यह केवल एक महीने के खरीद पैटर्न में बदलाव नहीं है। Bloomberg द्वारा उद्धृत जहाज-ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार, फरवरी के पहले 18 दिनों में चीन को रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी औसतन करीब 20.9 लाख bpd रही थी। इससे संकेत मिलता है कि जब भारत की मांग घटती है तो चीन रूसी तेल के लिए वैकल्पिक बाजार बन सकता है। लेकिन जब दोनों देशों को मध्य पूर्व से बाधित आपूर्ति की भरपाई के लिए रूसी बैरल चाहिए हों, तब दोनों सीधे प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं।
मध्य पूर्व से कम उपलब्धता की भरपाई के लिए चीनी रिफाइनर रूस से खरीद बढ़ा रहे हैं। व्यापार सूत्रों और जहाज-ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार, चीन की सरकारी रिफाइनरी कंपनी Sinopec ने जुलाई से सितंबर के बीच डिलीवरी के लिए रूस के ESPO मिश्रण के 30 से 40 कार्गो खरीदे हैं। यह लगभग 2.41 लाख से 3.20 लाख bpd के बराबर है।
चीन रूस के सुदूर पूर्वी और यूरोपीय बंदरगाहों से आने वाले कार्गो स्वीकार करने को तैयार है। इससे रूस को एक बड़ा वैकल्पिक बाजार मिल जाता है और भारत की सौदेबाजी की ताकत घटती है। जब अधिक खरीदार लंबी समुद्री यात्राओं और जटिल शिपिंग व्यवस्थाओं को स्वीकार करने लगते हैं, तो मॉस्को के पास भारतीय रिफाइनरियों के लिए पहले जैसी बड़ी छूट बनाए रखने का दबाव कम हो जाता है।
उपलब्ध आंकड़े यह नहीं दिखाते कि रूसी तेल वैश्विक बाजार से गायब हो रहा है। ज्यादा सटीक निष्कर्ष यह है कि उसकी दिशा बदल रही है—भारत कम बैरल खरीद रहा है, जबकि चीन उन्हें एशिया की ओर खींच रहा है। पहले के आंकड़ों में भी भारत की खरीद घटने के साथ चीन की Urals खरीद बढ़ती दिखी थी।
इस बदलाव का सबसे स्पष्ट असर कीमतों में दिख रहा है। भारत में पहुंचने वाले रूसी Urals तेल पर छूट जुलाई के अंत में घटकर dated Brent से करीब 1–2 डॉलर प्रति बैरल रह गई। जुलाई की शुरुआत में यही छूट 10 डॉलर प्रति बैरल से अधिक थी।
BPCL के वित्त प्रमुख ने अलग से कहा कि मध्य पूर्व में आपूर्ति बाधित होने के बाद वैकल्पिक ग्रेड की मांग बढ़ने से कारोबारियों ने भारत को रूसी कच्चे तेल पर छूट देना बंद कर दिया था। जब छूट लगभग खत्म हो जाती है, तो रूसी तेल का वह लागत लाभ काफी कम हो जाता है जिसने इसे भारतीय रिफाइनरियों के लिए आकर्षक बनाया था। दूसरी ओर, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका या उपलब्ध मध्य पूर्वी स्रोतों से मिलने वाले विकल्पों की डिलीवरी लागत अधिक हो सकती है और उन्हें संसाधित करने के लिए अलग तकनीकी जरूरतें हो सकती हैं।
रिफाइनरियों पर दबाव मुख्य रूप से दो तरह से आता है:
उपलब्ध रिपोर्टों से Reliance Industries, Indian Oil या BPCL के लिए किसी विशिष्ट संयंत्र के बंद होने या मार्जिन में निश्चित रकम की कमी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। व्यापक निष्कर्ष यह है कि Urals पर छूट घटने से तीनों के लिए कच्चे तेल की खरीद का माहौल कम अनुकूल हुआ है। वास्तविक असर हर रिफाइनरी की कच्चे तेल की लचीलापन, उत्पाद मिश्रण, भंडार, अनुबंधों और बढ़ी लागत ग्राहकों तक पहुंचाने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
