उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया ने बजट बढ़ोतरी को जापान की युद्धोत्तर सुरक्षा नीति से दूर जाने और आक्रामक सैन्य शक्ति के पुनर्निर्माण के सबूत के तौर पर पेश किया। प्योंगयांग ने जापान के युद्धकालीन इतिहास का भी उल्लेख किया और उसकी बढ़ती क्षमताओं को मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों का जवाब नहीं, बल्कि सैन्यवाद की वापसी बताया।
प्योंगयांग की खास आपत्ति अमेरिकी निर्मित टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइलों की जापान द्वारा खरीद और परीक्षण को लेकर है। अगस्त की शुरुआत में किम यो-जोंग ने भी चेतावनी दी थी कि अमेरिका के समर्थन से जापान का सैन्य शक्ति में बदलना उत्तर कोरिया को ‘अतिरिक्त सैन्य विकल्प’ अपनाने के लिए मजबूर कर सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, विश्लेषकों ने माना कि यह बयान भविष्य में उत्तर कोरिया के हथियार विकास और परीक्षणों को उचित ठहराने में मदद कर सकता है।
उत्तर कोरिया ने जापान की लंबी दूरी की मारक और ‘काउंटरस्ट्राइक’ क्षमताओं की व्यापक योजना की भी आलोचना की है। जापान की योजनाओं में पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों, लंबी दूरी की मिसाइलों और ड्रोन पर शोध के साथ-साथ एआई-आधारित कमांड-एंड-कंट्रोल प्रणालियां शामिल हैं।
ताजा बयान में उत्तर कोरिया ने किसी खास सैन्य अभियान या हथियार परीक्षण की घोषणा नहीं की। इसके बजाय उसने व्यापक चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय जापान के सैन्य विस्तार को स्वीकार नहीं करेगा और इस विस्तार का ‘एकजुट प्रतिक्रिया’ के साथ ‘पूरी तरह मुकाबला’ किया जाएगा।
किम यो-जोंग का इससे पहले का बयान अपेक्षाकृत स्पष्ट था। उन्होंने जापान की बढ़ती स्ट्राइक क्षमताओं के जवाब में उत्तर कोरियाई नेतृत्व द्वारा ‘अतिरिक्त सैन्य विकल्प’ तैयार किए जाने की बात कही थी। हालांकि, इस भाषा से यह स्पष्ट नहीं होता कि संभावित जवाब किस रूप में या कब दिया जाएगा।
उत्तर कोरिया की ओर से जापान के रिकॉर्ड राष्ट्रीय ऋण के बावजूद भारी रक्षा खर्च करने की आलोचना को राजनीतिक बयानबाजी के रूप में देखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टिंग प्योंगयांग की बजट-विरोधी प्रतिक्रिया और हथियारों से जुड़े आरोपों की पुष्टि करती है, लेकिन उत्तर कोरिया द्वारा बताए गए किसी खास ऋण आंकड़े या उसके सटीक शब्दों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती।
FY2027 की मांग जापान के FY2023–27 के पांच वर्षीय रक्षा कार्यक्रम का अंतिम साल है। इस कार्यक्रम के तहत लगभग ¥43 ट्रिलियन के रक्षा खर्च और 2027 तक रक्षा-संबंधी व्यय को GDP के करीब 2% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
जापान का कहना है कि चीन, उत्तर कोरिया और रूस से जुड़े सुरक्षा जोखिम पहले से अधिक गंभीर हो गए हैं। रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी ने क्षेत्रीय माहौल को युद्धोत्तर दौर में जापान के सामने मौजूद ‘सबसे गंभीर और जटिल’ सुरक्षा परिस्थिति बताया है। उन्होंने जापान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच सहयोग को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण बताया।
प्रस्तावित हथियार प्रणालियां यह समझने में मदद करती हैं कि प्योंगयांग इस buildup को आक्रामक क्यों बता रहा है। टॉमहॉक और अन्य लंबी दूरी के हथियार जापान की अपने तत्काल क्षेत्र से बाहर स्थित लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता बढ़ा सकते हैं। ड्रोन और एआई-सहायित कमांड प्रणालियों का उद्देश्य निगरानी, समन्वय और सैन्य अभियानों की निरंतरता बेहतर करना है। जापान इन्हें प्रतिरोधक क्षमता और रक्षा रणनीति का हिस्सा बताता है, जबकि उत्तर कोरिया इन्हें आक्रमण की तैयारी के रूप में देखता है।
यह दावा कि प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने सभी रक्षा खर्च सीमाएं हटा दी हैं, उपलब्ध साक्ष्यों से साबित नहीं होता। रिपोर्टिंग के अनुसार FY2027 की व्यापक बजट प्रक्रिया में बिना खर्च सीमा वाली एक नई ‘ग्रोथ-इन्वेस्टमेंट’ श्रेणी बनाई गई है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि रक्षा खर्च पर लागू हर सीमा समाप्त कर दी गई है।
उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। वॉशिंगटन और सियोल ने 2026 के उल्ची फ्रीडम शील्ड सैन्य अभ्यास की अवधि अमेरिका के अनुरोध पर 11 दिन से घटाकर पांच दिन कर दी। कुछ मैदानी प्रशिक्षण गतिविधियों का स्तर भी कम किया गया।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन अभ्यासों को उत्तर कोरिया के लिए ‘अनुचित और शत्रुतापूर्ण’ संकेत बताया। रिपोर्टों के अनुसार, वह किम जोंग-उन से संभावित मुलाकात की कोशिश भी कर रहे थे। दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया ने इस अचानक बदलाव के बाद स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ उसका गठबंधन राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियाद बना हुआ है।
इन घटनाओं से क्षेत्रीय संदेश जटिल हो जाता है। जापान अपनी स्वतंत्र लंबी दूरी की मारक और कमांड क्षमताएं बढ़ा रहा है; उत्तर कोरिया इस buildup का इस्तेमाल अपने सैन्यवाद-विरोधी नैरेटिव को मजबूत करने के लिए कर रहा है; और अमेरिका दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यासों का पैमाना घटाते हुए प्योंगयांग के साथ संभावित संवाद की दिशा में भी संकेत दे रहा है।
पूरे विवाद का केंद्र जापान के सैन्य विस्तार के अर्थ को लेकर मतभेद है। टोक्यो का तर्क है कि बिगड़ते सुरक्षा माहौल में मजबूत क्षमताएं और अमेरिका तथा दक्षिण कोरिया के साथ करीबी तालमेल प्रतिरोधक क्षमता के लिए जरूरी हैं। प्योंगयांग इन्हीं घटनाओं—खासकर टॉमहॉक मिसाइलों, लंबी दूरी के हथियारों और त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग—को जापान के आक्रामक सैन्य शक्ति बनने का प्रमाण बताता है।
इसलिए उत्तर कोरिया की ताजा धमकी चेतावनी के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी है। इसमें ¥8.9 ट्रिलियन की बजट मांग की निंदा, जापान के युद्धकालीन अतीत का उल्लेख और आगे के सैन्य कदमों की संभावना का संकेत है, लेकिन संभावित कार्रवाई का कोई स्पष्ट खाका नहीं दिया गया। उत्तर-पूर्वी एशिया में मुख्य अनिश्चितता यही है कि जापान का buildup सुरक्षा संतुलन और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करेगा या धमकी, पुनःशस्त्रीकरण और जवाबी धमकियों का चक्र और गहरा करेगा।
उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया ने बजट बढ़ोतरी को जापान की युद्धोत्तर सुरक्षा नीति से दूर जाने और आक्रामक सैन्य शक्ति के पुनर्निर्माण के सबूत के तौर पर पेश किया। प्योंगयांग ने जापान के युद्धकालीन इतिहास का भी उल्लेख किया और उसकी बढ़ती क्षमताओं को मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों का जवाब नहीं, बल्कि सैन्यवाद की वापसी बताया।
प्योंगयांग की खास आपत्ति अमेरिकी निर्मित टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइलों की जापान द्वारा खरीद और परीक्षण को लेकर है। अगस्त की शुरुआत में किम यो-जोंग ने भी चेतावनी दी थी कि अमेरिका के समर्थन से जापान का सैन्य शक्ति में बदलना उत्तर कोरिया को ‘अतिरिक्त सैन्य विकल्प’ अपनाने के लिए मजबूर कर सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, विश्लेषकों ने माना कि यह बयान भविष्य में उत्तर कोरिया के हथियार विकास और परीक्षणों को उचित ठहराने में मदद कर सकता है।
उत्तर कोरिया ने जापान की लंबी दूरी की मारक और ‘काउंटरस्ट्राइक’ क्षमताओं की व्यापक योजना की भी आलोचना की है। जापान की योजनाओं में पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों, लंबी दूरी की मिसाइलों और ड्रोन पर शोध के साथ-साथ एआई-आधारित कमांड-एंड-कंट्रोल प्रणालियां शामिल हैं।
ताजा बयान में उत्तर कोरिया ने किसी खास सैन्य अभियान या हथियार परीक्षण की घोषणा नहीं की। इसके बजाय उसने व्यापक चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय जापान के सैन्य विस्तार को स्वीकार नहीं करेगा और इस विस्तार का ‘एकजुट प्रतिक्रिया’ के साथ ‘पूरी तरह मुकाबला’ किया जाएगा।
किम यो-जोंग का इससे पहले का बयान अपेक्षाकृत स्पष्ट था। उन्होंने जापान की बढ़ती स्ट्राइक क्षमताओं के जवाब में उत्तर कोरियाई नेतृत्व द्वारा ‘अतिरिक्त सैन्य विकल्प’ तैयार किए जाने की बात कही थी। हालांकि, इस भाषा से यह स्पष्ट नहीं होता कि संभावित जवाब किस रूप में या कब दिया जाएगा।
