29 अगस्त को आइसलैंड में मतदाता एक अहम, लेकिन अक्सर गलत समझे जा रहे सवाल पर वोट कर रहे हैं: क्या देश को यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए बातचीत फिर शुरू करनी चाहिए?
यह मतदान EU की सदस्यता स्वीकार करने या खारिज करने पर नहीं है। ‘हां’ का मतलब होगा कि 2013 में रोक दी गई परिग्रहण वार्ताएं ब्रसेल्स के साथ दोबारा शुरू होंगी। ‘नहीं’ का अर्थ होगा कि आइसलैंड की EU सदस्यता की कोशिश निकट भविष्य में फिर ठंडे बस्ते में जा सकती है।
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यानी मतदाता किसी अंतिम समझौते को मंजूरी नहीं दे रहे, बल्कि यह तय कर रहे हैं कि उस समझौते की शर्तों की पड़ताल की जाए या नहीं।
‘हां’ वोट के बाद क्या होगा?
‘हां’ मिलने पर EU के साथ 35 नीति क्षेत्रों में बातचीत फिर शुरू होगी। इस प्रक्रिया में लगभग 18 से 24 महीने लगने का अनुमान है। इससे आइसलैंड को सदस्यता की संभावित शर्तों का आकलन करने का मौका मिलेगा—खासकर उन मुद्दों पर, जिनके कारण पिछली वार्ताएं राजनीतिक रूप से कठिन बनी थीं।
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लेकिन बातचीत पूरी हो जाने पर भी आइसलैंड अपने-आप EU का सदस्य नहीं बन जाएगा। संभावित सदस्यता समझौते को आइसलैंड की संसद से मंजूरी, संवैधानिक संशोधन, EU के सभी 27 सदस्य देशों की सर्वसम्मत स्वीकृति और आइसलैंड में दूसरे जनमत संग्रह की जरूरत होगी।
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‘नहीं’ वोट से EU के साथ आइसलैंड के मौजूदा संबंध तुरंत नहीं बदलेंगे। हालांकि सरकार ने संकेत दिया है कि ऐसा परिणाम सदस्यता प्रक्रिया को एक पीढ़ी या कम-से-कम निकट भविष्य तक समाप्त कर सकता है।
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मतदान का समय पहले क्यों किया गया?
आइसलैंड की सरकार पहले कह चुकी थी कि जनमत संग्रह 2027 तक कराया जाएगा। लेकिन रूस का यूक्रेन पर युद्ध, आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर अनिश्चितता ने इस बहस को ज्यादा तात्कालिक बना दिया।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पास के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण या कब्जे से जुड़ी बार-बार की धमकियों ने बहस को और तीखा आर्कटिक आयाम दे दिया। ये टिप्पणियां ग्रीनलैंड को लेकर थीं, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप ने कई बार गलती से आइसलैंड का नाम भी लिया। इससे उत्तर अटलांटिक में स्थित आइसलैंड में सुरक्षा संबंधी चिंता बढ़ी—हालांकि देश NATO का सदस्य है और अमेरिका के साथ उसका द्विपक्षीय रक्षा संबंध भी है।
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EU के साथ नए सिरे से बातचीत के समर्थकों का तर्क है कि यूरोप के साथ संस्थागत रिश्ते राजनीतिक और आर्थिक सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत दे सकते हैं। फिर भी यह मतदान आइसलैंड की NATO सदस्यता या अमेरिका के साथ रक्षा संबंध को खत्म नहीं करता; अधिकारियों के मुताबिक परिणाम चाहे जो हो, ये संबंध महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
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महंगाई और ब्याज दरों के बीच आर्थिक तर्क
‘हां’ अभियान ने जीवन-यापन की बढ़ती लागत को अपने तर्क का केंद्र बनाया है। आइसलैंड की अस्थिर मुद्रा क्रोना, महंगाई और ऊंची ब्याज दरों ने इस सवाल में रुचि बढ़ाई है कि क्या EU सदस्यता और आगे चलकर यूरो अपनाने से मौद्रिक स्थिरता और कर्ज की लागत में सुधार हो सकता है। समर्थक EU के एकल बाजार में और गहरे एकीकरण को भी लाभ के रूप में देखते हैं।
