुआत में लक्ष्य मसाले थे, राज नहीं। निवेशक खतरनाक समुद्री यात्राओं में पूंजी लगाते और जोखिम तथा मुनाफा बांटते थे। लेकिन हिंद महासागर कोई खाली मंच नहीं था। पुर्तगाली और डच व्यापारी पहले से सक्रिय थे, और भारत में शक्तिशाली राज्य, विकसित बैंकिंग व्यवस्था तथा दुनिया भर में मांग वाले वस्त्र उद्योग मौजूद थे।
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कंपनी के जहाज 1608 में सूरत पहुंचे, मगर व्यापार की अनुमति भारतीय सत्ता की स्वीकृति पर निर्भर थी। 1615 में सर थॉमस रो मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में पहुंचे और सूरत में अंग्रेजी व्यापारिक केंद्र स्थापित करने का अधिकार प्राप्त किया। 3 बाद में मद्रास, बंबई और कलकत्ता कंपनी के प्रमुख तटीय ठिकाने बने, लेकिन ये शुरुआती दौर में केवल व्यापारिक पांव जमाने की जगहें थीं, किसी तयशुदा विजय का प्रमाण नहीं।
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वास्तव में 1680 के दशक में जब कंपनी ने मुगल साम्राज्य से टकराने की कोशिश की, तो उसे हारकर माफी मांगनी पड़ी। 12 उसकी स्थायी ताकत धीरे-धीरे बनी—साझा पूंजी, समुद्री नेटवर्क और इंग्लैंड में राजनीतिक संरक्षण से। 1657 में स्थायी संयुक्त-स्टॉक व्यवस्था आई; बाद में एक प्रतिद्वंद्वी अंग्रेजी कंपनी बनी और 1709 में दोनों का विलय हुआ।
12 कंपनी को केवल निजी उद्यम मानना भ्रामक होगा: शाही विशेषाधिकार और राज्य का समर्थन उसकी ताकत के मूल में थे।
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी। ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों ने इन संघर्षों में अपनी सेनाएं और समर्थन झोंकना शुरू किया। 8 कंपनी के विस्तार में भारतीय बैंकर, व्यापारी और स्थानीय राजनीतिक सहयोगी अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
12 उसके सैनिकों का बड़ा आधार भारतीय सिपाही थे, जिनका नेतृत्व मुख्यतः यूरोपीय अधिकारी करते थे। कंपनी की फौज भारतीय भर्ती से बढ़ी और उसका खर्च बढ़ते हुए भारतीय राजस्व से ही निकला।
4 दूसरे शब्दों में, जिस शक्ति ने भारत पर नियंत्रण बढ़ाया, वह भारतीय श्रम, सैनिकों और धन पर ही टिकी थी।
1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने किलेबंदी और कंपनी के विशेषाधिकारों को लेकर विवाद के बाद कलकत्ता पर कब्जा कर लिया। रॉबर्ट क्लाइव सैन्य बल के साथ लौटा, लेकिन निर्णायक हथियार केवल बंदूकें नहीं थीं—दरबारी साजिश भी थी। 23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध में मीर जाफर सहित कई कमांडरों ने नवाब का साथ नहीं दिया; प्रभावशाली वित्तीय हितों ने भी सत्ता-परिवर्तन का समर्थन किया। सिराजुद्दौला हार गए और मीर जाफर नवाब बनाए गए। 12 इसलिए प्लासी को केवल ब्रिटिश सैन्य विजय कहना अधूरा है; यह एक ऐसा दरबारी तख्तापलट भी था, जिसकी आर्थिक और मानवीय कीमत बंगाल ने चुकाई।
प्लासी ने कंपनी के लिए बंगाल का खजाना खोला; बक्सर ने उसकी स्थिति मजबूत की। 1764 में कंपनी की सेना ने बंगाल के अपदस्थ शासक, अवध और मुगल बादशाह से जुड़े गठबंधन को हराया। 8 अगले वर्ष, 1765 में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी दी—अर्थात राजस्व वसूलने का अधिकार।
