यह बयान उस व्यापक संघर्ष के बीच आया है, जो 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमलों के बाद शुरू हुआ। इसके बाद ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण कायम करने की कोशिश की और व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही को गंभीर रूप से सीमित कर दिया। CH
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी कदमों को “आर्थिक आतंकवाद” बताया है। उनका कहना है कि अमेरिका दूसरे स्वतंत्र देशों के व्यापारिक फैसलों पर बाहरी अधिकार थोपने की कोशिश कर रहा है। तेहरान की आपत्ति खास तौर पर चीन जैसे साझेदारों पर लगाए जाने वाले द्वितीयक दबाव को लेकर है। R
विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने डोनाल्ड ट्रंप के “आर्थिक डी-डे” वाले बयान को खारिज किया है। तेहरान का कहना है कि दबाव और धमकियों के जरिए ईरान को रियायत देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ईरान ने बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है, लेकिन वह इसे अपनी शर्तों पर आगे बढ़ाना चाहता है। होर्मुज़ को लेकर वार्ता अब भी अटकी हुई है। RN
वॉशिंगटन ने तीसरे देशों के लिए रुख काफी सख्त रखा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे “या तो हमारे साथ, या हमारे खिलाफ” की स्थिति बताया है। ट्रंप प्रशासन उन सरकारों, कंपनियों और बैंकों पर कार्रवाई की धमकी दे रहा है, जो ईरान को आर्थिक सहारा देते हैं। BN
इस रणनीति की सफलता काफी हद तक चीन के रुख पर निर्भर करेगी। केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में ईरान से समुद्री रास्ते से भेजे गए तेल का 80% से अधिक चीन ने खरीदा था। R इसलिए अमेरिकी अभियान केवल ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं है; यह बीजिंग के साथ संबंधों की भी बड़ी परीक्षा बन गया है।
तेहरान का आकलन है कि प्रतिबंधों का मकसद केवल बातचीत के लिए दबाव बनाना नहीं, बल्कि ईरान के भीतर आर्थिक तनाव बढ़ाना, सामाजिक एकजुटता को कमजोर करना और आगे की अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की जरूरत घटाना या उसे अधिक प्रभावी बनाना भी हो सकता है। अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया है कि आर्थिक दबाव से बड़े नए सैन्य अभियान की जरूरत कम हो सकती है। R