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हालांकि यूरो अपनाना न तो तुरंत होगा और न ही अपने-आप। यह बातचीत के नतीजे और भविष्य के किसी सदस्यता समझौते की शर्तों पर निर्भर करेगा। उस समझौते पर आइसलैंड में फिर से मतदान भी होना होगा।
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इसलिए ‘हां’ वोट देने वालों के लिए यह मतदान यह जांचने का अवसर है कि EU सदस्यता के आर्थिक लाभ और लागतों का संतुलन आम परिवारों की वित्तीय स्थिति और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए बेहतर हो सकता है या नहीं। यह महंगाई या ऊंची ब्याज दरों को तुरंत खत्म करने का वादा नहीं है।
‘नहीं’ पक्ष के लिए मछली पालन और संप्रभुता सबसे बड़ा मुद्दा
बातचीत फिर शुरू करने के विरोधियों का सबसे मजबूत तर्क राष्ट्रीय नियंत्रण से जुड़ा है। आइसलैंड का मछली उद्योग और उसके समुद्री जल तक पहुंच देश की संप्रभुता से गहराई से जुड़ी है। EU की सदस्यता वार्ताओं में मत्स्य पालन लगातार सबसे विवादास्पद मुद्दों में रहा है।
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विरोधियों को डर है कि EU के साझा मत्स्य पालन नियम आइसलैंड की अपने जलक्षेत्र में मछली पकड़ने के कोटे तय करने और यह निर्धारित करने की क्षमता सीमित कर सकते हैं कि वहां कौन मछली पकड़ सकता है। उनका कहना है कि EU से बाहर रहकर देश अपने हितों की रक्षा अधिक प्रभावी ढंग से कर सकता है और यूरोपीय संस्थाओं को अतिरिक्त अधिकार देने से बच सकता है।
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यही चिंता इस जनमत संग्रह को महज बातचीत शुरू करने की प्रक्रिया से आगे ले जाती है। ‘हां’ का अर्थ होगा कि आइसलैंड यह परखेगा कि मछली पालन और संप्रभुता से जुड़े सवालों पर कोई व्यावहारिक समझौता संभव है या नहीं। ‘नहीं’ मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखेगा, लेकिन EU के साथ नई शर्तों की तलाश का रास्ता बंद कर देगा।
नतीजा बताना मुश्किल क्यों है?
अभियान ने मतदाताओं को सुरक्षा की दो अलग-अलग अवधारणाओं के बीच बांट दिया है। एक पक्ष अनिश्चित भू-राजनीतिक माहौल में यूरोप के साथ आर्थिक और राजनीतिक एकीकरण को सुरक्षा कवच मानता है। दूसरा पक्ष राष्ट्रीय नियंत्रण—खासकर मछली पालन पर अधिकार—को आइसलैंड की सुरक्षा और समृद्धि की बुनियाद मानता है।
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सर्वेक्षणों में भी यही विभाजन नजर आया है। 21 से 25 अगस्त के बीच किए गए Maskína सर्वे में बातचीत फिर शुरू करने के पक्ष में 51.3% और विरोध में 48.7% लोगों ने समर्थन जताया। इसके बाद आए Gallup सर्वे में प्रस्ताव के विरोध में मामूली बहुमत बताया गया, जिससे अंतिम दिनों में मुकाबला ‘नहीं’ पक्ष की ओर झुकता दिखा।
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अंतर बेहद कम होने के कारण कोई भी सर्वे स्पष्ट विजेता नहीं बताता। नतीजा मतदान प्रतिशत और उन मतदाताओं पर निर्भर कर सकता है जिन्होंने मतदान के दिन तक अपना फैसला तय नहीं किया था।
मतदान का समय और नतीजों की उम्मीद
मतदान केंद्र 29 अगस्त को 09:00 GMT पर खुले और 22:00 GMT पर बंद होने थे। शुक्रवार देर तक 63,000 से अधिक लोग—यानी पात्र मतदाताओं के पांचवें हिस्से से ज्यादा—पहले ही मतदान कर चुके थे। शुरुआती नतीजे रविवार तड़के आने की उम्मीद थी।
तत्काल परिणाम यह तय करेगा कि आइसलैंड EU के साथ सदस्यता वार्ताएं फिर शुरू करेगा या नहीं। लेकिन बड़ा सवाल—क्या उसे वास्तव में EU में शामिल होना चाहिए—बाद में उठेगा, जब बातचीत पूरी होगी और आइसलैंड तथा यूरोपीय देशों की कई चरणों वाली मंजूरियां मिलेंगी।