Deutsche Bank के विश्लेषक जॉर्ज सरावेलोस ने इस कदम की तुलना ‘ऑपरेशन ट्विस्ट’ और ‘सॉफ्ट-फॉर्म वित्तीय दमन’ से की। ऑपरेशन ट्विस्ट से आशय ऐसी नीति से है जिसमें लंबी अवधि की उधारी लागत को कम रखने के लिए सरकारी बॉन्ड बाजार में हस्तक्षेप किया जाता है।
इस विश्लेषण के अनुसार, ट्रेजरी को लंबी अवधि के बॉन्ड बाजार से कुछ अवधि-जोखिम हटाने के लिए अधिक ट्रेजरी बिल जारी करने पड़ सकते हैं। इससे सरकार की कुल फंडिंग अवधि छोटी हो सकती है। साथ ही, विदेशी निवेशक लंबी अवधि वाले अमेरिकी बॉन्ड को पहले की तुलना में कम आकर्षक मान सकते हैं। ये दोनों बातें संरचनात्मक रूप से डॉलर के लिए नकारात्मक हो सकती हैं, भले ही उनका तात्कालिक असर बॉन्ड बाजार को स्थिर करने वाला हो।
यह कदम फेडरल रिजर्व के लिए भी स्थिति जटिल कर सकता है। यदि ट्रेजरी खुद लंबी अवधि की यील्ड को नीचे लाने में मदद करती है, तो महंगाई पर भरोसा बनाए रखने और वित्तीय परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए फेड को अपेक्षाकृत सख्त रुख रखना पड़ सकता है। हालांकि, यह Deutsche Bank का विश्लेषणात्मक आकलन है; उपलब्ध साक्ष्य इसके हर हिस्से को स्वतंत्र रूप से साबित नहीं करते।
बाजार के लिए फेड की बैठक के मिनट्स निकट अवधि का प्रमुख जोखिम बने रहे। कई नीति-निर्माताओं ने संकेत दिया था कि यदि महंगाई में कमी नहीं आती, तो वे ब्याज दर बढ़ाने के पक्ष में जा सकते हैं। मिनट्स का स्पष्ट रूप से आक्रामक यानी हॉकिश संकेत अस्थायी तौर पर अमेरिकी यील्ड और डॉलर, दोनों को ऊपर ले जा सकता है।
फेड चेयर केविन वार्श ने मूल्य स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि केंद्रीय बैंक आगे किस तरह कदम उठाएगा। इससे बाजार के लिए फेड की नीति-प्रतिक्रिया का अनुमान लगाना कठिन बना हुआ है और ब्याज दरों की दिशा को लेकर भरोसा सीमित है।
मध्य-पूर्व में तनाव के कारण तेल की कीमतें तीन सप्ताह के उच्च स्तर के आसपास बनी हुई हैं। महंगा तेल महंगाई का जोखिम बढ़ा सकता है, जिससे बॉन्ड यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव और फेड के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
इस समय बाजार में दो विपरीत ताकतें काम कर रही हैं:
अगर दूसरा परिदृश्य सामने आता है, तो ट्रेजरी का बायबैक कार्यक्रम डॉलर पर दबाव बढ़ा सकता है। लंबी अवधि की यील्ड पर सीमा बनने से अमेरिकी मुद्रा को मिलने वाला ब्याज-दर समर्थन कम होगा। इस स्थिति में येन को फायदा हो सकता है—खासकर इसलिए भी कि जापान और अमेरिका की हालिया मुद्रा-बाजार कार्रवाई ने येन को सहारा दिया है।