8 अब एक व्यापारिक निगम कर से मिलने वाले धन से निर्यात खरीद सकता था और अपनी सेना रख सकता था।
14 राजस्व ने विजय को वित्त दिया; विजय ने अधिक राजस्व का रास्ता खोला।
इसी व्यवस्था की भयावहता 1769–1770 के बंगाल अकाल में दिखी। वर्षा की विफलता और फसल संकट ने अकाल को जन्म दिया, पर कठोर राजस्व मांगों और अपर्याप्त राहत ने विनाश को और गहरा किया। लाखों लोग मारे गए; अक्सर दोहराया जाने वाला एक करोड़ मौतों का अनुमान विवादित है। 12 इस त्रासदी को केवल प्राकृतिक आपदा कहना पर्याप्त नहीं। इसने ऐसे शासन की विफलता उजागर की, जो आय तो निकालता था, लेकिन जिन लोगों के श्रम से वह आय बनती थी, उनके प्रति पर्याप्त जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करता था।
कंपनी का नियंत्रण युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं था। उसके एजेंटों ने बुनकरों पर प्रतिबंधात्मक अनुबंधों के जरिए दबाव डाला और नमक जैसी आवश्यक वस्तुओं पर एकाधिकार को राजस्व का साधन बनाया। 12 कंपनी हिंद महासागर के पार दास बनाए गए लोगों के व्यापार में भी शामिल रही।
12 बाद में ब्रिटेन के औद्योगिक वस्त्रों की प्रतिस्पर्धा और साम्राज्यवादी व्यापार व्यवस्थाओं ने भारतीय कपड़ा उत्पादन को गहरा आघात पहुंचाया, हालांकि इसका समय और पैमाना हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं था।
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ब्रिटेन में कंपनी के अधिकारी अपार निजी संपत्ति लेकर लौटते थे और उन्हें तिरस्कार से ‘नबॉब’ कहा जाने लगा। फिर भी निजी दौलत का अर्थ कंपनी की वित्तीय मजबूती नहीं था। युद्धों, कर्ज और वित्तीय झटकों ने 1772 में कंपनी को ब्रिटिश सरकार से सहायता मांगने पर मजबूर किया। 12 यह उसकी सफलता का बड़ा विरोधाभास था: विदेशों में अपार शक्ति, लेकिन देश में सरकार पर निर्भरता। शेयरधारक मुनाफा चाहते थे, संसद को उसके ढहने का डर था—और भारत के लोगों की इन दोनों संस्थाओं में बराबर की कोई आवाज नहीं थी।
1773 के रेगुलेटिंग एक्ट ने कंपनी पर संसद की निगरानी बढ़ाई। 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट ने राजनीतिक मामलों के लिए सरकारी बोर्ड ऑफ कंट्रोल बनाया। 12 बंगाल के पहले गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स पर भारत में उनके आचरण को लेकर महाभियोग चला; 1795 में वे बरी हो गए।
8 इस मुकदमे ने ब्रिटेन में यह बहस छेड़ी कि क्या विजय अत्याचार को उचित ठहरा सकती है। लेकिन जवाबदेही का सवाल अनसुलझा रहा और विस्तार जारी रहा।
कंपनी का संकट अटलांटिक पार भी पहुंचा। 1773 के टी एक्ट ने उसे ब्रिटेन की अमेरिकी कॉलोनियों में चाय बेचने में मदद दी, लेकिन एकाधिकार और कराधान के विरोध ने उग्र रूप ले लिया। बोस्टन में प्रदर्शनकारियों ने कंपनी की चाय बंदरगाह में फेंक दी। 12 एक साम्राज्यवादी व्यवसाय को बचाने की कोशिश ने उस टकराव को तेज किया, जिसके फलस्वरूप ब्रिटेन को अपना अमेरिकी साम्राज्य खोना पड़ा।
