28 फरवरी से शुरू हुआ अमेरिका इज़राइल अभियान छह महीने बाद भी स्थायी समझौता नहीं करा सका; होरमुज़ से जुड़े जहाज़रानी मार्ग बाधित रहे और युद्धविराम बेहद नाज़ुक बना रहा। [49][50] इज़राइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों, वायु रक्षा और सैन्य कमान को निशाना बनाने की बात कही, लेकिन नुकसान और हताहत...
शोध उत्तर

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: What has happened during the first six months of the war launched by Israel and the United States against Iran under Israel’s “Operation Roa. Article summary: The first six months produced no durable settlement: a U.S.-Israeli campaign intended to cripple Iran’s leadership, nuclear and missile capacities instead became a wider regional war, disrupted Hormuz-linked energy and s. Topic tags: general, general web, news, government. Style: premium digital editorial illustration, source-backed research mood, clean composition, high detail, modern web publication hero. Use reference image context only for broad subject, composition, and topical grounding; do not copy the exact image. Avoid: logos, brand marks, copyrighted characters, real person likenesses, fake screenshots, UI text, readable text, watermarks, charts with
छह महीने पहले शुरू हुआ अमेरिका-इज़राइल अभियान ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमता को कमजोर करने के घोषित लक्ष्य से आगे बढ़कर पूरे क्षेत्र के लिए सुरक्षा और आर्थिक संकट बन गया। 28 फरवरी को इज़राइल ने इसे ऑपरेशन रोअरिंग लॉयन और अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया था। इसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई, होरमुज़ जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक यातायात का व्यवधान और अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी ने संघर्ष का दायरा बढ़ा दिया। 3
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इज़राइल ने शुरुआती अभियान का उद्देश्य ईरानी सरकार को “गंभीर रूप से कमजोर” करना और इज़राइल के लिए बताए गए अस्तित्वगत खतरों को हटाना बताया। उसके तर्क में ईरान का परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और व्यापक सैन्य ढांचा प्रमुख थे। 3
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अमेरिकी और इज़राइली हमलों में कथित तौर पर वरिष्ठ नेतृत्व, कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र, मिसाइल निर्माण और प्रक्षेपण स्थल, वायु रक्षा प्रणालियां, नौसैनिक परिसंपत्तियां, संचार ढांचा और परमाणु-संबंधी ठिकाने शामिल थे। फॉक्स न्यूज़ ने अमेरिकी दावों के हवाले से बताया कि पहले 24 घंटों में 1,000 से अधिक ठिकानों पर हमला किया गया। हालांकि, युद्ध के दौरान नुकसान के आंकड़े और हमलों के प्रभाव अब भी मुख्य रूप से संबंधित पक्षों और उनके समर्थकों के दावे हैं; इनका कोई एक स्वतंत्र और पूर्ण सत्यापन उपलब्ध नहीं है। 5
ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई और अन्य वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने की खबरें भी सामने आईं। कुछ स्रोतों ने इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में पेश किया, लेकिन उपलब्ध सामग्री इन दावों की निर्णायक स्वतंत्र पुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं है। यह सावधानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेतृत्व के नुकसान, नष्ट किए गए ठिकानों और हताहतों के आंकड़े सैन्य अभियान के साथ-साथ सूचना-युद्ध का हिस्सा भी बन गए। 2
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ईरान ने इज़राइल, अमेरिकी बलों और क्षेत्र के कुछ देशों को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इससे संघर्ष केवल ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय टकराव में बदल गया। 1
