युद्ध के दौरान हमलों और शिपिंग प्रतिबंधों ने केवल कच्चे तेल की डिलीवरी नहीं घटाई, बल्कि रिफाइनरी उत्पादन और तैयार ईंधन के निर्यात को भी बाधित किया। यह झटका महंगाई और धीमी आर्थिक गतिविधि का मिश्रण पैदा कर सकता है: महंगा डीजल परिवहन, खेती और उद्योग की लागत बढ़ाता है, जबकि कम भंडार बाजार को अगली बाधा के प्रति अधिक संवे...
शोध उत्तर

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: How has the nearly six-month-old US–Iran war that began on February 28 triggered a global refined-fuel crisis, and what do the losses in Mid. Article summary: The premise is not supported by the latest official evidence: the U.S.–Iran conflict did begin on February 28 and severely disrupted oil and fuel trade, but the EIA reports a June 18 memorandum ending the conflict and in. Topic tags: general, news, general web, government. Style: premium digital editorial illustration, source-backed research mood, clean composition, high detail, modern web publication hero. Use reference image context only for broad subject, composition, and topical grounding; do not copy the exact image. Avoid: logos, brand marks, copyrighted characters, real person likenesses, fake screenshots, UI text, readable text, watermarks, charts with
28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार को झटका दिया, लेकिन इसका सबसे टिकाऊ असर रिफाइंड ईंधनों—खासकर डीजल, पेट्रोल और जेट ईंधन—पर पड़ा। मध्य पूर्व के ऊर्जा ढांचे पर हमलों, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों की आवाजाही घटने और रूसी रिफाइनरियों को हुए नुकसान ने कच्चे तेल को तैयार ईंधन में बदलने की क्षमता कम कर दी। 36
यह अंतर अहम है। शिपिंग मार्ग खुलने पर कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतें सुधरना शुरू हो सकती हैं, लेकिन अगर रिफाइनरियां क्षतिग्रस्त हों, निर्यात सीमित हो या भंडार पहले ही घट चुके हों, तो ईंधन महंगा बना रह सकता है। उपलब्ध साक्ष्य एक गंभीर आपूर्ति झटके की ओर इशारा करते हैं, लेकिन अभी यह निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ऊंची ईंधन कीमतें वर्षों तक बनी रहेंगी।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही का बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। 2026 की दूसरी तिमाही में इस मार्ग से औसतन केवल 49 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम तरल पदार्थ गुजरे, जबकि संघर्ष से पहले 2025 की चौथी तिमाही में यह मात्रा 2.16 करोड़ बैरल प्रतिदिन थी।
इस व्यवधान ने रिफाइनिंग श्रृंखला के दोनों सिरों को प्रभावित किया:
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इस रुकावट को वैश्विक तेल बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान बताया। मार्च में दुनिया के दर्ज किए गए तेल भंडार 8.5 करोड़ बैरल घटे। मध्य पूर्वी खाड़ी के बाहर के भंडार में 20.5 करोड़ बैरल की गिरावट आई, क्योंकि हॉर्मुज़ के रास्ते तेल की आवाजाही लगभग रुक गई थी।
