2000 से 2021 के बीच वैश्विक गेहूं कीमतों में साल दर साल बदलाव का करीब 74% हिस्सा गंभीर जल संकट से समझाया जा सका। सामान्य वर्षों में दुनिया के गेहूं उगाने वाले क्षेत्र का लगभग 5% गंभीर जल संकट से प्रभावित था, लेकिन कुछ बेहद सूखे वर्षों में यह हिस्सेदारी 15% से ऊपर चली गई। प्रभावी उत्सर्जन कटौती के बिना, सदी के अंत तक...
शोध उत्तर

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: What does the international study published in Earth’s Future reveal about how widespread drought and climate change affect global wheat pri. Article summary: The study finds that simultaneous drought across major wheat-producing regions is a powerful driver of global wheat prices—not merely a local farming problem. Severe water scarcity (SWS) explained about 74% of year-to-ye. Topic tags: general, government, education, academic, general web. Style: premium digital editorial illustration, source-backed research mood, clean composition, high detail, modern web publication hero. Use reference image context only for broad subject, composition, and topical grounding; do not copy the exact image. Avoid: logos, brand marks, copyrighted characters, real person likenesses, fake screenshots, UI text, readable text, watermark
गेहूं की फसल वाले कई बड़े क्षेत्रों में एक साथ पड़ने वाला सूखा स्थानीय कृषि संकट से कहीं आगे जाकर वैश्विक खाद्य बाजार को प्रभावित कर सकता है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2021 के बीच गंभीर जल-संकट (Severe Water Scarcity यानी SWS) ने वैश्विक गेहूं कीमतों में साल-दर-साल होने वाले बदलाव का करीब 74% हिस्सा समझाने में मदद की।
जल-संकट और कीमतों के बीच इस संबंध का इस्तेमाल करते हुए शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि वैश्विक तापमान में 2°C वृद्धि की स्थिति में गेहूं की औसत कीमत करीब 273 डॉलर प्रति टन और 3°C वृद्धि पर करीब 364 डॉलर प्रति टन हो सकती है। 3°C वाला अनुमान 2010 की मुद्रास्फीति-समायोजित वैश्विक गेहूं कीमत से लगभग तीन गुना है। 8
इसका मतलब यह नहीं है कि हर कीमत बदलाव केवल सूखे की वजह से होगा। ऊर्जा और उर्वरक की लागत, भंडार, व्यापार नीतियां, युद्ध और परिवहन में रुकावटें भी गेहूं बाजार को प्रभावित करती हैं। फिर भी, अध्ययन यह दिखाता है कि जब एक ही समय में कई प्रमुख उत्पादक या निर्यातक क्षेत्र सूखे की चपेट में आते हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
अध्ययन में गंभीर जल-संकट को ऐसे संकेतक के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो सूखे के भौगोलिक फैलाव और फसल को पानी की जरूरत वाले समय तक उसकी अवधि—दोनों को मापता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, 2000–2021 के दौरान SWS से प्रभावित गेहूं उगाने वाली भूमि का हिस्सा वैश्विक गेहूं कीमतों के उतार-चढ़ाव के साथ असामान्य रूप से closely जुड़ा था। 38
ऐतिहासिक रूप से, किसी औसत वर्ष में दुनिया के गेहूं उगाने वाले क्षेत्र का लगभग 5% गंभीर जल-संकट से प्रभावित हुआ। लेकिन 2000, 2010, 2012 और 2020 जैसे विशेष रूप से सूखे वर्षों में यह हिस्सेदारी 15% से ऊपर पहुंच गई। 8
एक क्षेत्र में सूखा पड़ने पर कभी-कभी दूसरे क्षेत्र की अच्छी फसल से कमी पूरी हो सकती है। लेकिन जब कई प्रमुख क्षेत्र एक साथ सूखे की चपेट में आते हैं, तो उत्पादन में हुई कमी की भरपाई करने वाले विकल्प घट जाते हैं। इससे आयातक देशों और वैश्विक कारोबारियों पर आपूर्ति झटके का दबाव बढ़ता है।
गेहूं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर कारोबार होता है और वैश्विक बाजार की आपूर्ति अपेक्षाकृत सीमित संख्या में प्रमुख निर्यातक क्षेत्रों पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि कई निर्यातक क्षेत्र एक साथ जल-संकट का सामना करें, तो उत्पादन में कमी तेजी से अंतरराष्ट्रीय कीमतों और खाद्य आयात बिल में दिखाई दे सकती है।
व्यापार मार्गों के महत्वपूर्ण पड़ाव—जिन्हें trade chokepoints कहा जाता है—इस जोखिम को और बढ़ा सकते हैं। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया में कारोबार किए जाने वाले गेहूं और जौ का करीब एक-चौथाई निर्यात करते हैं। एक अन्य विश्लेषण के अनुसार, गेहूं और मोटे अनाज के वैश्विक व्यापार का लगभग 40% हिस्सा ऐसे महत्वपूर्ण मार्गों से होकर गुजरता है। 28