Reliance Industries को वैश्विक कच्चे तेल की लागत में इस बदलाव का सामना अन्य भारतीय रिफाइनरियों की तरह करना पड़ रहा है। हालांकि उपलब्ध स्रोत कंपनी-स्तर के पर्याप्त आंकड़े नहीं देते, इसलिए इसके सटीक वित्तीय प्रभाव को मापना संभव नहीं है। Reliance पर असर का आकलन रूसी तेल की मात्रा के बजाय कच्चे तेल की लागत और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाले मूल्य के अंतर से करना अधिक उचित होगा।
Indian Oil के सामने भी वही खरीद चुनौती है: जब Urals पर छूट घट रही हो और मध्य पूर्व से आपूर्ति बाधित हो, तब भरोसेमंद कच्चा तेल हासिल करना। उपलब्ध स्रोत Indian Oil की मौजूदा रूसी खरीद या उसके मार्जिन पर प्रभाव को संख्यात्मक रूप से नहीं बताते। इसलिए कंपनी को किसी निश्चित परिचालन नुकसान में बताना जल्दबाजी होगी।
BPCL के मामले में उपलब्ध प्रमाण सबसे स्पष्ट हैं। कंपनी ने कहा था कि वैकल्पिक तेल की बढ़ी मांग के कारण रूसी तेल पर छूट खत्म हो गई थी और वह आने वाली डिलीवरी के लिए आपूर्ति की व्यवस्था कर रही थी। इससे खरीद लागत पर दबाव का संकेत मिलता है, लेकिन यह न तो कच्चे तेल की अनुपलब्धता साबित करता है और न ही ईंधन की कमी।
इन तीनों कंपनियों के लिए आगे देखने योग्य प्रमुख संकेतक होंगे—Urals और Brent के बीच कीमत का अंतर, मालभाड़ा और बीमा लागत, वैकल्पिक ग्रेड की उपलब्धता और घरेलू ईंधन कीमतों में कच्चे तेल की बढ़ी लागत का कितनी तेजी से समायोजन होता है।
खतरा बढ़ा है, लेकिन इससे पूरे क्षेत्र में तत्काल ईंधन संकट साबित नहीं होता।
ईरान संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास की बाधाओं के बाद मध्य पूर्व से तेल प्रवाह प्रभावित हुआ है। मध्य पूर्वी आपूर्ति घटने पर भारतीय रिफाइनरियों ने रूस और लैटिन अमेरिका से खरीद बढ़ाई। चीन ने भी खाड़ी क्षेत्र से कम हो रही आपूर्ति की भरपाई के लिए रूसी कच्चे तेल का सहारा लिया।
इससे एशिया के पास गलती या नई बाधा को संभालने की गुंजाइश कम रह गई है। होर्मुज, रूस के निर्यात टर्मिनलों, टैंकरों की उपलब्धता या क्षेत्रीय रिफाइनिंग क्षमता में एक और रुकावट आने पर आयातकों के लिए खोए हुए बैरल्स की जगह भरना कठिन हो सकता है। शुरुआती असर कच्चे तेल और मालभाड़े की ऊंची लागत तथा रिफाइनरी मार्जिन में कमजोरी के रूप में दिखेगा। यदि तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार भी कम हुआ, तो स्थानीय कमी और खुदरा ईंधन कीमतों में वृद्धि की संभावना बढ़ सकती है।
फिर भी चीन के अगस्त के रूसी तेल आयात का आंकड़ा एक अनुमान है और उपलब्ध प्रमाण यह नहीं दिखाते कि एशियाई उपभोक्ताओं को पहले से व्यापक ईंधन कमी का सामना करना पड़ रहा है। अभी सबसे स्पष्ट बदलाव यह है कि भारत की सौदेबाजी की बढ़त कम हो गई है: चीन उसी समय रूसी तेल की मांग बढ़ा रहा है जब भारतीय रिफाइनर उसे हासिल करने के लिए अधिक भुगतान कर रहे हैं।
चीन की रूसी तेल खरीद अब अस्थायी आपूर्ति-संतुलन रणनीति से आगे बढ़कर कार्गो के लिए लगातार प्रतिस्पर्धा का रूप ले रही है। भारत ने मध्य पूर्व से बाधित आपूर्ति की भरपाई के लिए रियायती Urals तेल का इस्तेमाल किया था। अब चीन उन बैरल्स का बड़ा हिस्सा ले रहा है, जिनमें रूस के यूरोपीय बंदरगाहों से आने वाला Urals भी शामिल है।
इससे रूस की विक्रेता के रूप में स्थिति मजबूत होती है, भारतीय रिफाइनरियों को मिलने वाली बचत घटती है और एशियाई ईंधन बाजार अगली लॉजिस्टिक या आपूर्ति बाधा के प्रति अधिक संवेदनशील बनता है। ईंधन संकट अनिवार्य नहीं है, लेकिन सस्ते कच्चे तेल का वह सुरक्षा-कुशन, जिसने मौजूदा व्यवधान को संभालने में भारत और पूरे क्षेत्र की मदद की, अब काफी पतला हो रहा है।