यह संकट कच्चे तेल की कमी से अधिक रिफाइनिंग और तैयार ईंधन की आपूर्ति में आया झटका है। दुनिया की करीब 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन रिफाइनिंग क्षमता बंद या बाधित बताई गई है, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री व्यापार भी प्रभावित है। [7][4] रूस में यूक्रेनी हमलों और डीजल निर्यात प्रतिबंध ने यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के ल...
शोध उत्तर

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यह संकट तेल के कुओं से ज्यादा उस चरण में पैदा हुआ है जहां कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन में बदला जाता है। रिफाइनरियों की क्षमता और तैयार ईंधन को बाजारों तक पहुंचाने वाले समुद्री रास्ते—दोनों एक साथ बाधित हुए हैं। दूसरी ओर, गर्मियों में वाहन ईंधन की मांग मजबूत बनी हुई है। इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने के बावजूद पेट्रोल-डीजल और रिफाइनिंग मार्जिन रिकॉर्ड स्तरों तक पहुंच गए हैं।
वैश्विक स्तर पर करीब 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन रिफाइनिंग क्षमता बंद या किसी न किसी रूप में प्रभावित बताई गई है। इसका बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व में संघर्ष से जुड़ी क्षति और हमलों तथा रूस की रिफाइनरियों को हुए नुकसान से जुड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से बंद होने से कच्चे तेल की आपूर्ति और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात, दोनों प्रभावित हुए हैं। इससे खाड़ी के निर्यात केंद्रों से सामान्य तरीके से ईंधन को कमी वाले बाजारों तक भेजना मुश्किल हो गया है।
रिफाइनिंग मार्जिन को अक्सर “क्रैक स्प्रेड” कहा जाता है—यानी तैयार ईंधन की कीमत और उसे बनाने में इस्तेमाल कच्चे तेल की कीमत के बीच का अंतर। जब ईंधन की आपूर्ति तेजी से घटती है, तो यह अंतर बढ़ सकता है, भले ही कच्चे तेल की कीमत में उतनी तेजी न आए।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, मध्य-पूर्व की 96 लाख बैरल प्रतिदिन की रिफाइनिंग क्षमता में से 20% से अधिक प्रभावित हुई है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र की प्रोसेसिंग दर दूसरी तिमाही में युद्ध-पूर्व स्तर से 29 लाख बैरल प्रतिदिन नीचे थी और तीसरी तिमाही में भी 22 लाख बैरल प्रतिदिन कम रहने का अनुमान था।
इस क्षेत्र की भूमिका केवल कच्चे तेल के उत्पादन तक सीमित नहीं है। खाड़ी देश बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करते हैं। इसलिए होर्मुज में व्यवधान से बाजार को एक साथ कच्चे तेल का फीडस्टॉक और तैयार ईंधन की खेप—दोनों कम मिल रही हैं।
यूक्रेनी हमलों ने रूस की रिफाइनिंग को करीब दो दशक के निचले स्तर तक धकेल दिया है। इसके साथ रूस का डीजल निर्यात प्रतिबंध दुनिया की प्रमुख डीजल-आपूर्ति प्रणालियों में से एक से अतिरिक्त बैरल हटा देता है। रूस, मध्य-पूर्व और एशिया के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं से डीजल निर्यात जुलाई में एक साल पहले की तुलना में 13 लाख बैरल प्रतिदिन कम रहा—लगभग समुद्री डीजल व्यापार का पांचवां हिस्सा।
डीजल बाजार कच्चे तेल के बाजार की तुलना में कम लचीला होता है। इसलिए रूस से आपूर्ति रुकने का असर यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे आयात-निर्भर क्षेत्रों पर विशेष रूप से तेज पड़ता है।
चीन के पास अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता मौजूद है, फिर भी उसने रिफाइनरी संचालन और ईंधन निर्यात सीमित किए हैं। कच्चे तेल के आयात में तेज गिरावट की भरपाई के लिए चीनी रिफाइनरियों ने प्रोसेसिंग घटाई और ईंधन निर्यात पर अंकुश लगाया। इसका मतलब है कि किसी देश के पास रिफाइनिंग क्षमता होना और उसका उत्पाद वैश्विक बाजार में उपलब्ध होना—दो अलग बातें हैं।
चीन की कम रन रेट और सीमित निर्यात ने एशिया तथा अन्य बाजारों से पेट्रोल-डीजल की अतिरिक्त मांग आने पर एक महत्वपूर्ण “स्विंग सप्लायर” को पीछे कर दिया है।
