इन ढांचों के भीतर टी-फॉलिक्युलर हेल्पर कोशिकाएं बी कोशिकाओं को सक्रिय और परिपक्व बनाने में मदद करती हैं। इसके बाद बी कोशिकाएं मस्तिष्क से जुड़े संबंधित लक्ष्यों के खिलाफ एंटीबॉडी बना सकती हैं। इस लिहाज से ये हब केवल प्रतिरक्षा कोशिकाओं को छोड़ने वाली जगह नहीं, बल्कि स्थानीय लिम्फॉइड प्रतिक्रिया के केंद्र जैसे लगते हैं। व्यवस्थित टी-सेल और बी-सेल क्षेत्रों वाले लिम्फॉइड ढांचे प्रतिरक्षा कोशिकाओं के सक्रियण और एंटीबॉडी प्रतिक्रिया में मदद करने के लिए जाने जाते हैं।
इस व्यवस्था से मस्तिष्क में किसी असामान्य प्रोटीन या ट्यूमर-संबंधी संकेत की पहचान से लेकर अनुकूली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू होने तक का रास्ता छोटा हो सकता है। यानी मस्तिष्क को पहले किसी दूर स्थित प्रतिरक्षा अंग तक संकेत भेजने का इंतजार न करना पड़े और उसके ठीक बाहर मौजूद ऊतक से विशेष प्रतिक्रिया मिल सके।
चूहों पर किए गए प्रयोगों ने संकेत दिया कि इन ढांचों की वास्तविक भूमिका हो सकती है। जब खोपड़ी के बोन मैरो में मौजूद इम्यून हब को बाधित किया गया, तो स्थानीय एंटी-ट्यूमर प्रतिक्रिया कमजोर पड़ी और ग्लियोब्लास्टोमा अधिक तेजी से बढ़ा। इसके विपरीत, इन ढांचों को सक्रिय करने पर ट्यूमर के खिलाफ प्रतिरक्षा गतिविधि बढ़ी।
शोधकर्ताओं ने खोपड़ी के ठीक ऊपर, सिर की त्वचा के नीचे तीन प्रतिरक्षा-उत्तेजक प्रोटीन वाला जेल भी लगाया। चूहों में इस उपचार ने स्थानीय इम्यून नेटवर्क को सक्रिय किया और ग्लियोब्लास्टोमा की वृद्धि धीमी हुई।
हालांकि, इन परिणामों को मनुष्यों के लिए तैयार इलाज नहीं माना जा सकता। प्रयोग चूहों में हुआ था। जेल की सुरक्षा, सही खुराक, प्रभावशीलता और मानव मरीजों में लंबे समय तक लाभ देने की क्षमता की जांच क्लिनिकल परीक्षणों में करनी होगी।
लिम्फ नोड जैसे व्यवस्थित ढांचे सीधे तौर पर चूहों में पहचाने गए हैं। लेकिन नव-निदानित और पहले उपचार न पाए मानव ग्लियोब्लास्टोमा के पास से लिए गए क्रेनियल बोन मैरो के अलग विश्लेषण में सक्रिय लिम्फॉइड कोशिकाएं मिलीं। इनमें ट्यूमर से जुड़ी CD8-पॉजिटिव टी कोशिकाएं भी शामिल थीं।
यह निष्कर्ष इस संभावना को समर्थन देता है कि मनुष्यों में भी मस्तिष्क के पास कोई संबंधित स्थानीय प्रतिरक्षा व्यवस्था हो सकती है। फिर भी, यह प्रमाण नहीं है कि मनुष्यों में बिल्कुल चूहों जैसे खोपड़ी-बोन मैरो ढांचे मौजूद हैं या वे उसी तरह काम करते हैं। इसलिए मानवों से मिले संकेत महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन सबसे मजबूत कार्यात्मक प्रमाण अभी भी प्री-क्लिनिकल, यानी पशु-अध्ययनों से, आता है।
यह खोज एक संभावित रणनीति की ओर इशारा करती है: पूरे शरीर में इम्यूनोथेरेपी देने के बजाय खोपड़ी के ऊपर मौजूद प्रतिरक्षा ऊतक को स्थानीय रूप से सक्रिय करना। सिद्धांत रूप में, ऐसा उपचार मस्तिष्क के ट्यूमर के पास प्रतिरक्षा उत्तेजना को केंद्रित कर सकता है और पूरे शरीर में दवा के संपर्क को कम कर सकता है। क्या इससे दुष्प्रभाव घटेंगे या मरीजों के परिणाम बेहतर होंगे, यह अभी अज्ञात है और मानव परीक्षणों से ही स्पष्ट होगा।
ग्लियोब्लास्टोमा के मामले में शोधकर्ता ऐसे तरीके तलाश सकते हैं, जिनसे ये बोन मैरो हब ट्यूमर एंटीजन को अधिक प्रभावी ढंग से पहचानें या वहां पहले से मौजूद टी-सेल और बी-सेल प्रतिक्रियाओं को मजबूत किया जा सके।