यह संकट जमीन के नीचे कच्चे तेल की कमी भर नहीं था। समस्या चालू रिफाइनरियों और भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स की कमी की भी थी।
IEA के अनुमान के अनुसार, दूसरी तिमाही में मध्य पूर्व की रिफाइनिंग क्षमता युद्ध से पहले के स्तर से 29 लाख बैरल प्रतिदिन कम रही और तीसरी तिमाही में भी यह कमी 22 लाख बैरल प्रतिदिन रहने की संभावना थी। यूक्रेनी हमलों के कारण रूस की रिफाइनिंग भी करीब दो दशक के निचले स्तर पर पहुंच गई; जुलाई में रूसी रिफाइनरी उत्पादन 39 लाख बैरल प्रतिदिन बताया गया। 12
मध्य पूर्व की रिफाइनरियों को हुए नुकसान और रूस की घटती क्षमता को मिलाकर देखें तो दूसरी तिमाही में लगभग 50 लाख बैरल प्रतिदिन की रिफाइनिंग क्षमता हट गई—यह युद्ध से पहले की वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता का करीब 6% था। IEA के हवाले से दी गई रिपोर्टों के अनुसार, वैश्विक रिफाइनरी संचालन औसतन लगभग 7.8 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहा, जो 2020 के कोविड-19 संकट के सबसे कठिन दौर के बाद का सबसे कम स्तर था। 3
इसीलिए दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में कच्चा तेल उपलब्ध होने पर भी डीजल या पेट्रोल की कमी हो सकती है। किसी क्षतिग्रस्त रिफाइनरी की जगह केवल तेल का एक और टैंकर भेज देने से समस्या हल नहीं होती। क्षतिग्रस्त इकाइयां, बाधित बिजली और पानी जैसी सुविधाएं, सीमित जहाज और अस्थिर सुरक्षा हालात उत्पादन को तेजी से बहाल करने में बाधा डालते हैं।
डीजल की मांग विशेष रूप से व्यापक है। ट्रक, कृषि मशीनरी, निर्माण क्षेत्र और भारी उद्योग इस पर काफी निर्भर हैं। यूरोप भी कम ईंधन भंडार के साथ इस झटके में दाखिल हुआ। एम्स्टर्डम-रॉटरडैम-एंटवर्प केंद्र पर गैसऑयल का भंडार, जो डीजल का एक प्रमुख संकेतक है, पांच साल के औसत से 24% नीचे बताया गया। 1
रिफाइनिंग मार्जिन से बाजार का तनाव साफ दिखता है। यूरो क्षेत्र में खुदरा डीजल कीमत में रिफाइनिंग मार्जिन का हिस्सा युद्ध से पहले 0.10 यूरो प्रति लीटर था, जो जुलाई के पहले तीन हफ्तों में बढ़कर 0.35 यूरो हो गया। पेट्रोल का संबंधित मार्जिन फरवरी के 0.04 यूरो से बढ़कर जुलाई में 0.23 यूरो हो गया। 4
इसका नतीजा यह हुआ कि तैयार ईंधन की कीमतों में शुरुआती कच्चे तेल की तेजी से भी ज्यादा उछाल आया। रिपोर्टों में IEA के आंकड़ों के हवाले से कहा गया कि युद्ध शुरू होने के बाद यूरोपीय डीजल की कीमतें 70% से अधिक बढ़ीं, जबकि अमेरिका में पेट्रोल की कीमत करीब 60% बढ़ी। 5
अमेरिका में भी भंडार हाल के पांच साल के औसत से नीचे रहे। 17 जुलाई को समाप्त सप्ताह में अमेरिकी कच्चे तेल का भंडार पांच साल के औसत से 6%, पेट्रोल का 7% और डिस्टिलेट ईंधन—जिसमें डीजल शामिल है—का भंडार 10% नीचे था।
ईंधन की कमी का असर केवल पंप पर दिखाई देने वाली कीमतों तक सीमित नहीं रहता। डीजल महंगा होने से सामान ढोने, खेतों में मशीनें चलाने, बुनियादी ढांचा बनाने और औद्योगिक उपकरणों के संचालन की लागत बढ़ती है। कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च को ग्राहकों पर डाल सकती हैं, अपने मुनाफे में कमी स्वीकार कर सकती हैं या उत्पादन और गतिविधि घटा सकती हैं।