खाड़ी से कम होती खेपों और रूसी डीजल की अनुपलब्धता के कारण समुद्र के रास्ते तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का व्यापार घट रहा है। सामान्य स्थिति में ऐसे व्यापार से किसी क्षेत्र की कमी दूसरे क्षेत्र की अतिरिक्त आपूर्ति से पूरी हो जाती है। इस बार वही पुनर्संतुलन तंत्र कमजोर पड़ गया है।
नतीजा स्थानीय कमी, क्षेत्रों के बीच कीमतों का बढ़ता अंतर और पेट्रोल-डीजल के निकट अवधि वाले वायदा अनुबंधों में तेज उछाल है। ईंधन बाजारों में दबाव तब भी बना हुआ है जब कच्चे तेल की कीमतों में तुलनात्मक रूप से कम हलचल है।
ऊंचे रिफाइनिंग मार्जिन अमेरिकी रिफाइनरियों को बहुत अधिक क्षमता पर चलने और अधिक ईंधन निर्यात करने का मजबूत प्रोत्साहन दे रहे हैं। भारत की निर्यात-उन्मुख रिफाइनरियां भी उच्च उपयोग दर के कारण इस स्थिति से लाभ उठा रही हैं।
लेकिन ये रिफाइनरियां अनंत क्षमता पर नहीं चल सकतीं। रखरखाव, कच्चे तेल की उपलब्धता, लॉजिस्टिक्स और निर्यात मार्गों की सीमाएं बनी हुई हैं। इसलिए अमेरिका और भारत से आने वाले अतिरिक्त बैरल खाड़ी और रूस की खोई आपूर्ति की पूरी जगह नहीं ले सकते, खासकर तब जब शिपिंग मार्ग ही बाधित हों।
इस संकट का सीधा असर पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन पर पड़ता है। वाहन चालकों को पंप पर अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। डीजल महंगा होने से ट्रक परिवहन, खेती और औद्योगिक गतिविधियों की लागत बढ़ती है। विमानन और अन्य ईंधन-गहन उद्योगों पर भी इनपुट लागत का दबाव आता है।
गर्मियों की ड्राइविंग मांग, अत्यधिक गर्मी के दौरान बिजली की बढ़ती जरूरत और बाद में डिस्टिलेट ईंधन की मौसमी मांग ने बाजार को और तंग किया है। इससे रिफाइनरियों को भंडार दोबारा बनाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा।
प्रमुख बाजारों में पेट्रोल और डीजल का भंडार कई वर्षों के निचले स्तर के करीब है। एशियाई पेट्रोल भंडार के 2026 के बाकी हिस्से में पांच साल के औसत से नीचे रहने का अनुमान है। कम भंडार का अर्थ है कि अगली रिफाइनरी बंदी, शिपिंग व्यवधान, तूफान या मांग में अचानक बढ़ोतरी कीमतों पर असामान्य रूप से बड़ा असर डाल सकती है।
जब बाजार में अतिरिक्त स्टॉक कम होता है, तो रिफाइनरियों के बाहर चल रहे संयंत्रों पर भी अधिक दबाव पड़ता है। वे लगभग पूरी क्षमता पर चलने लगते हैं, जिससे किसी नए झटके के लिए सुरक्षा-परत और पतली हो जाती है।
भारत और मध्य-पूर्व में आने वाली करीब 5 लाख बैरल प्रतिदिन की नई रिफाइनिंग क्षमता कुछ सीमांत राहत दे सकती है, खासकर यदि वह निर्यात योग्य मध्य-डिस्टिलेट—जैसे डीजल—पर केंद्रित हो। लेकिन यह बहु-मिलियन बैरल प्रतिदिन की बंद या बाधित क्षमता की तुलना में बहुत छोटी है।
नई क्षमता तुरंत पूरी दर पर उपलब्ध हो, यह भी जरूरी नहीं। इसके अलावा, वह अकेले होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से नहीं खोल सकती और न ही क्षतिग्रस्त रिफाइनरियों को चालू कर सकती है। इसलिए यह वैश्विक ईंधन बाजार का खोया हुआ सुरक्षा-भंडार बहाल करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
इस संकट का समाधान केवल अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध कराने से नहीं होगा। टिकाऊ राहत के लिए कई कदम एक साथ जरूरी हैं:
जब तक इनमें से कई स्थितियां एक साथ नहीं सुधरतीं, रिफाइनिंग मार्जिन ऊंचे रह सकते हैं और ईंधन की कीमतें कच्चे तेल से अलग दिशा में चल सकती हैं। कम भंडार के कारण बाजार आगे भी किसी नए भू-राजनीतिक या परिचालन झटके के प्रति बेहद संवेदनशील रहेगा।
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यह संकट कच्चे तेल की कमी से अधिक रिफाइनिंग और तैयार ईंधन की आपूर्ति में आया झटका है।
यह संकट कच्चे तेल की कमी से अधिक रिफाइनिंग और तैयार ईंधन की आपूर्ति में आया झटका है। दुनिया की करीब 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन रिफाइनिंग क्षमता बंद या बाधित बताई गई है, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री व्यापार भी प्रभावित है। [7][4]
रूस में यूक्रेनी हमलों और डीजल निर्यात प्रतिबंध ने यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लिए दबाव बढ़ा दिया है। [1][4]