अध्ययन में व्यापक जल-संकट और गेहूं की कीमतों के बीच संबंध, मक्के की तुलना में काफी मजबूत पाया गया। चावल के लिए ऐसा कोई समान संबंध नहीं मिला। हालांकि, इसे इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि हर फसल के लिए एक ही कारण निश्चित रूप से जिम्मेदार है। गेहूं का व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यापार और प्रमुख निर्यातक क्षेत्रों में उत्पादन का संकेंद्रण उसकी अधिक संवेदनशीलता की संभावित वजह हो सकते हैं। 3
अध्ययन के अनुमानों के अनुसार, वैश्विक तापमान में 2°C वृद्धि पर गेहूं की औसत कीमत करीब 273 डॉलर प्रति टन और 3°C वृद्धि पर करीब 364 डॉलर प्रति टन हो सकती है। 3°C का अनुमान 2010 की मुद्रास्फीति-समायोजित वैश्विक कीमत से लगभग तीन गुना है।
ये अनुमान सूखे और कीमतों के बीच देखे गए संबंध पर आधारित परिदृश्य हैं। इन्हें किसी खास वर्ष की सटीक भविष्यवाणी या भविष्य में कीमत बढ़ने का एकमात्र कारण नहीं माना जाना चाहिए। 8
एक अन्य अध्ययन से जुड़े अनुमान के अनुसार, 2°C तापमान वृद्धि की स्थिति में उपभोक्ता कीमतों में ऐसा उछाल, जो मौजूदा जलवायु में लगभग हर 20 साल में एक बार आता है, करीब हर 17 साल में आ सकता है। इसका असर उन परिवारों और देशों पर सबसे अधिक पड़ सकता है, जो अपने बजट या विदेशी मुद्रा आय का बड़ा हिस्सा खाद्य आयात पर खर्च करते हैं। 7
पहले किए गए जलवायु अनुमानों के अनुसार, उत्सर्जन में प्रभावी कमी न होने और उच्च-उत्सर्जन परिदृश्य जारी रहने पर सदी के अंत तक आज के गेहूं उगाने वाले क्षेत्र का 60% तक हिस्सा एक साथ गंभीर जल-संकट की घटनाओं का सामना कर सकता है। वर्तमान स्थिति में यह हिस्सा लगभग 15% है। 5
पेरिस समझौते के अनुरूप जलवायु स्थिरीकरण इस जोखिम को काफी कम कर सकता है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं करेगा।
यह अनुमान उस कृषि भूमि के हिस्से से संबंधित है जो एक साथ जल-संकट की चपेट में आ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि गेहूं का 60% उत्पादन निश्चित रूप से नष्ट हो जाएगा। वास्तविक परिणाम फसल की किस्मों, सिंचाई, खेती के तरीकों, अनुकूलन, व्यापार और उत्पादन को दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की क्षमता पर भी निर्भर करेंगे।
जलवायु-जनित सूखा गेहूं बाजार पर दबाव डालने वाला अकेला कारक नहीं है। युद्ध और परिवहन संबंधी बाधाएं भी उस समय आपूर्ति को सीमित कर सकती हैं, जब फसल की स्थिति मुख्य समस्या न हो।
हाल में काला सागर क्षेत्र के अनाज ढांचे पर हुए हमलों से माल की आवाजाही प्रभावित हुई, प्रमुख आयातकों की खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी और शिकागो गेहूं वायदा कीमतें जुलाई की शुरुआत से 17% से अधिक चढ़ीं।
जलवायु झटके और परिवहन रुकावटें एक साथ हों तो जोखिम और गंभीर हो जाता है। सूखे से उपलब्ध अनाज घटता है और बंदरगाहों या समुद्री मार्गों को नुकसान पहुंचने से बची हुई आपूर्ति भी आसानी से नहीं पहुंच पाती। ऐसे में आयातकों के पास विकल्प कम रह जाते हैं और कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
अध्ययन का व्यापक संदेश यह है कि गेहूं पर पड़ने वाले सूखे को अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। कई देशों में एक साथ उत्पादन घटने पर उसका असर व्यापार, भंडार, परिवहन नेटवर्क और उपभोक्ता कीमतों के जरिए दुनिया भर में फैल सकता है।
इस जोखिम को घटाने के लिए दो मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा—जल-संकट के बढ़ते खतरे को सीमित करने के लिए उत्सर्जन कम करना और उन व्यवधानों की तैयारी करना, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के कारण अब पूरी तरह टाला नहीं जा सकता।
अधिक लचीली कृषि, भरोसेमंद व्यापार मार्ग, पर्याप्त खाद्य भंडार और खाद्य आयात पर निर्भर देशों के लिए समर्थन इस असर को कम कर सकते हैं। उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि इन उपायों को केवल खेत-स्तर के अनुकूलन के रूप में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार स्थिरता और खाद्य सुरक्षा नीति का हिस्सा माना जाना चाहिए। 35
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2000 से 2021 के बीच वैश्विक गेहूं कीमतों में साल दर साल बदलाव का करीब 74% हिस्सा गंभीर जल संकट से समझाया जा सका।
2000 से 2021 के बीच वैश्विक गेहूं कीमतों में साल दर साल बदलाव का करीब 74% हिस्सा गंभीर जल संकट से समझाया जा सका। सामान्य वर्षों में दुनिया के गेहूं उगाने वाले क्षेत्र का लगभग 5% गंभीर जल संकट से प्रभावित था, लेकिन कुछ बेहद सूखे वर्षों में यह हिस्सेदारी 15% से ऊपर चली गई।
प्रभावी उत्सर्जन कटौती के बिना, सदी के अंत तक आज के गेहूं उगाने वाले क्षेत्र का 60% तक हिस्सा एक साथ गंभीर जल संकट का सामना कर सकता है।