लंबी अवधि में यही अवधारणा अल्जाइमर रोग जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए भी जांची जा सकती है। स्थानीय प्रतिरक्षा ढांचों को बीमारी से जुड़े मस्तिष्क प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए सक्रिय करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। लेकिन इसमें गंभीर जोखिम भी है: यदि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वस्थ मस्तिष्क ऊतक पर हमला करे या लंबे समय तक अत्यधिक सक्रिय रहे, तो नुकसान हो सकता है। उपलब्ध शोध में अल्जाइमर या अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए इस रणनीति की सुरक्षा या प्रभावशीलता का कोई क्लिनिकल प्रमाण नहीं है।
वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के पहले के अध्ययनों ने दिखाया था कि मेनिन्जिस में मौजूद कई प्रतिरक्षा कोशिकाएं खोपड़ी के बोन मैरो से आती हैं और विशेष चैनलों के जरिए मस्तिष्क तक पहुंचती हैं, बिना पहले सामान्य रक्तप्रवाह में प्रवेश किए।
बाद के शोध में खोपड़ी के बोन मैरो और मेनिन्जिस के बीच मौजूद चैनलों को मस्तिष्कमेरु द्रव के संकेतों और खोपड़ी की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के बीच संवाद का भौतिक रास्ता बताया गया। अब मिले इम्यून हब इस शारीरिक संपर्क की संभावित कार्यात्मक व्याख्या पेश करते हैं: खोपड़ी, ड्यूरा और मस्तिष्क मिलकर ऐसा स्थानीय प्रतिरक्षा सर्किट बना सकते हैं, जो मस्तिष्क से आए पदार्थों को पहचानकर अनुकूली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का समन्वय करता है।
इसलिए इस खोज का सबसे सटीक निष्कर्ष इसे ‘नया अंग’ कहने से कुछ अधिक सीमित, लेकिन अधिक उपयोगी है। शोधकर्ताओं ने चूहों में मस्तिष्क के पास स्थित संगठित प्रतिरक्षा ढांचे खोजे हैं, दिखाया है कि वे इन जानवरों में ग्लियोब्लास्टोमा की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं और मानव क्रेनियल बोन मैरो में संबंधित प्रतिरक्षा गतिविधि पाई है। अब मुख्य सवाल यह है कि क्या यही व्यवस्था मनुष्यों में भी मौजूद है और क्या इसे सुरक्षित तरीके से उपचार में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन ढांचों के भीतर टी-फॉलिक्युलर हेल्पर कोशिकाएं बी कोशिकाओं को सक्रिय और परिपक्व बनाने में मदद करती हैं। इसके बाद बी कोशिकाएं मस्तिष्क से जुड़े संबंधित लक्ष्यों के खिलाफ एंटीबॉडी बना सकती हैं। इस लिहाज से ये हब केवल प्रतिरक्षा कोशिकाओं को छोड़ने वाली जगह नहीं, बल्कि स्थानीय लिम्फॉइड प्रतिक्रिया के केंद्र जैसे लगते हैं। व्यवस्थित टी-सेल और बी-सेल क्षेत्रों वाले लिम्फॉइड ढांचे प्रतिरक्षा कोशिकाओं के सक्रियण और एंटीबॉडी प्रतिक्रिया में मदद करने के लिए जाने जाते हैं।
इस व्यवस्था से मस्तिष्क में किसी असामान्य प्रोटीन या ट्यूमर-संबंधी संकेत की पहचान से लेकर अनुकूली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू होने तक का रास्ता छोटा हो सकता है। यानी मस्तिष्क को पहले किसी दूर स्थित प्रतिरक्षा अंग तक संकेत भेजने का इंतजार न करना पड़े और उसके ठीक बाहर मौजूद ऊतक से विशेष प्रतिक्रिया मिल सके।
चूहों पर किए गए प्रयोगों ने संकेत दिया कि इन ढांचों की वास्तविक भूमिका हो सकती है। जब खोपड़ी के बोन मैरो में मौजूद इम्यून हब को बाधित किया गया, तो स्थानीय एंटी-ट्यूमर प्रतिक्रिया कमजोर पड़ी और ग्लियोब्लास्टोमा अधिक तेजी से बढ़ा। इसके विपरीत, इन ढांचों को सक्रिय करने पर ट्यूमर के खिलाफ प्रतिरक्षा गतिविधि बढ़ी।
शोधकर्ताओं ने खोपड़ी के ठीक ऊपर, सिर की त्वचा के नीचे तीन प्रतिरक्षा-उत्तेजक प्रोटीन वाला जेल भी लगाया। चूहों में इस उपचार ने स्थानीय इम्यून नेटवर्क को सक्रिय किया और ग्लियोब्लास्टोमा की वृद्धि धीमी हुई।
हालांकि, इन परिणामों को मनुष्यों के लिए तैयार इलाज नहीं माना जा सकता। प्रयोग चूहों में हुआ था। जेल की सुरक्षा, सही खुराक, प्रभावशीलता और मानव मरीजों में लंबे समय तक लाभ देने की क्षमता की जांच क्लिनिकल परीक्षणों में करनी होगी।
