इज़राइल का कहना था कि दमिश्क ने पहले दी गई चेतावनियों को नजरअंदाज किया और तुर्की सैनिकों को अबू अल-दुहूर में तैनात करने की तैयारी कर रहा था। इज़राइल ने संभावित तुर्की सैन्य जमावड़े को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताया। बाद में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि सीरिया एक सहमत सुरक्षा यथास्थिति का उल्लंघन करने के कगार पर था।
तुर्की ने इस दलील को खारिज कर दिया। अंकारा ने कहा कि एयरबेस पर कोई तुर्की सैन्य मौजूदगी नहीं थी और इज़राइली प्रधानमंत्री कार्यालय के आरोप हमले को सही ठहराने की कोशिश हैं।
यह अंतर महत्वपूर्ण था: अबू अल-दुहूर पर तुर्की की भूमिका संभावित और भविष्य की योजना थी, जबकि तुर्की के सैनिक पहले से ही पास के तफ्तानाज़ एयरबेस में मौजूद थे। इसलिए एक निष्क्रिय ठिकाने पर हमला वास्तविक तैनाती को रोकने से अधिक, भविष्य की रणनीतिक दिशा पर दबाव बनाने वाला कदम दिखाई दिया।
तुर्की में अमेरिकी राजदूत और सीरिया-इराक के विशेष दूत टॉम बराक ने कहा कि हमले में इज़राइल और तुर्की के साथ-साथ सीरिया के भी सीधे सैन्य टकराव में फंसने का वास्तविक खतरा था। उन्होंने इसे “अनावश्यक तनाव बढ़ाने वाला कदम” बताया, जो क्षेत्रीय स्थिरता को आगे नहीं बढ़ाता।
बराक के अनुसार, तुर्की बलों को यह पहले से पता नहीं था कि इज़राइली विमान अबू अल-दुहूर की ओर आ रहे हैं या उनका उद्देश्य क्या है। यदि तुर्की ने विमानों की गतिविधि को अपने ऊपर हमला समझ लिया होता, तो वह अपने लड़ाकू विमान हवा में भेज सकता था। ऐसी स्थिति में एक सीमित हमला कुछ ही मिनटों में इज़राइल-तुर्की सैन्य मुठभेड़ में बदल सकता था।
इस जोखिम को सैन्य भाषा में डी-कॉन्फ्लिक्शन यानी टकराव-रोधी समन्वय कहा जाता है। इसका मतलब है कि विरोधी या संभावित रूप से विरोधी सेनाएं एक-दूसरे को पहले से अपनी गतिविधियों की जानकारी दें, ताकि गलत पहचान के कारण गोलीबारी न हो। बराक का तर्क था कि इज़राइल, तुर्की और सीरिया के बीच ऐसे भरोसेमंद संपर्क चैनल मौजूद नहीं थे।
वॉशिंगटन ने हमले पर असामान्य रूप से खुलकर असहमति जताई। बराक ने कहा कि अहमद अल-शरा की नई सीरियाई सरकार ने इज़राइल के खिलाफ आक्रामक रुख के बजाय तनाव कम करने के संकेत दिए थे। उन्होंने सभी पक्षों से सैन्य घटनाओं के बजाय तर्कपूर्ण संवाद को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।
अमेरिका के लिए यह मामला इसलिए भी संवेदनशील था क्योंकि तुर्की नाटो का सदस्य है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन के बीच महत्वपूर्ण राजनीतिक संबंध हैं। दूसरी ओर, वॉशिंगटन इज़राइल की गाज़ा, लेबनान और दक्षिणी सीरिया में जारी व्यापक सैन्य कार्रवाइयों को लेकर पहले ही सार्वजनिक चिंता व्यक्त कर रहा था।
बराक ने संकेत दिया कि अमेरिका इज़राइल, सीरिया और संभवतः तुर्की को शामिल करते हुए सैन्य गलतफहमियां रोकने वाली शांत बातचीत की व्यवस्था फिर शुरू कराने की कोशिश कर रहा है।
हमले का असर केवल सैन्य नहीं, राजनीतिक भी था। अंकारा अहमद अल-शरा के नेतृत्व वाली, बशर अल-असद के बाद की सीरियाई सरकार के साथ संबंध मजबूत कर रहा है। तुर्की ने इज़राइल की कार्रवाई को सीरिया की संप्रभुता के खिलाफ बताया और नेतन्याहू की नीतियों को विस्तारवादी तथा अस्थिरता बढ़ाने वाला कहा।
तुर्की के अधिकारियों और कुछ रिपोर्टों ने यह भी आरोप लगाया कि नेतन्याहू 27 अक्टूबर को होने वाले इज़राइली चुनाव से पहले एर्दोआन के साथ तनाव का राजनीतिक लाभ उठाना चाहते थे। हालांकि, यह राजनीतिक विश्लेषण और आरोप है—इसका स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में उल्लेख नहीं किया जा सकता।
अबू अल-दुहूर एयरबेस खुद उस समय सक्रिय या रणनीतिक रूप से निर्णायक सैन्य अड्डा नहीं था। असली खतरा हमले के तरीके और समय में था: तुर्की प्रतिनिधिमंडल के दौरे के तुरंत बाद की गई कार्रवाई, तुर्की को पहले से सूचना न मिलना और भरोसेमंद सैन्य संपर्कों का अभाव।
इसी वजह से बराक ने चेताया कि एक निष्क्रिय एयरबेस पर हमला भी गलतफहमी की तेज श्रृंखला शुरू कर सकता था—तुर्की आत्मरक्षा में प्रतिक्रिया देता, इज़राइल जवाबी कदम उठाता और सीरिया भी संघर्ष में खिंच सकता था। इस अर्थ में, हमला केवल रनवे और भंडारण सुविधाओं को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं था; उसने पहले से अस्थिर क्षेत्र में बड़े सैन्य संकट का जोखिम पैदा किया।