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अमेरिका और इज़राइल के अधिकारियों ने दावा किया कि अभियान से ईरान की वायु रक्षा, मिसाइल लॉन्चर, नौसैनिक परिसंपत्तियां और कमांड संरचनाएं बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त हुईं। इसके विपरीत, ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता के पूरी तरह तबाह होने की तस्वीर को खारिज किया। ईरानी नौसेना के कमांडर शाहराम ईरानी ने कहा कि नौसेना सक्रिय है और अपने मिशन जारी रखे हुए है। 17
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सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर निष्कर्ष इससे अधिक सीमित है: ईरानी बलों को नुकसान और लगातार सैन्य दबाव का सामना करना पड़ा, लेकिन देश की बची हुई सैन्य क्षमता का कोई निर्णायक, स्वतंत्र आकलन सामने नहीं आया है। यही सावधानी मृतकों की संख्या और विशिष्ट ठिकानों के विनाश से जुड़े दावों पर भी लागू होती है।
युद्ध का असर ईरान के भीतर के लक्ष्यों से कहीं आगे गया। होरमुज़ जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाज़रानी में ईरान के व्यवधान और इसके जवाब में ईरानी समुद्री व्यापार पर अमेरिकी नाकेबंदी ने क्षेत्रीय ऊर्जा उत्पादन, समुद्री परिवहन और हवाई यातायात को प्रभावित किया। अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस ने युद्धविराम को “लाइफ सपोर्ट” पर बताया, क्योंकि होरमुज़ में व्यवधान और अमेरिकी नाकेबंदी वैश्विक आर्थिक प्रभावों को बढ़ा रहे थे।
होरमुज़ एक साथ सैन्य दबाव का साधन और कूटनीतिक लक्ष्य बन गया। अप्रैल के युद्धविराम के दौरान वाणिज्यिक मार्ग फिर खोलना वार्ता की प्रमुख शर्तों में शामिल था, लेकिन पक्ष इस बात पर सहमत नहीं थे कि “सुरक्षित” और “पूर्ण” आवागमन व्यवहार में किसे कहा जाएगा।
इसलिए होरमुज़ केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहा। उसने सैन्य तनाव, तेल आपूर्ति, प्रतिबंधों में राहत और बातचीत की संभावनाओं को एक ही धागे में जोड़ दिया। किसी भी ऐसे समझौते में जो समुद्री आवागमन का समाधान नहीं करता, अस्थिरता और दबाव का एक बड़ा स्रोत बना रहता।
7 अप्रैल को लगभग 40 दिनों के संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान ने अस्थायी युद्धविराम पर सहमति जताई। इस विराम से बड़े अमेरिकी और इज़राइली हवाई हमले रुके, लेकिन मूल विवाद समाप्त नहीं हुए। ईरान की समुद्री नाकेबंदी और अमेरिका का समुद्री दबाव बातचीत में प्रमुख अड़चन बने रहे। इसके बाद हुई झड़पों ने दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी को उजागर किया।
पाकिस्तान ने मध्यस्थता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इस्लामाबाद में वार्ताएं हुईं। इनका लक्ष्य अस्थायी विराम को व्यापक समझौते में बदलना था। लेकिन वॉशिंगटन ने बातचीत के साथ-साथ ईरान के समुद्री व्यापार और तेल राजस्व पर दबाव जारी रखा। अमेरिका ने ईरानी तेल खरीदने वाले देशों पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी भी दी।
अगस्त के अंत तक वॉशिंगटन खुले तौर पर अगले चरण को “आर्थिक दमघोंटू दबाव” बता रहा था—यानी ईरानी सरकार को सहारा देने वाली आर्थिक जीवनरेखाओं को काटना, जब तक तेहरान अतिरिक्त रियायतें स्वीकार न करे। संघर्ष संबंधी आकलनों में नाकेबंदी और प्रतिबंधों के दबाव को ईंधन की कमी, महंगाई, बेरोज़गारी और बढ़ती कीमतों से जोड़ा गया है। हालांकि, उपलब्ध स्रोत युद्धकालीन महंगाई या मानवीय नुकसान का कोई एक आधिकारिक और सर्वमान्य कुल आंकड़ा नहीं देते।
18 जून का इस्लामाबाद समझौता-ज्ञापन सैन्य कार्रवाई रोकने, होरमुज़ जलडमरूमध्य को फिर खोलने और अंतिम अमेरिका-ईरान समझौते की दिशा में रास्ता बनाने के लिए तैयार किया गया था। प्रकाशित ढांचे में तत्काल शत्रुता रोकने और आगे की बातचीत की अवधि का प्रावधान था, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम के दीर्घकालिक भविष्य जैसे सबसे कठिन सवालों को बाद के लिए टाल दिया गया।