लिम्फ नोड जैसे व्यवस्थित ढांचे सीधे तौर पर चूहों में पहचाने गए हैं। लेकिन नव-निदानित और पहले उपचार न पाए मानव ग्लियोब्लास्टोमा के पास से लिए गए क्रेनियल बोन मैरो के अलग विश्लेषण में सक्रिय लिम्फॉइड कोशिकाएं मिलीं। इनमें ट्यूमर से जुड़ी CD8-पॉजिटिव टी कोशिकाएं भी शामिल थीं।
यह निष्कर्ष इस संभावना को समर्थन देता है कि मनुष्यों में भी मस्तिष्क के पास कोई संबंधित स्थानीय प्रतिरक्षा व्यवस्था हो सकती है। फिर भी, यह प्रमाण नहीं है कि मनुष्यों में बिल्कुल चूहों जैसे खोपड़ी-बोन मैरो ढांचे मौजूद हैं या वे उसी तरह काम करते हैं। इसलिए मानवों से मिले संकेत महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन सबसे मजबूत कार्यात्मक प्रमाण अभी भी प्री-क्लिनिकल, यानी पशु-अध्ययनों से, आता है।
यह खोज एक संभावित रणनीति की ओर इशारा करती है: पूरे शरीर में इम्यूनोथेरेपी देने के बजाय खोपड़ी के ऊपर मौजूद प्रतिरक्षा ऊतक को स्थानीय रूप से सक्रिय करना। सिद्धांत रूप में, ऐसा उपचार मस्तिष्क के ट्यूमर के पास प्रतिरक्षा उत्तेजना को केंद्रित कर सकता है और पूरे शरीर में दवा के संपर्क को कम कर सकता है। क्या इससे दुष्प्रभाव घटेंगे या मरीजों के परिणाम बेहतर होंगे, यह अभी अज्ञात है और मानव परीक्षणों से ही स्पष्ट होगा।
ग्लियोब्लास्टोमा के मामले में शोधकर्ता ऐसे तरीके तलाश सकते हैं, जिनसे ये बोन मैरो हब ट्यूमर एंटीजन को अधिक प्रभावी ढंग से पहचानें या वहां पहले से मौजूद टी-सेल और बी-सेल प्रतिक्रियाओं को मजबूत किया जा सके।
लंबी अवधि में यही अवधारणा अल्जाइमर रोग जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए भी जांची जा सकती है। स्थानीय प्रतिरक्षा ढांचों को बीमारी से जुड़े मस्तिष्क प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए सक्रिय करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। लेकिन इसमें गंभीर जोखिम भी है: यदि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वस्थ मस्तिष्क ऊतक पर हमला करे या लंबे समय तक अत्यधिक सक्रिय रहे, तो नुकसान हो सकता है। उपलब्ध शोध में अल्जाइमर या अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए इस रणनीति की सुरक्षा या प्रभावशीलता का कोई क्लिनिकल प्रमाण नहीं है।
वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के पहले के अध्ययनों ने दिखाया था कि मेनिन्जिस में मौजूद कई प्रतिरक्षा कोशिकाएं खोपड़ी के बोन मैरो से आती हैं और विशेष चैनलों के जरिए मस्तिष्क तक पहुंचती हैं, बिना पहले सामान्य रक्तप्रवाह में प्रवेश किए।
बाद के शोध में खोपड़ी के बोन मैरो और मेनिन्जिस के बीच मौजूद चैनलों को मस्तिष्कमेरु द्रव के संकेतों और खोपड़ी की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के बीच संवाद का भौतिक रास्ता बताया गया। अब मिले इम्यून हब इस शारीरिक संपर्क की संभावित कार्यात्मक व्याख्या पेश करते हैं: खोपड़ी, ड्यूरा और मस्तिष्क मिलकर ऐसा स्थानीय प्रतिरक्षा सर्किट बना सकते हैं, जो मस्तिष्क से आए पदार्थों को पहचानकर अनुकूली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का समन्वय करता है।
इसलिए इस खोज का सबसे सटीक निष्कर्ष इसे ‘नया अंग’ कहने से कुछ अधिक सीमित, लेकिन अधिक उपयोगी है। शोधकर्ताओं ने चूहों में मस्तिष्क के पास स्थित संगठित प्रतिरक्षा ढांचे खोजे हैं, दिखाया है कि वे इन जानवरों में ग्लियोब्लास्टोमा की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं और मानव क्रेनियल बोन मैरो में संबंधित प्रतिरक्षा गतिविधि पाई है। अब मुख्य सवाल यह है कि क्या यही व्यवस्था मनुष्यों में भी मौजूद है और क्या इसे सुरक्षित तरीके से उपचार में इस्तेमाल किया जा सकता है।