इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि यूरोप भर में रूस की लगातार उकसावे वाली कार्रवाइयां मॉस्को की “एक तरह की घबराहट” दर्शाती हैं। उनके मुताबिक, यह उस यूक्रेन युद्ध से ध्यान हटाने का प्रयास है जो क्रेमलिन की अपेक्षा के अनुसार आगे नहीं बढ़ रहा है।
मेलोनी ने जोर देकर कहा कि यूक्रेन के समर्थन में इटली का रुख “कभी नहीं डगमगाया” है। उन्होंने तर्क दिया कि जो देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाना चाहता है, उसे अपनी नीति में स्पष्टता और निरंतरता रखनी चाहिए।
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साल्विनी की रूसी राजदूत से मुलाकात पर क्या बोलीं?
उप-प्रधानमंत्री मातेओ साल्विनी की मिलान में रूस के राजदूत से मुलाकात को मेलोनी ने असाधारण मामला नहीं माना। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिबंधों का पालन करने की शर्त पर रूसी बाजार में काम कर रही इतालवी कंपनियों पर कोई पूर्ण कानूनी रोक नहीं है। उनके संकेत के अनुसार, इन दोनों बातों से कीव के समर्थन वाली रोम की विदेश नीति नहीं बदलती।
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यूक्रेन को सैन्य मदद: क्या तय है, क्या नहीं?
इटली ने 2026 तक यूक्रेन को सैन्य सहायता जारी रखने की औपचारिक अनुमति दी है।
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हालांकि, लगभग 3 अरब यूरो के एक कथित नए सहायता पैकेज की खबरों को सावधानी से देखना चाहिए। इन रिपोर्टों में SAMP/T NG वायु-रक्षा बैटरियां, Aster 30 इंटरसेप्टर मिसाइलें और लंबी दूरी के रडार शामिल होने की बात कही गई थी। लेकिन अगस्त के अंत में रक्षा मंत्री गुइदो क्रोसेत्तो ने कहा था कि ऐसा 13वां पैकेज अभी तक औपचारिक सरकारी निर्णय के रूप में अपनाया नहीं गया है।
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लिथुआनिया में ड्रोन और लाइपज़िग की घटना
15 सितंबर को NATO मिशन पर तैनात एक इतालवी लड़ाकू विमान ने लिथुआनियाई हवाई क्षेत्र में घुसे एक ड्रोन को मार गिराया। क्रोसेत्तो ने कहा कि ड्रोन “संभवतः” रूस से आया था। इसे Gerbera प्रकार का ड्रोन बताया गया, लेकिन इसके स्रोत और प्रकार की सार्वजनिक फॉरेंसिक पुष्टि निर्णायक रूप से सामने नहीं आई है।
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जर्मनी ने लाइपज़िग हवाईअड्डे पर विस्फोटक-युक्त ड्रोन से कथित हमले के प्रयास के लिए सीधे रूस को जिम्मेदार ठहराया है। जर्मन अधिकारियों ने इसे एक व्यवस्थित ‘हाइब्रिड’ अभियान का हिस्सा बताया, जबकि मॉस्को आरोपों से इनकार करता है। यूरोपीय संघ ने इसे यूरोपीय संघ की जमीन पर तनाव बढ़ाने वाली घटना कहा और NATO के साथ मिलकर अधिक दबाव तथा जवाबी कदमों के संकेत दिए।
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यूरोप की व्यापक चिंता क्या है?
इन घटनाओं ने यूरोपीय देशों की उस चिंता को मजबूत किया है कि मॉस्को यूक्रेन में पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ कम-स्तर के दबाव के तरीकों का भी इस्तेमाल कर रहा है—जैसे हवाई क्षेत्र का उल्लंघन, तोड़फोड़ और अहम परिवहन ढांचे पर हमले। उद्देश्य NATO की तैयारी को परखना, सरकारों पर दबाव बनाना और सहयोगी देशों की एकजुटता को कमजोर करना हो सकता है, बिना सीधे पारंपरिक सैन्य टकराव की स्थिति तक पहुंचे।
इसीलिए यूरोप का उभरता जोर हर घटना को अलग-अलग देखने के बजाय तेज वायु-रक्षा और ड्रोन-रोधी क्षमता, बेहतर खुफिया व जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था, मजबूत बुनियादी ढांचे तथा समन्वित कूटनीतिक और आर्थिक जवाब पर है।
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