भारत में कंपनी का विस्तार न तो सहज था और न ही अपरिहार्य। मैसूर के हैदर अली और टीपू सुल्तान ने कंपनी की सेनाओं को चुनौती दी; टीपू 1799 में श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए मारे गए। 4 मराठा शक्तियों को कई युद्धों के बाद 1818 तक पराजित किया गया। सिखों के साथ युद्धों के बाद पंजाब का 1849 में विलय कर लिया गया।
4 कंपनी का प्रभाव बर्मा तक पहुंचा, लेकिन 1842 में काबुल से पीछे हटना साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा की विनाशकारी सीमाओं का उदाहरण बना।
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कंपनी केवल युद्ध से नहीं बढ़ी। सहायक संधियों के तहत भारतीय शासकों को ब्रिटिश नियंत्रण वाली सेना रखनी पड़ती थी और विदेश नीति में स्वतंत्रता छोड़नी पड़ती थी। 8 जमीन पर 1793 के बंगाल स्थायी बंदोबस्त ने जमींदारों से राज्य की राजस्व मांग तय कर दी। इससे जमींदारों की शक्ति बढ़ी, लेकिन किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हुई। अन्य क्षेत्रों में रैयतों या गांव समुदायों पर आधारित अलग बंदोबस्त लागू हुए।
12 इन सभी व्यवस्थाओं में एक साझा दबाव था—राजस्व निकालने का दबाव।
चाय ने कंपनी को चीन से भी बांध दिया। चाय खरीदने के लिए चांदी चाहिए थी, इसलिए कंपनी ने भारत में उगाई गई अफीम को निजी व्यापारियों के जरिए नीलाम किया, जो उसे चीन के निषेध के बावजूद वहां तस्करी से पहुंचाते थे। 12 लत और चांदी के बहिर्वाह ने चीन में गंभीर संकट पैदा किया। 1839 में चीनी अधिकारी लिन ज़ेश्यू ने कैंटन में इस व्यापार के खिलाफ कार्रवाई की। ब्रिटेन युद्ध पर उतर आया, और 1842 की नानकिंग संधि के तहत बंदरगाह खोले गए तथा हांगकांग सौंप दिया गया।
12 यह ब्रिटिश राज्य का युद्ध था, लेकिन उसके पीछे खड़ी व्यापारिक व्यवस्था के केंद्र में कंपनी-उत्पादित अफीम थी।
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तब तक मूल व्यापारिक कंपनी का अंत शुरू हो चुका था। संसद ने 1813 में भारत के साथ उसके अधिकांश व्यापारिक एकाधिकार खत्म कर दिए और 1833 में उसके बचे हुए वाणिज्यिक अधिकार भी समाप्त कर दिए। 12 कंपनी अब अपने पुराने अर्थ में व्यापारी नहीं रही; वह ब्रिटिश क्षेत्रों की प्रशासक भर रह गई।
कंपनी शासन ने सीमाओं के साथ समाज को भी बदला। अदालतें, सर्वेक्षण, अंग्रेजी शिक्षा, रेल और टेलीग्राफ ने प्रशासनिक पहुंच बढ़ाई। 8 1829 में सती-प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसके लिए राजा राममोहन राय जैसे भारतीय सुधारकों ने भी समर्थन और अभियान चलाया था।
8 लेकिन सुधारों के साथ नस्ली पदानुक्रम, मिशनरी दबाव और यह औपनिवेशिक धारणा भी मौजूद थी कि भारतीय स्वयं शासन करने योग्य नहीं हैं।
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गवर्नर-जनरल डलहौजी के दौर में व्यपगत सिद्धांत के तहत कंपनी उन रियासतों को मिला लेती थी जहां वह दत्तक उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इनकार कर देती थी। झांसी इसका प्रमुख उदाहरण थी। 11 1856 में अवध को अलग आधार—कथित कुशासन—पर मिला लिया गया।
11 राजाओं ने गद्दियां खोईं, जमींदारों और अभिजात वर्ग ने प्रभाव खोया, और सैनिकों ने अपने ही क्षेत्रों को कंपनी के अधीन जाते देखा।
