अमेरिका और कनाडा के बीच विवाद अब सिर्फ टैरिफ या बाजार तक सीमित नहीं रहा। व्यापार वार्ता के टूटने के बाद मामला कनाडा की संप्रभुता, ऑटो उद्योग की नीति और दोनों देशों की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़ गया। आर्थिक दबाव के साथ नेताओं की निजी और तीखी बयानबाजी ने किसी समझौते की राह को और मुश्किल बना दिया है।
वार्ता आखिर क्यों टूटी?
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का कहना है कि बातचीत के अंतिम चरण में अमेरिका ने ऐसी नई मांगें रखीं, जो कनाडा के स्वतंत्र फैसले लेने के अधिकार को सीमित कर सकती थीं। उनके मुताबिक, इन मांगों में कनाडा के दूसरे देशों के साथ भविष्य के व्यापार समझौतों, ऑटो सेक्टर और कनाडाई संस्कृति व फ्रेंच भाषा से जुड़े संरक्षणों पर शर्तें शामिल थीं।
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अमेरिकी पक्ष ने इसका अलग चित्र पेश किया। उसके अनुसार, कनाडा ने अव्यावहारिक मांगें रखीं और अमेरिकी उत्पादकों के साथ अनुचित व्यापार बाधाएं बरकरार रखीं। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी दोनों पक्षों के दावों को दर्ज करती है, लेकिन अंतिम समय में रखी गई शर्तों की सही व्याख्या किसकी है, यह स्वतंत्र रूप से तय नहीं करती।
व्यापार विवाद से निजी हमलों तक
वार्ता विफल होने के बाद विवाद व्यक्तिगत हो गया। डोनाल्ड ट्रंप ने ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड को सार्वजनिक रूप से 'flunky' कहा और उनके दिवंगत भाई तथा टोरंटो के पूर्व मेयर रॉब फोर्ड से भी प्रतिकूल तुलना की।
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फोर्ड ने पलटवार करते हुए कहा कि वह किसी 'तानाशाह' या 'बुली' से सलाह नहीं लेंगे। उन्होंने ट्रंप को 'लूजर' और 'दिवालियापन का बादशाह' भी कहा। यह टिप्पणी ट्रंप से जुड़े कारोबारी दिवालियापन के पुराने मामलों पर कटाक्ष थी। इस आदान-प्रदान ने फोर्ड को उस विवाद में एक प्रमुख प्रांतीय आवाज बना दिया, जो मूल रूप से संघीय सरकारों के बीच व्यापार वार्ता थी।
अमेरिका ने टैरिफ का दबाव कैसे बढ़ाया?
अमेरिकी कदमों में कनाडाई स्टील, एल्युमिनियम और तांबे पर ५० प्रतिशत शुल्क शामिल है। उस समय कनाडा से आने वाली कारों और ऑटो पार्ट्स पर शुल्क २५ प्रतिशत था।
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ट्रंप ने कनाडा से आने वाली कारों, ट्रकों, ऑटो पार्ट्स और स्टील पर शुल्क १ जनवरी, २०२७ से बढ़ाकर ५० प्रतिशत करने की धमकी दी। इसका अर्थ उन ऑटो सेक्टरों के लिए प्रभावी रूप से २५ प्रतिशत अंक की अतिरिक्त वृद्धि है, जिन पर पहले से २५ प्रतिशत शुल्क लागू था—यह किसी अलग ५० प्रतिशत शुल्क के ऊपर एक और २५ प्रतिशत शुल्क नहीं है।
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कनाडा की जवाबी रणनीति
कार्नी ने कहा कि कनाडा अमेरिकी शुल्क का डॉलर-के-बदले-डॉलर जवाब देगा। प्रस्तावित जवाबी शुल्क ८ सितंबर से लागू होने हैं और इनमें स्टील, डेयरी, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अन्य विनिर्मित और कृषि उत्पादों जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को निशाना बनाया जाएगा।
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डग फोर्ड ने प्रांतीय स्तर पर भी दबाव बनाने के विकल्प सुझाए। इनमें अमेरिका को निर्यात होने वाली बिजली पर अधिभार और महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात पर पाबंदियां शामिल हैं। हालांकि, जवाबी शुल्क से दोनों देशों में लागत बढ़ सकती है और इससे वॉशिंगटन की ओर से और कड़ी प्रतिक्रिया का जोखिम भी है।
कूटनीतिक तनाव क्यों बढ़ा?
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कनाडा को अमेरिका का 'राज्य' कह दिया और बाद में इसे 'Freudian slip' बताया। यह टिप्पणी उस समय आई जब ट्रंप ने कहा था कि कनाडा को अब अमेरिका के एक राज्य की तरह माना जाएगा।
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वेंस ने कनाडा पर मेन राज्य के साथ अत्यधिक शुल्क लगाने और चीन के उत्पादों के साथ अधिक अनुकूल व्यवहार करने का आरोप भी लगाया। इन बयानों ने ओटावा की उस धारणा को मजबूत किया कि वॉशिंगटन की मांगें सामान्य बाजार पहुंच के विवाद से आगे बढ़कर कनाडा की व्यापार नीति पर नियंत्रण से जुड़ी हैं। अमेरिकी प्रशासन का व्यापक तर्क यह भी रहा है कि कनाडा की नीतियां चीन से आने वाले माल की अप्रत्यक्ष आवाजाही या शुल्क से बचने में मदद करती हैं।
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दांव पर क्या लगा है?
सबसे तत्काल असर उन उद्योगों पर पड़ सकता है, जिनकी आपूर्ति शृंखलाएं दोनों देशों में गहराई से जुड़ी हैं—विशेषकर ऑटो, धातु, ऊर्जा, खाद्य और विनिर्माण क्षेत्र। अमेरिका-कनाडा का सालाना व्यापार लगभग ३८० अरब डॉलर का है, जबकि कनाडा से अमेरिका को होने वाला ऑटो निर्यात करीब ५० अरब डॉलर का है।
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इन उद्योगों में पुर्जे और कच्चा माल सीमा पार कई बार आते-जाते हैं। इसलिए शुल्क का असर केवल कनाडाई निर्यातकों पर नहीं पड़ेगा; अमेरिकी असेंबली प्लांट, सप्लायर, कामगार और उपभोक्ता भी प्रभावित हो सकते हैं। यदि टकराव लंबा चलता है, तो कंपनियां निवेश को दूसरे स्थानों पर ले जाने, आपूर्ति शृंखलाओं को पुनर्गठित करने और पूरे उत्तर अमेरिकी व्यापार ढांचे की नए सिरे से समीक्षा करने पर विचार कर सकती हैं।