उत्तर कोरिया की ओर से जापान के रिकॉर्ड राष्ट्रीय ऋण के बावजूद भारी रक्षा खर्च करने की आलोचना को राजनीतिक बयानबाजी के रूप में देखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टिंग प्योंगयांग की बजट-विरोधी प्रतिक्रिया और हथियारों से जुड़े आरोपों की पुष्टि करती है, लेकिन उत्तर कोरिया द्वारा बताए गए किसी खास ऋण आंकड़े या उसके सटीक शब्दों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती।
FY2027 की मांग जापान के FY2023–27 के पांच वर्षीय रक्षा कार्यक्रम का अंतिम साल है। इस कार्यक्रम के तहत लगभग ¥43 ट्रिलियन के रक्षा खर्च और 2027 तक रक्षा-संबंधी व्यय को GDP के करीब 2% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
जापान का कहना है कि चीन, उत्तर कोरिया और रूस से जुड़े सुरक्षा जोखिम पहले से अधिक गंभीर हो गए हैं। रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी ने क्षेत्रीय माहौल को युद्धोत्तर दौर में जापान के सामने मौजूद ‘सबसे गंभीर और जटिल’ सुरक्षा परिस्थिति बताया है। उन्होंने जापान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच सहयोग को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण बताया।
प्रस्तावित हथियार प्रणालियां यह समझने में मदद करती हैं कि प्योंगयांग इस buildup को आक्रामक क्यों बता रहा है। टॉमहॉक और अन्य लंबी दूरी के हथियार जापान की अपने तत्काल क्षेत्र से बाहर स्थित लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता बढ़ा सकते हैं। ड्रोन और एआई-सहायित कमांड प्रणालियों का उद्देश्य निगरानी, समन्वय और सैन्य अभियानों की निरंतरता बेहतर करना है। जापान इन्हें प्रतिरोधक क्षमता और रक्षा रणनीति का हिस्सा बताता है, जबकि उत्तर कोरिया इन्हें आक्रमण की तैयारी के रूप में देखता है।
यह दावा कि प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने सभी रक्षा खर्च सीमाएं हटा दी हैं, उपलब्ध साक्ष्यों से साबित नहीं होता। रिपोर्टिंग के अनुसार FY2027 की व्यापक बजट प्रक्रिया में बिना खर्च सीमा वाली एक नई ‘ग्रोथ-इन्वेस्टमेंट’ श्रेणी बनाई गई है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि रक्षा खर्च पर लागू हर सीमा समाप्त कर दी गई है।
उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। वॉशिंगटन और सियोल ने 2026 के उल्ची फ्रीडम शील्ड सैन्य अभ्यास की अवधि अमेरिका के अनुरोध पर 11 दिन से घटाकर पांच दिन कर दी। कुछ मैदानी प्रशिक्षण गतिविधियों का स्तर भी कम किया गया।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन अभ्यासों को उत्तर कोरिया के लिए ‘अनुचित और शत्रुतापूर्ण’ संकेत बताया। रिपोर्टों के अनुसार, वह किम जोंग-उन से संभावित मुलाकात की कोशिश भी कर रहे थे। दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया ने इस अचानक बदलाव के बाद स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ उसका गठबंधन राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियाद बना हुआ है।
इन घटनाओं से क्षेत्रीय संदेश जटिल हो जाता है। जापान अपनी स्वतंत्र लंबी दूरी की मारक और कमांड क्षमताएं बढ़ा रहा है; उत्तर कोरिया इस buildup का इस्तेमाल अपने सैन्यवाद-विरोधी नैरेटिव को मजबूत करने के लिए कर रहा है; और अमेरिका दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यासों का पैमाना घटाते हुए प्योंगयांग के साथ संभावित संवाद की दिशा में भी संकेत दे रहा है।
पूरे विवाद का केंद्र जापान के सैन्य विस्तार के अर्थ को लेकर मतभेद है। टोक्यो का तर्क है कि बिगड़ते सुरक्षा माहौल में मजबूत क्षमताएं और अमेरिका तथा दक्षिण कोरिया के साथ करीबी तालमेल प्रतिरोधक क्षमता के लिए जरूरी हैं। प्योंगयांग इन्हीं घटनाओं—खासकर टॉमहॉक मिसाइलों, लंबी दूरी के हथियारों और त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग—को जापान के आक्रामक सैन्य शक्ति बनने का प्रमाण बताता है।
इसलिए उत्तर कोरिया की ताजा धमकी चेतावनी के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी है। इसमें ¥8.9 ट्रिलियन की बजट मांग की निंदा, जापान के युद्धकालीन अतीत का उल्लेख और आगे के सैन्य कदमों की संभावना का संकेत है, लेकिन संभावित कार्रवाई का कोई स्पष्ट खाका नहीं दिया गया। उत्तर-पूर्वी एशिया में मुख्य अनिश्चितता यही है कि जापान का buildup सुरक्षा संतुलन और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करेगा या धमकी, पुनःशस्त्रीकरण और जवाबी धमकियों का चक्र और गहरा करेगा।