यही इसकी ताकत और कमजोरी दोनों थी। तत्काल युद्धविराम को संभव बनाने के लिए कठिन मुद्दों को अलग रखना उपयोगी रहा, लेकिन इससे युद्ध के मूल कारण अनसुलझे रह गए—ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताएं, प्रतिबंधों से राहत, समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियां और वे शर्तें जिनके तहत इज़राइल दोबारा हमला नहीं करेगा। रॉयटर्स ने इसे एक अंतरिम व्यवस्था बताया, जिसमें बड़े मुद्दों को अंतिम समझौते तक टाल दिया गया था।
अगस्त तक अंतिम समझौते के लिए तय बातचीत की अवधि समाप्त हो गई, लेकिन वॉशिंगटन और तेहरान किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके। ईरानी अधिकारियों ने अमेरिका पर समझौता-ज्ञापन का उल्लंघन करने का आरोप लगाया, जबकि अमेरिकी बयानों से संकेत मिला कि बातचीत किसी समय फिर शुरू हो सकती है। इस तरह यह ढांचा व्यापक युद्ध के तत्काल जोखिम को घटाने में तो मददगार रहा, लेकिन स्थायी शांति समझौता नहीं बन सका।
युद्ध ने दो बिल्कुल अलग राजनीतिक कहानियां पैदा कर दी हैं। वॉशिंगटन और इज़राइल ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमताओं को कमजोर करने को अपनी उपलब्धि बताते हैं। ईरान लगातार प्रतिरोध, बची हुई सैन्य क्षमता और विरोधियों पर डाले गए आर्थिक बोझ को अपनी सफलता के प्रमाण के रूप में पेश करता है। उपलब्ध साक्ष्य इनमें से किसी भी दावे को निर्णायक रणनीतिक जीत साबित नहीं करते।
इज़राइल ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि ईरान अपनी परमाणु या बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता फिर से बनाता है, तो वह दोबारा हमला कर सकता है—भले ही अमेरिका और ईरान अलग से किसी समझौते पर पहुंच जाएं। इससे कूटनीति के सामने एक बुनियादी समस्या खड़ी होती है: अमेरिका-ईरान समझौता अपने आप इज़राइली सैन्य कार्रवाई के अंत की गारंटी नहीं दे सकता। 3
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लंबे समय तक चलने वाले अमेरिकी सैन्य अभियानों से सैन्य तैयारी पर दबाव पड़ने की चिंताएं भी सामने आई हैं। दूसरी ओर, मानवीय और आर्थिक नुकसान बढ़ते जा रहे हैं। फिर भी उपलब्ध और परस्पर-विरोधी दावों के आधार पर मृतकों, घायलों, बुनियादी ढांचे के नुकसान या आर्थिक क्षति का कोई एक विश्वसनीय कुल आंकड़ा बताना संभव नहीं है।
सबसे स्पष्ट निष्कर्ष यह नहीं है कि किसी एक पक्ष ने जीत हासिल कर ली है। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के भीतर गहरे हमले करने और उस पर गंभीर सैन्य व आर्थिक दबाव डालने की क्षमता दिखाई। ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से जवाब दिया, रणनीतिक रूप से अहम जलडमरूमध्य में व्यवधान पैदा किया और इतना दबाव बनाए रखा कि बातचीत की जरूरत खत्म नहीं हुई।
अगस्त 2026 के अंत तक युद्धविराम को शांति से अधिक एक अस्थिर विराम समझना उचित है। परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर विवाद, सैन्य नुकसान को लेकर परस्पर-विरोधी दावे, लगातार आर्थिक दबाव और इज़राइल की दोबारा कार्रवाई की चेतावनी—इन सबने संघर्ष की अगली दिशा को अनिश्चित बनाए रखा।
Studio Global AI
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28 फरवरी से शुरू हुआ अमेरिका इज़राइल अभियान छह महीने बाद भी स्थायी समझौता नहीं करा सका; होरमुज़ से जुड़े जहाज़रानी मार्ग बाधित रहे और युद्धविराम बेहद नाज़ुक बना रहा। [49][50]
28 फरवरी से शुरू हुआ अमेरिका इज़राइल अभियान छह महीने बाद भी स्थायी समझौता नहीं करा सका; होरमुज़ से जुड़े जहाज़रानी मार्ग बाधित रहे और युद्धविराम बेहद नाज़ुक बना रहा। [49][50] इज़राइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों, वायु रक्षा और सैन्य कमान को निशाना बनाने की बात कही, लेकिन नुकसान और हताहतों के कई दावे स्वतंत्र रूप से निर्णायक रूप से सत्यापित नहीं हैं। [3][5]
ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों के साथ जवाब दिया। उसके नौसेना प्रमुख शाहराम ईरानी ने नौसेना के नष्ट होने के दावों को खारिज करते हुए कहा कि वह अब भी सक्रिय है। [17][18]