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बंगाल सेना के भीतर वेतन, पदोन्नति और सेवा-शर्तों से जुड़ी शिकायतें पहले से थीं। धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की आशंका ने असंतोष को और गहरा कर दिया। नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों के बारे में माना गया कि उनमें गाय और सूअर की चर्बी लगी है—जो हिंदू और मुस्लिम, दोनों सैनिकों के लिए अस्वीकार्य था। 2 कारतूस चिंगारी बना; वर्षों का अविश्वास बारूद था।
10 मई 1857 को मेरठ में सिपाहियों ने विद्रोह किया और दिल्ली पहुंचकर बहादुर शाह ज़फर को विद्रोह का प्रतीकात्मक सम्राट बनाया। इसके बाद उत्तर और मध्य भारत के बड़े हिस्सों में संघर्ष फैल गया। 1 रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और बेगम हजरत महल जैसे नेता उभरे, लेकिन उनके उद्देश्य एक जैसे नहीं थे। अनेक भारतीयों ने ब्रिटिश पक्ष का भी साथ दिया।
11 इसलिए इसे केवल ‘सिपाही विद्रोह’ कहना भी अधूरा है और पूर्णतः एकीकृत राष्ट्रीय युद्ध कहना भी।
संघर्ष दोनों पक्षों की क्रूरता से भरा था। विद्रोहियों ने ब्रिटिश नागरिकों—जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे—की हत्या की। जवाब में ब्रिटिश सेनाओं ने फांसी, गांवों के विनाश और कठोर प्रतिशोध का सहारा लिया। 1 अतिरिक्त सैनिकों और भारतीय सहयोगियों की मदद से अंग्रेजों ने दिल्ली फिर से अपने कब्जे में ली और 1858 तक प्रतिरोध के प्रमुख केंद्रों को कुचल दिया।
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कंपनी युद्धभूमि पर तो बच गई, लेकिन अपना शासनाधिकार नहीं बचा सकी। 1858 में ब्रिटिश संसद ने भारत का शासन कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया। 12 कंपनी एक वित्तीय ढांचे के रूप में कुछ समय तक रही और अंततः 1874 में भंग कर दी गई।
12 यह भारत की मुक्ति नहीं थी। ब्रिटेन ने केवल उस कॉर्पोरेट मध्यस्थ को हटा दिया जिसने साम्राज्य खड़ा करने में मदद की थी, और उसके साम्राज्य को सीधे अपने हाथ में ले लिया।
ईस्ट इंडिया कंपनी की विरासत सिर्फ लालच की चेतावनी नहीं है। यह उन संस्थाओं की कहानी भी है जिन्होंने उसे अधिकार दिए, उन गठबंधनों की जो उसे चलाते रहे, और उन लोगों की जिनसे उसकी कीमत वसूली गई। एक चार्टर ने व्यापार का वादा किया था। उसके बाद साम्राज्य आया। कंपनी खत्म हो गई, मगर उसके परिणाम बहुत लंबे समय तक बने रहे।
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31 दिसंबर 1600 को मिले शाही चार्टर के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने एशिया के व्यापार में अंग्रेजी एकाधिकार से शुरुआत की। [3]
31 दिसंबर 1600 को मिले शाही चार्टर के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने एशिया के व्यापार में अंग्रेजी एकाधिकार से शुरुआत की। [3] प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के बाद कंपनी व्यापारिक संस्था से राजस्व वसूलने वाली सैन्य राजनीतिक शक्ति बन गई। [8]
1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिलने पर भारतीय राजस्व ने कंपनी की फौज और विस्तार को वित्त दिया। [8]