इससे स्टैगफ्लेशन जैसा आपूर्ति झटका पैदा हो सकता है—यानी उपभोक्ता कीमतें बढ़ें, लेकिन वास्तविक घरेलू आय और आर्थिक गतिविधि कमजोर हो जाए। इसका दबाव उन क्षेत्रों पर सबसे अधिक पड़ता है जहां डीजल का विकल्प जल्दी उपलब्ध नहीं होता या कंपनियां लंबे समय की सुरक्षित आपूर्ति तय नहीं कर पातीं।
कम भंडार स्थिति को और नाजुक बनाते हैं। मांग में कोई बदलाव न होने पर भी एक और हमला, शिपिंग रुकावट या रिफाइनरी बंद होने से कीमतें असामान्य रूप से बढ़ सकती हैं, क्योंकि खरीदारों के पास इस्तेमाल करने के लिए कम स्टॉक बचा है। इसके उलट, अगर भंडार लगातार दोबारा भरे जाते हैं, तो जोखिम घटेगा और रिफाइनिंग मार्जिन कम हो सकते हैं।
उपलब्ध साक्ष्य दो विपरीत दिशाओं की ओर इशारा करते हैं। एक ओर, IEA ने अगस्त में बताया कि खाड़ी क्षेत्र का उत्पादन युद्ध-पूर्व स्तर से 83 लाख बैरल प्रतिदिन कम था। जुलाई की शुरुआत में हॉर्मुज़ फिर लगभग बंद हो जाने के बाद क्षेत्रीय निर्यात भी घटे। रूस की रिफाइनिंग कमजोर बनी रही और उसकी रिफाइनरियों पर हमलों के बाद ईंधन निर्यात पर प्रतिबंध लगाए गए। 26
दूसरी ओर, अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, 18 जून को अमेरिका और ईरान के बीच हुआ एक समझौता संघर्ष समाप्त करने के उद्देश्य से था और इसके बाद हॉर्मुज़ से आवाजाही बढ़ी। EIA का अनुमान है कि कच्चे तेल का उत्पादन और व्यापार प्रवाह वर्ष के अंत तक संघर्ष-पूर्व स्तर के करीब लौट सकते हैं तथा बंद पड़ा अधिकांश उत्पादन 2027 की शुरुआत तक बहाल हो सकता है।
ये आकलन पूरी तरह एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। इसलिए संकट कितने समय चलेगा, इसे निश्चित भविष्यवाणी के बजाय परिस्थितियों पर निर्भर संभावना के रूप में देखना चाहिए। टिकाऊ समझौता और सुरक्षित शिपिंग कच्चे तेल की कीमतों को अपेक्षाकृत जल्दी नीचे ला सकते हैं। तैयार ईंधन को सामान्य होने में अधिक समय लग सकता है, क्योंकि रिफाइनरियों को सुरक्षित तरीके से दोबारा चालू करना और भंडार भरना जरूरी होगा। फिर भी उपलब्ध साक्ष्य हर क्षतिग्रस्त खाड़ी रिफाइनरी की मरम्मत के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं देते।
ईंधन बाजार को स्थिर होने के लिए एक साथ तीन सुधारों की जरूरत होगी:
मुख्य सबक यह है कि कच्चे तेल की आपूर्ति में सुधार का मतलब सस्ता पेट्रोल या डीजल तुरंत लौट आना नहीं है। इस संघर्ष ने एक अधिक संकीर्ण और कठिन अड़चन उजागर की है: दुनिया की तैयार ईंधन को रिफाइन करने, ढोने और भंडारित करने की क्षमता। कीमतें वास्तव में कितनी घटेंगी, यह केवल कच्चे तेल के उत्पादन पर नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला की बहाली पर निर्भर करेगा।
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युद्ध के दौरान हमलों और शिपिंग प्रतिबंधों ने केवल कच्चे तेल की डिलीवरी नहीं घटाई, बल्कि रिफाइनरी उत्पादन और तैयार ईंधन के निर्यात को भी बाधित किया।
युद्ध के दौरान हमलों और शिपिंग प्रतिबंधों ने केवल कच्चे तेल की डिलीवरी नहीं घटाई, बल्कि रिफाइनरी उत्पादन और तैयार ईंधन के निर्यात को भी बाधित किया। यह झटका महंगाई और धीमी आर्थिक गतिविधि का मिश्रण पैदा कर सकता है: महंगा डीजल परिवहन, खेती और उद्योग की लागत बढ़ाता है, जबकि कम भंडार बाजार को अगली बाधा के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।