कंपनियों का तर्क है कि सीमित दवा बजट, धीमी व बिखरी हुई प्रतिपूर्ति व्यवस्था और क्लिनिकल ट्रायल में देरी यूरोप को अमेरिका और चीन के मुकाबले कम आकर्षक बना रहे हैं। उनके अनुसार, यूरोप में करीब 40% नई स्वीकृत थेरेपी मरीजों तक नहीं पहुंचतीं; जिन तक पहुंचती हैं, उनके लिए प्रतीक्षा लगभग 600 दिन है। चेयरों ने नई दवाओं पर खर...
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शोध उत्तर

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: Why are the board chairs of AstraZeneca, GSK, Novo, Novartis, Roche, Sanofi, Boehringer Ingelheim, Chiesi and Ipsen warning that Europe’s ph. Article summary: The chairs argue that Europe risks a self reinforcing decline: constrained medicine budgets, slow and fragmented reimbursement, weaker incentives and slower trials reduce patient access and make the region less attractiv. Topic tags: general web, productivity, regulation, marketing, growth. Style: premium digital editorial illustration, source-backed research mood, clean composition, high detail, modern web publication hero. Use reference image context only for broad subject, composition, and topical grounding; do not copy the exact image. Avoid: logos, brand marks, copyrighted characters, real person likenesses, fake screenshots, UI text, readable text, waterm
नौ बड़ी दवा कंपनियों के चेयरों का कहना है कि यूरोप एक ऐसे चक्र में फंस सकता है जो खुद को और कमजोर करता जाएगा। दवाओं के सीमित बजट, देशों के बीच अलग-अलग और धीमी प्रतिपूर्ति व्यवस्था, कमज़ोर निवेश प्रोत्साहन तथा क्लिनिकल ट्रायल की धीमी प्रक्रिया से मरीजों को नई दवाएं देर से मिलती हैं। साथ ही, अनुसंधान एवं विकास (R&D), ट्रायल और विनिर्माण के लिए यूरोप की आकर्षकता घटती है, जबकि अमेरिका और चीन बड़े पैमाने पर निवेश खींच रहे हैं।
उनकी खुली चिट्ठी में इस्तेमाल हुआ “धीमी पीड़ा” का वाक्यांश मारियो द्राघी की चेतावनी से लिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यूरोपीय दवा उद्योग पहले ही ढह चुका है, बल्कि यह कि नीतिगत बदलाव न होने पर रणनीतिक क्षेत्रों में क्रमिक गिरावट का खतरा है। 5
कंपनियां चाहती हैं कि राष्ट्रीय सरकारें:
यूरोपीय संघ के स्तर पर चेयरों ने मांग की है कि:
जर्मनी के 2026 के स्वास्थ्य-बीमा लागत नियंत्रण सुधार को उद्योग के विरोध के बावजूद अंतिम मंजूरी मिली। दवा कंपनियों का कहना था कि इससे निवेश हतोत्साहित होगा। 2
रिपोर्टों के अनुसार, इस सुधार में अधिकांश ब्रांडेड प्रिस्क्रिप्शन दवाओं पर निर्माताओं के अनिवार्य रिबेट को 7% से बढ़ाकर 15.5% कर दिया गया—यानी दोगुने से अधिक। 2 यही नीति-संघर्ष का केंद्र है: सरकारों को बीमा बजट पर तत्काल दबाव कम करना है, जबकि निर्माता कहते हैं कि अधिक रिबेट और मूल्य नियंत्रण से संभावित रिटर्न घटता है और निवेश का प्रोत्साहन कमजोर पड़ता है।
चेयरों का अनुमान है कि यदि यूरोप चीन और अमेरिका के साथ क्लिनिकल ट्रायल का अंतर पाट ले, तो 53 अरब यूरो की आर्थिक गतिविधि और 82,000 नौकरियां पैदा हो सकती हैं। यह उद्योग-समर्थित आर्थिक अनुमान है, कोई सुनिश्चित परिणाम नहीं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यूरोप वास्तव में अधिक ट्रायल आकर्षित कर पाता है या नहीं और उनसे जुड़ी R&D, अस्पतालों तथा आपूर्ति-श्रृंखला की गतिविधियां अपने यहां रख पाता है। 5
मुद्दा इसलिए सीधा नहीं है। अधिक मूल्यवान दवाओं के लिए तेज और बेहतर भुगतान से मरीजों की पहुंच तथा निवेश मजबूत हो सकते हैं, लेकिन इससे अल्पावधि में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च भी बढ़ेगा। साथ ही, दवाओं के वास्तविक चिकित्सकीय लाभ का भरोसेमंद आकलन जरूरी रहेगा। कंपनियों के आंकड़े यूरोप की सापेक्ष प्रतिस्पर्धी गिरावट और मरीजों की पहुंच में देरी को रेखांकित करते हैं; लेकिन अधिक खर्च और IP नियमों में बदलाव उनके नीतिगत प्रस्ताव हैं, जिनकी सफलता स्वतः सिद्ध नहीं मानी जा सकती।
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कंपनियों का तर्क है कि सीमित दवा बजट, धीमी व बिखरी हुई प्रतिपूर्ति व्यवस्था और क्लिनिकल ट्रायल में देरी यूरोप को अमेरिका और चीन के मुकाबले कम आकर्षक बना रहे हैं।
कंपनियों का तर्क है कि सीमित दवा बजट, धीमी व बिखरी हुई प्रतिपूर्ति व्यवस्था और क्लिनिकल ट्रायल में देरी यूरोप को अमेरिका और चीन के मुकाबले कम आकर्षक बना रहे हैं। उनके अनुसार, यूरोप में करीब 40% नई स्वीकृत थेरेपी मरीजों तक नहीं पहुंचतीं; जिन तक पहुंचती हैं, उनके लिए प्रतीक्षा लगभग 600 दिन है।
चेयरों ने नई दवाओं पर खर्च बढ़ाने, प्रतिपूर्ति फैसलों को तेज करने, क्लिनिकल ट्रायल सरल बनाने, बौद्धिक संपदा सुरक्षा मजबूत रखने और सदस्य देशों को वित्तीय लचीलापन देने की मांग की है।